09/07/2026
किस्सा ए बांकीपुर- 1............................
ब्रिटिश लेखक ई.एम. फॉर्स्टर के मशहूर उपन्यास ‘अ पैसेज टू इंडिया’ में जो चंद्रपुर है, वह दरअसल बांकीपुर है. ऐसा फार्स्टर ने भी कबूल किया है. इस नॉवेल में ब्रिटेश से एक युवती अपने फ्यूचर हसबैंड को समझने के लिए भारत आती है. वह बांकीपुर आती है और वहां एक मुस्लिम फिजीशियन डॉ. अजीज से उसकी मुलाकात होती है. फिर कई लोग एक साथ घूमने के लिए बराबर की पहाड़ियों की तरफ जाते हैं, जिसे फार्स्टर ने नॉवेल में माराबर लिखा है. वहां कुछ ऐसा घटता है कि वह युवती डॉ. अजीज पर छेड़खानी का आरोप लगा देती है. डॉ. अजीज के पास खुद को निर्दोष साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं हैं. वह एक विदेशी युवती के आरोपों की यंत्रता झेलता है. हालांकि बाद में युवती को लगता है कि यह उसका भ्रम था. मगर डॉक्टर अजीज फिर कभी किसी अंगरेज पर भरोसा नहीं कर पाता है.
फार्स्टर ने यह उपन्यास हिंदुस्तान के बारे में प्रचलित उस पूर्वाग्रह को तोड़ने के लिए लिखा था, जिसमें हमें अविकसित और जंगली समझा जाता था. उन्होंने इस नॉवेल को अपने भारतीय मित्र सैयद रॉस महमूद को समर्पित किया था, जो पटना में वकालत करते थे. खैर, यह तो मशहूर नॉवेल ए पैसेज टू इंडिया में बांकीपुर के जिक्र की कहानी है. मगर मुगलों के अजीमाबाद और आजाद भारत के पटना के बीच के तकरीबन दो सौ साल के दर्म्यान उरोज पर रहने वाले शहर बांकीपुर के कई दूसरे रंग भी है. पहले इसके पैदा होने की कहानी.
वैसे तो मगध के इलाके में गंगा के किनारे बसा यह शहर आज का नहीं है. कम से कम 2500 साल पुराना है. मगध के राजा अजातशत्रु ने जब अपना साम्राज्य गंगा के उत्तर के इलाके में बढ़ाने का मन बनाया तो उसने राजगृह से थोड़ी दूर के इस इलाके को पाटलीपुत्र नाम देकर बसाया. उनकी नजर दुनिया के ऐश्वर्यशाली शहरों में से एक वैशाली पर थी, जिससे गौतम बुद्ध को अगाध प्रेम था. बाद में उनके पुत्र उदयन ने पाटलीपुत्र को मगध की राजधानी बनाया. यह इलाका तकरीबन छठी शताब्दी तक भारत की राजधानी रहा. फिर 16वीं सदी में भारत के मशहूर बादशाहों में से एक शेरशाह ने इस शहर को फिर से संवारा.
तुर्क-अफगान और मुगलों के जमाने में हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली रही और सूबा-ए-बेहार(बिहार) की राजधानी अजीमाबाद. जिसे एक नबाब अजीमुश्शान का नाम दिया गया था. वह इलाका वही है, जिसे आज पटना सिटी कहा जाता है. मगर जब अंगरेजों ने बिजनेस के बाद राजकाज भी शुरू किया तो उन्हें लगा कि तंग-गलियों वाले अजीमाबाद से अलग कोई इलाका होना चाहिए, उन्हें अपने ठिकाने के लिए. जहां उनके अफसर रहें, उनके दफ्तर हों और दूसरे कारोबार भी हो. ऐसे में वे अजीमाबाद से पश्चिम की तरफ पसरने लगे. उस इलाके में जहां गंगा नदी की चाल बांकी हो जाती थी. यानी आड़ी-तिरछी. नया शहर बांकीपुर कहलाने लगा.
उस इलाके में डच लोगों ने अफीम के कारखाने और गोदाम पहले से बनवा रखे थे. अंगरेजों ने अपनी कोठियां बनाई. राज दरभंगा की कोठियां बनीं. प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज और खुदाबख्श ओरियंटल लाइब्रेरी जैसे ऑर्गेनाइजशनों की इमारतें तामीर हुईं. फिर पटना कॉलेज बना. आइकॉनिक गोलघर बना.
इस बीच 1912 का साल आया, जह बंगाल से अलग होकर बिहार नया राज्य बना. तब बांकीपुर का इलाका और पश्चिम की तरफ पसरा. पूरा मैंग्ल्स जोन बना, जिसमें विधान मंडल, राजभवन, पुराना सचिवालय और दूसरी इमारतें हैं.
कदमकुआं मोहल्ला बसा. जहां प्रतिष्ठित शहरियों ने अपनी कोठियां बनवाईं. मौलाना मजहरूल हक ने कांग्रेस को जमीन दी तो बिहार विद्यापीठ और सदाकत आश्रम बने. फ्रेजर रोड और डॉक बंगला रोड के किनारे इमारतें खड़ी हुईं. यह सब अंग्रेजों के जमाने की बातें हैं. तब इन सबके बीच एक बड़ा सा मैदान था, बांकीपुर मैदान, जिसे वायसरीगल लॉन भी कहते थे. जो बाद में इसलिए गांधी मैदान कहा जाने लगा, क्योंकि साल 1947 के मार्च से मई महीनों के बीच महात्मा गांधी ने वहां तकरीबन रोज प्रार्थना सभा की थी. वे यहां पिछले साल फैले भीषण दंगों की आग बुझाने आये थे. वह दंगा कोलकाता और नोआखली के दंगों की प्रतिक्रिया में भड़का था.
इस बीच भारत आजाद हुआ. बांकीपुर शहर अब पटना कहा जाने लगा था. बांकीपुर स्टेशन का नाम भी पटना जंक्शन हो गया था. शहर पश्चिम की तरफ लगातार फैल रहा था और दीघा और दानापुर के इलाकों को छूने के लिए बेताब था. सचिवालय के इलाकों में क्वार्टर बन रहे थे. कंकड़बाग, राजेंद्र नगर औऱ पाटलीपुत्र जैसे मोहल्ले खड़े हो रहे थे. बोरिंग रोड का इलाका आकार ले रहा था. मगर बांकीपुर नाम कहीं खो गया था. मैंने आखिरी बार पटना शहर में उसका नाम देखा था, गांधी मैदान के उत्तरी किनारे में एक बांकीपुर टमटम पड़ाव था. वहां आज शायद एक छोटा सा बस पड़ाव है, जहां ऑटो और गाड़ियां खड़ी होती हैं. कारगिल चौक के ठीक उत्तर...
Pushya Mitra सर के वाल से