Yaduvanshi Kshatraiya King of India

Yaduvanshi  Kshatraiya King of India यादवों में एकता स्थापित करना

1857की क्रांति में बिहार के शाहाबाद के यादव का वर्चस्व (हथियार) बरामद जय यदुवंशी 🗡️🛡️🚩
21/10/2025

1857की क्रांति में बिहार के शाहाबाद के यादव का वर्चस्व (हथियार) बरामद
जय यदुवंशी 🗡️🛡️🚩

बाबर अपनी आत्मकथा तुज़ुक ए बाबरी में लिखता है कि जब वो भारत आया तब विजयनगर के सम्राट कृष्णदेव राय जैसा हुक्मरान और विजयन...
17/01/2025

बाबर अपनी आत्मकथा तुज़ुक ए बाबरी में लिखता है कि जब वो भारत आया तब विजयनगर के सम्राट कृष्णदेव राय जैसा हुक्मरान और विजयनगर जैसा वैभवशाली राज्य उसने पहले कभी नहीं देखा था। विजयनगर साम्राज्य अजेय ढाल था और कृष्णदेव राय के शासन तक किसी गैर हिन्दू शासक की हिम्मत नही पड़ी की वो दक्षिण कूच कर सके।

सम्राट कृष्णदेवराय सिर्फ ग्वाल(यादव) को ही द्वारपाल, गार्ड, और अंगरक्षक नियुक्त करते थे।
कृष्णदेव राय को तुर्क संघारक(तुर्को को मिटाने वाले) भी कहा जाता है उन्होने बीदर, बीजापुर,गोलकुंडा, अहमदनगर आदि मुस्लिम राज्यों को जीतकर विजय नगर साम्राज्य मे मिला लिया था उन्होने ओड़िसा के गंग शासको को भी हराया।
उन्होने अपने आत्माकथा अमुक्ताल्या मे खुद की जाति 'यादव' बताया। वे कवि थे तथा उनके दरवार मे आष्ट दिग्गज कवि रहते थे।

सम्राट कृष्णदेवराय ने खुद को गौ और ब्राह्मण का रक्षक बताया।

विजयनगर साम्राज्य गोप-कुल(यादव) के लोगो से विवाह टैक्स नही लेते थे।

विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक हरिहर और बुक्का ने अपने शिलालेख मे खुद को गोल्ला- राजालू( ग्वाल राजा) और यादवराय(यादव राजा) बताया।




सोर्स- 1.इम्पेरियल गज़ेटर ऑफ इंडिया
2.मैसूर शिलालेख
3. कार्नाटिक चोरोनोलॉजी etc ।।।।

*** प्रूफ कमेंट बॉक्स मे देखे।

आज विजयदशमी पर छत्तीसगढ़ से इन यादव बंधुओं की सबसे प्रेरणादायक तस्वीर। भगवती का शस्त्र स्वरूप अर्थात शस्त्र पूजन संपन्न ...
24/10/2023

आज विजयदशमी पर छत्तीसगढ़ से इन यादव बंधुओं की सबसे प्रेरणादायक तस्वीर। भगवती का शस्त्र स्वरूप अर्थात शस्त्र पूजन संपन्न कर सत्य सनातन देवी का आशीर्वाद प्राप्त करते दोनो बालक सबसे यही कह रहे कि सभी शस्त्र पूजन कर भगवती और युगल सरकार भगवान जानकी वल्लभ का आशीर्वाद प्राप्त करें।
!!जब जब होई धर्म की हानि, बारहि असुर अधम अभिमानी.

तब तब धर प्रभु विविध शरीरा, हरहि दयानिधि सज्जन पीड़ा!!

यादवों का असली ध्वज गरुड़ ध्वज है जिसका रंग केसरिया है नकि पीतांबर। पीतांबर भगवान महाविष्णु और उनके परम् अवतार श्री कृष्...
30/09/2023

यादवों का असली ध्वज गरुड़ ध्वज है जिसका रंग केसरिया है नकि पीतांबर। पीतांबर भगवान महाविष्णु और उनके परम् अवतार श्री कृष्ण महाराज और श्रीराम चंद्र के वस्त्रों का रंग है।
व्याकरण के अनुसार भी पीतांबर एक बहुव्रीहि समास है, "पीला है जिसका अंबर(वस्त्र)" यानी पीले रंग का वस्त्र धारण करने वाले भगवान नारायण या श्री कृष्ण।

वैसे तो सभी रंग अच्छे और अनोखे हैं क्योंकि परमात्मा के बनाएं हैं किंतु यादव अपनी मूल पहचान से परिचित हों क्योंकि किसी भी शास्त्रीय ग्रंथ, पुराण इत्यादि में पौराणिक काल के यादवों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ध्वज का रंग पीला न होकर केसरिया ही लिखा मिला है।

केसरिया ध्वज पर अंकित पक्षीराज गरुड़ यानी बाज़ भगवान महाविष्णु और नारायण पूर्ण अवतार श्रीकृष्ण के वाहन यानी गरुड़ जी का प्रतीक है साथ ही कई स्थानों पर यह मान्यता है कि यह यादवों की अहिर पदवी को इंगित करता है।

प्राचीन देवगिरी साम्राज्य के यादव सम्राट जो विशुद्ध वैदिक उन्मूलन पर राजकाज चलाते थे, अपने राजकीय प्रतीक के रूप में इन्होंने भी श्रीकृष्ण के मूल केसरिया गरुड़ ध्वज को ही स्वीकार किया था।

देवगिरी वंश कुलदीपक, यदुवंश गौरव, हिंदु मान रक्षक, राजा हनुमंत प्रताप सिंह जूदेव की नवनिर्मित प्रतिमा का गौरव पट्ट। सभी ...
29/09/2023

देवगिरी वंश कुलदीपक, यदुवंश गौरव, हिंदु मान रक्षक, राजा हनुमंत प्रताप सिंह जूदेव की नवनिर्मित प्रतिमा का गौरव पट्ट।
सभी साझा करें इस दुर्लभ तस्वीर को।
भगवान शंकर की कृपा से दिग दिगांतर तक इनकी कीर्ति अमर रहे।
#सनातन #देवगिरी #यदुकुल #राजा_हनुमंत_प्रताप_सिंह_जूदेव #रायसेन #नईगढ़िया

भारतवर्ष के समस्त यदुवंशियों के लिए आमंत्रण पत्र।27सितंबर को देवगिरी साम्राज्य के प्रमुख उत्तराधिकारियों में से एक यदुवं...
27/09/2023

भारतवर्ष के समस्त यदुवंशियों के लिए आमंत्रण पत्र।
27सितंबर को देवगिरी साम्राज्य के प्रमुख उत्तराधिकारियों में से एक यदुवंश के महानायक राजा हनुमंत प्रताप सिंह जूदेव की प्रतिमा का अनावरण होने जा रहा। अतः सभी बंधु भारी मात्रा में प्रतिमा स्थल, ज़िला रायसेन मध्य प्रदेश अवश्य पधारें।
कृष्णवंशी यादव जी श्री नारायणी सेना Hansraj Ahir Nirahua Akhilesh Yadav Tej Pratap Yadav Krishna Pal Singh Yadav Harnath Singh Yadav

महंत मनीराम दास अयोध्या

रांची में आयोजित 14वीं नेशनल ओपन ताइक्वांडो चैंपियनशिप 2023 में 11 वर्षीय शिवानी राय ने सब-जूनियर वर्ग में गोल्ड मेडल जी...
10/09/2023

रांची में आयोजित 14वीं नेशनल ओपन ताइक्वांडो चैंपियनशिप 2023 में 11 वर्षीय शिवानी राय ने सब-जूनियर वर्ग में गोल्ड मेडल जीता।

जय श्री कृष्ण 🙏

गुप्त राजवंश ( पार्ट -1 )गुप्त राजवंश लगभग 240-550 ईस्वी के बीच प्राचीन भारत का एक शक्तिशाली राजवंश था। जिसने संपूर्ण भा...
09/09/2023

गुप्त राजवंश ( पार्ट -1 )

गुप्त राजवंश लगभग 240-550 ईस्वी के बीच प्राचीन भारत का एक शक्तिशाली राजवंश था। जिसने संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन किया। इतिहासकारों द्वारा गुप्त काल को भारत का स्वर्ण युग माना जाता है। गुप्त शासकों ने अपनी राजधानी मगध क्षेत्र के पाटलिपुत्र को बनाई थी।

उत्पत्ति :

गुप्त शब्द गोप का ही रूपांतर है-

गोप शब्द अहीरों के लिए प्राचीन समय से प्रयोग होते आया है। (मौजूदा समय में भी बिहार राज्य में 'गोप पदवी' का इस्तेमाल अहीरों द्वारा ही किया जाता है।) जनसाधारण की बोली में यही गोप शब्द गोप्ता में परिवर्तित हो गया। गोप के अन्य परिवर्तित शब्द गोपव, गोपति, गुप्त, गुप्ती, गोपत्री आदि है।

बिहार में, अभी भी कुछ यादव गुप्त को पदवी या उपनाम के रूप में नहीं बल्कि अपने शाखा/गोत्र के रूप में लिखते हैं । गोप, गुप्त, घोष, गोमी आदि जैसे कई पदवी है, जो आभीरों व उनकी संस्कृति से व्युत्पन्न हुए थे।

धार्मिक ग्रंथों में गुप्त वंश की जाति - भागवत पुराण में गुप्त राजवंश को आभीर कहा गया है।

उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों का मत -

चौधरी बाबू राम ने अपनी पुस्तक में मगध साम्राज्य के गुप्त शासकों को बिहार के 'गोप जाति' का बताया है।

जेएन सिंह यादव ने गुप्त वंश को आभीरों से संबंधित लिखा है, उनके अनुसार गुप्त शब्द गोप का ही रूपांतर है।

नेपाल और दक्कन में हुई खुदाई में मिले शिलालेखों से पता चला है कि गुप्त प्रत्यय आभीर राजाओं के बीच आम था एवं इतिहासकार डी. आर रेग्मी गुप्त राजवंश को आभीरों से जोड़ते है।

इतिहासकार केपी जायसवाल भी गुप्त राजवंश को आभीरों से संबंधित लिखे

गुप्त राजवंश का नेपाल के आभीर-गुप्त वंश से संबंध -

इतिहासकार डी. आर रेग्मी और केपी जायसवाल लिखते है कि 'गुप्त' प्रत्यय नेपाल के आभीर शासकों के बीच आम था। इन्हें नेपाल में अहीर या गोप या गोपाल कहा जाता है, ये सभी शब्द एक दूसरे के लिए अदल-बदल कर इस्तेमाल किया जाता है, अर्थात पर्याय है।

डॉ केपी जैसवाल का विद्वत्तापूर्ण मत है कि नेपाल का 'आभीर - गुप्त वंश' मगध के 'गुप्त राजवंश' का एक शाखा है। इसी विषय में डी. आर. रेग्मी आगे लिखते है कि इतिहासकारों ने गुप्तों के अहीरों के रूप में जाति भेद के द्वारा स्थिति को और स्पष्ट किया है, जो न केवल दो राजवंशों के बीच पहचान का समर्थन करता है बल्कि साम्राज्यवादी गुप्तों की जाति की प्रकृति की भी पुष्टि करता है।

Continued in Comment Section..!!

यदुवंश राष्ट्र राजनायक ठाकुर मर्दनसिंह जयंती 24 अगस्त के दिन ट्विटर पर हैशटैग  #यादव_वीर_ठाकुर_मर्दनसिंह को सुबह 10बजे स...
23/08/2023

यदुवंश राष्ट्र राजनायक ठाकुर मर्दनसिंह जयंती 24 अगस्त के दिन ट्विटर पर हैशटैग
#यादव_वीर_ठाकुर_मर्दनसिंह
को सुबह 10बजे से अधिक से अधिक ट्विट कर एकता का परिचय दें।
#यादव_वीर_ठाकुर_मर्दनसिंह
#सनातन

सरदार जीवाजी राजे गवली का जन्म महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग ज़िले के एक प्रतिष्ठित यादव (गवली) सरदार श्री बाबाजी राव गवली के...
04/08/2023

सरदार जीवाजी राजे गवली का जन्म महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग ज़िले के एक प्रतिष्ठित यादव (गवली) सरदार श्री बाबाजी राव गवली के यहां हुआ। मालू जी और आप दो भाई थे । अखंड स्वराज के प्रतीक मराठा साम्राज्य के पतन के बाद शिवाजी महाराज के नक्शे कदम पर चलने का प्रयास करने वाली पेशवाई हुकूमत में पिता श्रीबाबा जी राव के बाद आप दोनो भाइयों ने भी बतौर सामंत और सरदार अपनी सेवाएं दे पेशवाई हकूक को मजबूती प्रदान की।

वीरता और कूटनीति में माहिर श्री जीवाजी राजे गवली, पेशवा महराज बालाजी बाजीराव के काफ़ी विश्वास पात्र थे।
आपसी तालमेल के आभाव में जब एक मराठा सरदार तुलाजी आंग्रे ने स्वतंत्र शासन की लालसा में पेशवा महाराज से विद्रोह कर दिया तब 1755 और 1756 में हुए सुवर्णदुर्ग और विजयदुर्ग के निर्णायक युद्धों में बतौर पेशवा सेना का प्रतिनिधि रणकौशल और कूटनीति से आंग्रे को संधि समझौते पर मजबूर कर दिया।
बालाजी बाजीराव पेशवा के द्वारा जीवाजी राजे को भेजे खतनामे की नक्ल पोस्ट के तस्वीर में अटैच की गई है। यह ख़त आज भी पुणे के पेशवा दफ्तर में मौजूद है।
पेशवाई हकूक को मजबूती देने में इन्होंने जो भी योगदान दिए उन घटनाओं का "पेशवाइचे दिव्य तेज" नामक किताब में ज़िक्र है।
1758 में जब लुटेरे अहमद शाह अब्दाली की औलाद तैमूर शाह दुर्रानी को श्रीमंत रघुनाथ जी राव पेशवा के नेतृत्व में मराठा सेना ने लाहौर से मार भगाया था इस युद्ध में भी श्रीमंत जीवाजी का जंगजू लश्कर मौजूद था।

और संभवतः 1761पानीपत के तीसरे युद्ध में भी वतन परस्त जीवाजी राजे का लश्कर आतताई अहमद शाह की सेना से बहादुरी से लड़ा था।
मराठा साम्राज्य और पेशवाई हकूक के प्रति आजीवन वफादार रहे श्री जीवाजी के वंशज बाद में जलगांव जिले में चालीसगांव नामक इलाके में जागीर बसा आबाद हुए।

इस महत्वपूर्ण घटना से रूबरू कराने के लिए हमारी टीम श्री विजय सिंह के प्रति आभार प्रकट करती है।
#यदुवंश #अहीर #यादव #आयर #गवली #गोप

श्री आल्हा प्राकट्य उत्सव पर सर्वप्रथम उस जननी रानी देवलदे को प्रणाम जिनकी कोख से ऐसे कालजई महापराक्रमी योद्धा हुए। आल्ह...
25/05/2023

श्री आल्हा प्राकट्य उत्सव पर सर्वप्रथम उस जननी रानी देवलदे को प्रणाम जिनकी कोख से ऐसे कालजई महापराक्रमी योद्धा हुए। आल्हा ऊदल की माता का नाम रानी देवलदे था जिन्हें देव कुंवरी, देवकी, देवल कई नामों से जाना जाता है जो ग्वालियर के तदकालीन (गोप अधिपति) यादव नरेश राजा दलवाहन/दलपत सिंह की राजकन्या थीं। रानी देवलदे और दसराज के विवाह के लिए चंदेल सम्राट परमल ने स्वयं राजा दलवाहन से आग्रह किया था।
आल्हा ऊदल का उनकी माता के प्रति प्रगाढ़ सम्मान और प्रेम आल्हा खंड के इन छंदों से ज्ञात होता है जब रानी देवलदे का देहांत हो जाता है तब आल्हा कहते हैं
" मैया देवल सी ना मिलिहें, भैया न मिले वीर मलखान!
पीठ परन तो उदय सिंह है, जिन जग जीत लई किरपान "

अजेय योद्धा श्री आल्हा के सहयोगी वीर परसू: " बोला परसा कंठी-कान्हा से , दुश्मन तेरा बुरा हो जाये I  मार-मार तेग तलवारों ...
24/05/2023

अजेय योद्धा श्री आल्हा के सहयोगी वीर परसू:
" बोला परसा कंठी-कान्हा से , दुश्मन तेरा बुरा हो जाये I
मार-मार तेग तलवारों से , तेरी दूँगा जान गंवाय II
घोड़ा बढ़ाया है परसा ने , अब कंठी पर पहुंचा जाय I
ढ़ाल पर रोक सरोही परसा, उस के वार को गया बचाय II

“परसू पंवारा” एक लोक-काव्य है जो कभी उत्तप्रदेश के उत्तरी अंजलों के इलाकों में गूँजा करता था व सम्मान से गाया जाता था I ये पूर्वाञ्चल के भोजपुरी “लोरिकायन” और आल्हा गायन की तरह था I
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आल्हा खंड से हमको ज्ञात होता है कि आल्हा ऊदल के ज्यादातर सरदार एवम सहयोगी उन्ही के सजातीय भाई बंधु थे जिनमे से चर्चित पात्र भगुआ/भगौला अहीर (भागल पुर वाले) , डोगर दौवा (बुंदेलखंड) इत्यादि हैं लेकिन वीर परसू और थोंदिया के बारे में लोग काफी कम जानते हैं।

परसू पंवारा काव्य में दो यादव राजकुमारों वीर शिरोमणि परसू और थोन्दू उर्फ थोंदिया के पराक्रम का गुणगान है I पराक्रमी परसू के बाल सुनहरे, कानों में कुण्डल, गले में मोहन-माला, पाँवों में पदम था और हाथ में भारी गदा और कमर पर तलवार रहती थी I वहीं अनुज थोंदिया भी भारी मूंगरी को एक हाथ से घुमाया करता था व दोनों भाई उत्तम नस्ल के घोड़ों की सवारी करते थे Iदोनों भाई बड़े ज़बरदस्त योद्धा व पहलवान थे व शिवजी के भक्त थे I

इन दोनों भाई ने श्री आल्हा-उदल मलखान की सेना में रहते हुए कई युद्धों में शरीक हुए और आल्हा ऊदल से अपनी दोस्ती निभाई I
आज जरूरत है कि हम यदुवंश की धरोहरों को सँभाल कर अगली पीढ़ी को दे दें ताकि ये ज़िंदा रहे ।

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