17/08/2025
#शहीदों_की_दास्तां
17 अगस्त : बेवर गोलीकांड के बाद क्रूर अंग्रेजी सत्ता का दमन-चक्र और गद्दारी
गोलीकांड के दिन योगेश दा अपने क्रांतिकारी साथियों सहित अलावलपुर के भट्ठे पर एक गुप्त मीटिंग कर रहे थे, जिसमें अनेक क्रांतिकारी — श्री मुकुंद सिंह, जगदीश शुक्ला, उदयनारायण, बद्री प्रसाद पहलवान, बैजनाथ, विशेश्वर सिंह नम्बरदार, लालता प्रसाद, साहब सिंह और शौकत अली आदि मौजूद थे। उस समय श्री शौकत अली का मकान बेवर में क्रांतिकारियों के ठहरने का प्रमुख स्थान बन गया था। श्री हीरालाल दीक्षित का योगेश बाबू से पहले से ही गहरा संपर्क था।
योगेश दा ने बेवर की इस घटना का बदला लेने की योजना बनाई थी, परंतु बाद में साथियों से विमर्श के बाद आम लोगों की बर्बादी को सोचकर यह योजना स्थगित कर दी गई।
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आम जन पर टूटा पुलिसिया कहर…
पुलिस का आतंक बेवर के इस नृशंस और लोमहर्षक अत्याचार के बाद भी समाप्त नहीं हुआ। पुलिस ने बेरहमी से जनता को कुचला। घरों की तलाशी ली गई और गिरफ्तारियों का दौर चला। युवा और तरुणों को पकड़कर पुलिस आतंकित करती, घंटों थानों में बैठाकर यातनाएँ देती।
सैकड़ों निर्दोष नागरिक पकड़े गए। पुलिस ने बस्ती को निर्दयतापूर्वक लूटा। मोहल्लों में पचासों नागरिकों की निर्ममता से पिटाई हुई। डकैती, आगजनी और राजद्रोह के मुकदमे चलाए गए। इन सब कार्रवाइयों में कई पुलिस के चापलूसों व दलालों ने घोर देशद्रोही भूमिका अदा की। उन्होंने पुलिस के पक्ष में स्वयं गवाहियाँ दीं अथवा गवाहियाँ दिलाईं।
किन्तु, सामान्य जनता के मनोबल को, बावजूद निराशा और पस्ती के माहौल के, तोड़ा न जा सका। अफसोस है कि उन राष्ट्रद्रोहियों में से कुछ लोग भलमंसाहत और देशभक्ति का नकाब डाले तब भी और आज तक भी जनता की आँखों में धूल झोंकते रहे हैं। इनका नामोल्लेख करना अपनी कलम को कलंकित करना ही होगा।
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गिरफ्तारियाँ और सजाएँ
उस दौरान अनेक लोग गिरफ्तार किए गए, जिनमें —
• श्री मदन मोहन दीक्षित,
• श्री देवस्वरूप भारद्वाज,
• श्री बाबूराम झा,
• श्री सिद्ध गोपाल शुक्ल,
• श्री सूबेदार आर्य,
• श्री शौकत अली,
• डॉ. प्रेमचंद्र दुबे,
• श्री भोलनाथ दीक्षित
• श्री मूलचन्द्र पाठक आदि प्रमुख थे।
कई लोग महीनों और सालों तक फरार रहकर गोरी सरकार की नींद हराम करते रहे और लंबी अवधि के बाद ही पकड़े जा सके। इनमें श्री परमानंद गुप्ता, श्री ज्ञानस्वरूप गुप्ता और श्री बाबूराम ताम्बूलरत्न के नाम उल्लेखनीय हैं।
बेवर गोलीकांड में सरकार की नजर में सर्वाधिक खतरनाक व्यक्ति श्री बाबूराम झा और श्री गया प्रसाद भारद्वाज थे। प्रत्येक को 7 वर्ष की कैद, ₹25 का दंड, 30 बेंत और 3 माह की अतिरिक्त सजा दी गई। इसके बाद श्री मदन मोहन दीक्षित आदि 13 लोगों को 6 वर्ष की कैद और ₹20 का दंड मिला। अन्य को इससे कम सजाएँ दी गईं। अपील में बाद में सजाएँ कम हो गईं।
इन सिंह-शावकों ने बहादुरी से सजा काटी ही, साथ ही जेल में भी कदम-कदम पर संघर्ष कर रिकॉर्ड कायम किया। श्री झा और उनके साथियों ने जेल में भूख हड़ताल की, अनेक लड़ाइयाँ लड़ीं और अत्याचारों का विरोध किया।
गोलीकांड में मौके पर घायलों सहित आगे-पीछे कुल मिलाकर 38 लोगों को जेल काटनी पड़ी थी। सैकड़ों नागरिकों को पुलिस ने पकड़कर थाने में सताया और यातनाएँ देने के बाद ही छोड़ा। उनसे जुर्माना वसूला गया।
जुर्माना अदा करने में देरी करने वालों को नंगा कर निर्ममता से पीटा गया। लगभग 70 नागरिक घायल हुए और ₹25,000 से अधिक की धनराशि बेवर के नागरिकों से प्रताड़ित कर वसूल की गई।
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आंदोलन की लपटें मैनपुरी और आस-पास तक फैलीं
बेवर के इस बलिदान से पूरे मैनपुरी में जगह-जगह तिरंगा लेकर बाल, युवा और बुजुर्ग निकल पड़े। कोसमा, करहल, मैनपुरी आदि स्थानों पर जोरदार आंदोलन हुए। सैकड़ों गिरफ्तारियाँ हुईं।
कोसमा में तो अंग्रेजों ने क्रांतिवीरों को रोकने के लिए चार मशीनगनें तक टीले पर लगा दी थीं और घोषणा कर दी कि यदि कोई भी व्यक्ति अपने घर से निकलेगा तो भून दिया जाएगा।
इस तरह बेवर से निकली शहीदों की रक्तज्वाला ने पूरे मैनपुरी ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों तक अंग्रेजी सत्ता की चूलें हिला डालीं।
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शहीदों को कोटिशः नमन…
इंक़लाब ज़िंदाबाद
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