शहीद मेला बेवर मैनपुरी उ0प्र0

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शहीद मेला,
( स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों को संजोने का एक संकल्प )

आइए हम इस संकल्प में शामिल हों, ताकि शहीदों के विचार और उनके सम्मान का यह आयोजन पूरे देश में नई पीढ़ी तक पहुँचाया जा सके।
जय हिंद
संपर्क : इं. राज त्रिपाठी
9760155552

54वें शहीद मेले का आज शहीद मंदिर में पोस्टर रिलीज़ - शहीद मंदिर की दीवारों के बीच आज जो पोस्टर रिलीज़ हुआ, वह सिर्फ काग़...
28/11/2025

54वें शहीद मेले का आज शहीद मंदिर में पोस्टर रिलीज़ -
शहीद मंदिर की दीवारों के बीच आज जो पोस्टर रिलीज़ हुआ, वह सिर्फ काग़ज़ नहीं था, वह एक वादा था। एक सांस लेती हुई स्मृति, जो उन नौजवानों की चिताओं से उठी थी जिन्होंने अपना वर्तमान, हमारे भविष्य पर न्यौछावर कर दिया था।

आज शहीद मेला 2026 का पोस्टर जब बेवर के शहीद मंदिर में जारी हुआ, तो लगा जैसे यहां मौजूद आजादी के नायकों की मूर्तियाँ भी थोड़ी और गर्व से चमक उठीं हों। समिति के साथ खड़े हर चेहरे पर गर्व था, और आंखों में वही धधकता हुआ संकल्प - शहीदों के सपनों को संजोए रख ने का।

यह सिर्फ एक आयोजन नहीं है। यह उस मिट्टी का प्रण है, जिसने भगतसिंह, अशफाक, बिस्मिल और उन अनगिनत गुमनाम योद्धाओं के लहू की खुशबू को थाम रखा है।
यह उन परिवारों की विरासत है, जिनके घरों ने अपने उजाले देश को दे दिए।
इस पोस्टर विमोचन के दौरान उपस्थित सभी ने आज संकल्प लिया कि आने वाला शहीद मेला केवल भव्य नहीं होगा—वह ऐसा होगा जिसमें हर आगंतुक को अपने भीतर एक चिंगारी जलती हुई महसूस हो।
ऐसा मेला, जहां इतिहास किताबों से नहीं, लोगों की धड़कनों से बोले।
ऐसा मेला, जहां हर कदम पर शहीदों की परछाईं साथ चलती महसूस हो।

शहीदों के प्रति यह नमन सिर्फ आज के लिए नहीं—हमेशा के लिए है।
यही संकल्प, यही श्रद्धा, यही निरंतरता हमारे भविष्य की सबसे बड़ी आशा है।


 #शहीदों_की_दास्तां17 अगस्त : बेवर गोलीकांड के बाद क्रूर अंग्रेजी सत्ता का दमन-चक्र और गद्दारीगोलीकांड के दिन योगेश दा अ...
17/08/2025

#शहीदों_की_दास्तां
17 अगस्त : बेवर गोलीकांड के बाद क्रूर अंग्रेजी सत्ता का दमन-चक्र और गद्दारी

गोलीकांड के दिन योगेश दा अपने क्रांतिकारी साथियों सहित अलावलपुर के भट्ठे पर एक गुप्त मीटिंग कर रहे थे, जिसमें अनेक क्रांतिकारी — श्री मुकुंद सिंह, जगदीश शुक्ला, उदयनारायण, बद्री प्रसाद पहलवान, बैजनाथ, विशेश्वर सिंह नम्बरदार, लालता प्रसाद, साहब सिंह और शौकत अली आदि मौजूद थे। उस समय श्री शौकत अली का मकान बेवर में क्रांतिकारियों के ठहरने का प्रमुख स्थान बन गया था। श्री हीरालाल दीक्षित का योगेश बाबू से पहले से ही गहरा संपर्क था।

योगेश दा ने बेवर की इस घटना का बदला लेने की योजना बनाई थी, परंतु बाद में साथियों से विमर्श के बाद आम लोगों की बर्बादी को सोचकर यह योजना स्थगित कर दी गई।



आम जन पर टूटा पुलिसिया कहर…

पुलिस का आतंक बेवर के इस नृशंस और लोमहर्षक अत्याचार के बाद भी समाप्त नहीं हुआ। पुलिस ने बेरहमी से जनता को कुचला। घरों की तलाशी ली गई और गिरफ्तारियों का दौर चला। युवा और तरुणों को पकड़कर पुलिस आतंकित करती, घंटों थानों में बैठाकर यातनाएँ देती।

सैकड़ों निर्दोष नागरिक पकड़े गए। पुलिस ने बस्ती को निर्दयतापूर्वक लूटा। मोहल्लों में पचासों नागरिकों की निर्ममता से पिटाई हुई। डकैती, आगजनी और राजद्रोह के मुकदमे चलाए गए। इन सब कार्रवाइयों में कई पुलिस के चापलूसों व दलालों ने घोर देशद्रोही भूमिका अदा की। उन्होंने पुलिस के पक्ष में स्वयं गवाहियाँ दीं अथवा गवाहियाँ दिलाईं।

किन्तु, सामान्य जनता के मनोबल को, बावजूद निराशा और पस्ती के माहौल के, तोड़ा न जा सका। अफसोस है कि उन राष्ट्रद्रोहियों में से कुछ लोग भलमंसाहत और देशभक्ति का नकाब डाले तब भी और आज तक भी जनता की आँखों में धूल झोंकते रहे हैं। इनका नामोल्लेख करना अपनी कलम को कलंकित करना ही होगा।



गिरफ्तारियाँ और सजाएँ

उस दौरान अनेक लोग गिरफ्तार किए गए, जिनमें —
• श्री मदन मोहन दीक्षित,
• श्री देवस्वरूप भारद्वाज,
• श्री बाबूराम झा,
• श्री सिद्ध गोपाल शुक्ल,
• श्री सूबेदार आर्य,
• श्री शौकत अली,
• डॉ. प्रेमचंद्र दुबे,
• श्री भोलनाथ दीक्षित
• श्री मूलचन्द्र पाठक आदि प्रमुख थे।

कई लोग महीनों और सालों तक फरार रहकर गोरी सरकार की नींद हराम करते रहे और लंबी अवधि के बाद ही पकड़े जा सके। इनमें श्री परमानंद गुप्ता, श्री ज्ञानस्वरूप गुप्ता और श्री बाबूराम ताम्बूलरत्न के नाम उल्लेखनीय हैं।

बेवर गोलीकांड में सरकार की नजर में सर्वाधिक खतरनाक व्यक्ति श्री बाबूराम झा और श्री गया प्रसाद भारद्वाज थे। प्रत्येक को 7 वर्ष की कैद, ₹25 का दंड, 30 बेंत और 3 माह की अतिरिक्त सजा दी गई। इसके बाद श्री मदन मोहन दीक्षित आदि 13 लोगों को 6 वर्ष की कैद और ₹20 का दंड मिला। अन्य को इससे कम सजाएँ दी गईं। अपील में बाद में सजाएँ कम हो गईं।

इन सिंह-शावकों ने बहादुरी से सजा काटी ही, साथ ही जेल में भी कदम-कदम पर संघर्ष कर रिकॉर्ड कायम किया। श्री झा और उनके साथियों ने जेल में भूख हड़ताल की, अनेक लड़ाइयाँ लड़ीं और अत्याचारों का विरोध किया।

गोलीकांड में मौके पर घायलों सहित आगे-पीछे कुल मिलाकर 38 लोगों को जेल काटनी पड़ी थी। सैकड़ों नागरिकों को पुलिस ने पकड़कर थाने में सताया और यातनाएँ देने के बाद ही छोड़ा। उनसे जुर्माना वसूला गया।

जुर्माना अदा करने में देरी करने वालों को नंगा कर निर्ममता से पीटा गया। लगभग 70 नागरिक घायल हुए और ₹25,000 से अधिक की धनराशि बेवर के नागरिकों से प्रताड़ित कर वसूल की गई।



आंदोलन की लपटें मैनपुरी और आस-पास तक फैलीं

बेवर के इस बलिदान से पूरे मैनपुरी में जगह-जगह तिरंगा लेकर बाल, युवा और बुजुर्ग निकल पड़े। कोसमा, करहल, मैनपुरी आदि स्थानों पर जोरदार आंदोलन हुए। सैकड़ों गिरफ्तारियाँ हुईं।

कोसमा में तो अंग्रेजों ने क्रांतिवीरों को रोकने के लिए चार मशीनगनें तक टीले पर लगा दी थीं और घोषणा कर दी कि यदि कोई भी व्यक्ति अपने घर से निकलेगा तो भून दिया जाएगा।

इस तरह बेवर से निकली शहीदों की रक्तज्वाला ने पूरे मैनपुरी ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों तक अंग्रेजी सत्ता की चूलें हिला डालीं।



शहीदों को कोटिशः नमन…

इंक़लाब ज़िंदाबाद

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 #शहीदों_की_दास्तां  #शहीदोंकीगाथा16 अगस्त 1942 – शहीदों की अंत्येष्टिजैसा कि पहले ही लिख चुका हूँ—जहाँ पुलिस संघर्ष के ...
16/08/2025

#शहीदों_की_दास्तां #शहीदोंकीगाथा
16 अगस्त 1942 – शहीदों की अंत्येष्टि

जैसा कि पहले ही लिख चुका हूँ—जहाँ पुलिस संघर्ष के दौरान जमुनाप्रसाद त्रिपाठी वहीं स्थल पर मस्तक पर गोली खाकर शहीद हो चुके थे, वहीं विद्यार्थी कृष्ण कुमार को पाँच गोलियाँ लगी थीं और सीताराम गुप्त को तीन। दोनों वहीं ज़मीन पर गंभीर रूप से घायल अवस्था में पड़े थे। साथ ही लगभग एक दर्जन क्रांतिवीर—यथा भोलानाथ दीक्षित, लालता प्रसाद, सुरजन सिंह, बाबूराम, रामस्वरूप, आनंद स्वरूप आदि—गोली वर्षा में घायल हुए थे।

घायलों और शहीदों को खींचकर पुलिस ने थाने के अंदर डाल दिया। पुलिस की क्रूरता का आलम यह था कि वहाँ निर्जीव और घायल शरीरों में कोई अंतर न था। “पानी… पानी…” की घायलों की आवाज पुलिस की गलियों और नृशंसता में दबकर रह गई। वहीं हवालात के सींखचों के अंदर रामलाल महाशय अपने भाई को पानी देने की बार-बार गुहार लगा रहे थे, पर यह गुहार नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गई। वे चीखते-बिलखते, गुहार लगाते रहे और उनके साथ ही बंद सूबेदार आर्य भी यह हृदयविदारक दृश्य नम आँखों से देखते रहे।

शाम को जेल वैन में अब तक शहीद हो चुके जमुनाप्रसाद त्रिपाठी, सीताराम गुप्त और अब तक सांस ले रहे विद्यार्थी कृष्ण कुमार के शरीर रखे गए। साथ ही, थाने में पहले से बंद क्रांतिवीर—रामलाल महाशय, सूबेदार आर्य और गयाप्रसाद भारद्वाज आदि—को भी हथकड़ियों में जकड़ कर वैन में बैठा दिया गया। बाद में इन्हीं लोगों ने बताया कि मैनपुरी जेल के रास्ते इसन नदी से पहले ही कृष्ण कुमार ने एक ज़ोर की सांस ली और भारत माता के चरणों में अपना सर्वोच्च बलिदान देकर शहीदों के साथ जा खड़े हुए।

क्या मन:स्थिति रही होगी उन बेबस बंदियों की, जिनके सामने उनके तीन साथियों के शव पड़े थे और अन्य देशभक्त शहादत की राह पर थे!

मैनपुरी में पोस्टमार्टम के बाद शहीदों के शव मिलने की आशा थी। इस पर शहीद जमुनाप्रसाद त्रिपाठी के भतीजे रघुवीर सहाय त्रिपाठी, उनके मित्र बांकेलाल दीक्षित और सीताराम गुप्त के छोटे भाई पुत्तूलाल गुप्त मैनपुरी के लिए रवाना हुए। वहाँ कलेक्टर से मिले, पर कोई हल न निकला। प्रशासन ने पार्थिव शरीर देने से साफ़ मना कर दिया।

फिर मैनपुरी कोतवाली के इंस्पेक्टर हरप्रसाद ने बहुत मुश्किल से इन तीनों को तैयार किया कि शहीदों के पार्थिव शरीर को सुबह तड़के लगभग 4 बजे किसी निर्जन स्थान पर ले जाकर जला दिया जाए। मिट्टी का तेल और लकड़ी लदी वैन में शवों के साथ ये लोग बैठे। रात के सन्नाटे को चीरती गाड़ी करहल रोड पर सिंहपुरा की हर के पास रुकी। वहाँ लकड़ियों पर शव रखकर मिट्टी का तेल डाला गया और अंत्येष्टि के नाम पर अधजले शवों को ही नहर में प्रवाहित कर दिया गया।

तीनों शहीदों की पूरी अंत्येष्टि क्रिया रघुवीर सहाय त्रिपाठी ने ही की, क्योंकि शहीद कृष्ण कुमार के घर से कोई आ नहीं पाया था और पुत्तूलाल गुप्त भाई का शव देखकर बेसुध हो गए थे। यदि ये लोग उस समय मौजूद न होते, तो आज हमें पता भी न चलता कि इन तीनों शहीदों के साथ क्या, कहाँ और कैसे किया गया।

आगे—इस घटना के पश्चात नगर की स्थिति, पुलिस का आतंक और क्रांतिकारी दादा योगेश चंद्र चटर्जी की यहाँ उपस्थिति के विषय पर…
क्रमशः…

 #शहीदों_की_दास्तां 15 अगस्त 1942 दिन शनिवार समय 11 से 11:30 के मध्य ब्रिटिश पुलिस से हुए संघर्ष में  #शहीद हुए थे बेवर ...
15/08/2025

#शहीदों_की_दास्तां
15 अगस्त 1942 दिन शनिवार समय 11 से 11:30 के मध्य ब्रिटिश पुलिस से हुए संघर्ष में #शहीद हुए थे बेवर नगर के तीन #आज़ादी के मतवाले...

आज 15 अगस्त का दिन जहां देश की आज़ादी की ख़ुशियाँ लेकर आता है वही बेवर नगर इसी दिन आज़ादी से पाँच वर्ष पहले यानी 15 अगस्त 1942 को तीन रणबांकुरों ने भारतमाता का अपने रक्त से अभिषेक किया था।इसी दिन अपनी आंखों में आज़ादी का सपना संजोए #विद्यार्थीकृष्णकुमार (उम्र 14 वर्ष) #जमुनाप्रसादत्रिपाठी (40वर्ष) व #सीतारामगुप्त (42 वर्ष) ने थाने के ठीक सामने पुलिस से संघर्ष करते आज़ादी के हवन में अपने प्राणों की आहुति दे दी।
दरअसल 14 अगस्त को छात्रों द्वारा थाने पर झंडा फहरा दिया था। ये उस अंग्रेज़ी सत्ता जिसके राज में कभी सूरज नहीं डूबता था, के अहम पर बहुत बड़ी चोट थी। इसके दमन के लिए 14 ,15 की रात थाने पर ढेर सारी हथियारबंद पुलिस आ गई। रात को दमन की कार्यवाहियां शुरू हुईं। धारा 144 लगा दी गई।गिरफ्तारियां होने लगी। नगर में रात के सन्नाटे रौंदते पुलिसिया बूट की आवाज नागरिकों के मन में दहशत भरने की कोशिश थी। एक कुत्ते के पुलिस को काटने पर पुलिस ने उसे गोली मार दी थी। इस गोली की आवाज़ ने रात को और दहशत से भर दिया। 15 अगस्त को तय कार्यक्रम के अनुसार छात्रों को फिर जलूस निकलना था। चारो ओर पुलिस और दहशत थी।करपिया से मिडिल स्कूल तक लगभग 5 किलोमीटर पहुँचना आसान न था पर कृष्ण कुमार को ये बाधा न रोक पाई। और वो खेतों की पगडंडियों के रास्ते स्कूल पहुंच ही गया। जहां उनके साथी जगदीश नारायण त्रिपाठी के साथ इंतज़ार कर रहे थे। माहौल को देखते हुए जगदीश त्रिपाठी ने जलूस में लाठी डंडा साथ न लेकर निहत्थे ही जुलूस में चलने का प्रस्ताव रखा । जिसका विरोध कृष्ण कुमार ने ये कह कर किया 'कि गोरी सरकार ने हमारे सारे हथियार तो पहले ही छीन लिए है अब हम अपना अंतिम हथियार कैसे छोड़ दें।' इसका समर्थन बाकी साथियों ने कर दिया।तो अब तय हो गया लाठी डंडा साथ लेकर जुलूस में चलेंगे। उस दिन तीज की पर्व था और शनिवार का दिन। जुलूस की शक्ल में छात्र भारतमाता की जय, इंक़लाब ज़िन्दाबाद, महात्मा गांधी की जय के गगनभेदी नारे लगाते हुए मिडिल स्कूल निकल दिए। साथ में चल रहे थे सत्याग्रही का चोला धारण किये गयाप्रसाद भारद्वाज। और उनके साथ झंडा गीत गाते आगे आगे चल रहे वियार्थी कृष्णकुमार और जगदीश नारायण त्रिपाठी। जुलूस जिस गली,सड़क से गुजरता नगर के लोग अपने आप साथ चल देते। धीरे धीरे वो जुलूस थाने से 100 मीटर दूर नाले की पुलिया पर पहुंचा। जहां पुलिस का आगे न बढ़ने की हिदायत देता चेतावनी का एक बोर्ड लगा था। वहां जगदीश नारायण त्रिपाठी का पुलिस को लानत मलामत करता एक जोरदार भाषण हुआ। चेतावनी तोड़ फेक दी गई।औरप आगे बढ़ चले आज़ादी के मतवाले। थाने पर पहले से ही तहसीलदार निजामुद्दीन भी वहां पर पहले से ही मौजूद था और वहीं कल चौराहे पर लाठियों का प्रसाद पा चुके, थानेदार आले अली, सिपाही मखताब सिंह व महताब खां मन ही मन इन क्रांतिकारियों के प्रति मन में प्रतिशोध की धधकती ज्वाला में जल रहे थे। जुलूस के थाने पहुंचने पर वहां खड़ा हल्का इंसपेक्टर, सत्याग्रही के रूप में चल रहे गयाप्रसाद भारद्वाज को अपनी ओर जोर से खींचते हुए गुस्से से बोला- क्या कहते हो? समवेत स्वर से क्रांतिकारी बोले गिरफ्तार होना चाहते हैं। गयाप्रसाद भारद्वाज को खींचकर गिरफ्तार करने की कोशिश करते देखते ही, लाहीम शहीम शरीर के मालिक, पहलवान से बलिष्ठ जमुनाप्रसाद त्रिपाठी ने आगे बढ़कर हल्का इंस्पेक्टर की कलाई पकड़ ली। जिसे वो काफी कोशिश के बाद भी न छुड़ा सका। ये देख क्रांति के पुजारियों का जोश आसमान छूने लगा और भारतमाता की जय और इंक़लाब ज़िन्दाबाद के नारों से आसमान गूंजने लगा। तो हल्का इंसपेक्टर ने तहसीलदार निजामुद्दीन की ओर देखा।निज़ामुद्दीन ने आले अली को देखा। आंखों आंखों में इशारा हुआ और आलेअली कि पहली ही गोली उस क्षण क्रांति की प्रतिमूर्ति जमुनाप्रसाद त्रिपाठी के मस्तिष्क को चीरती हुई निकल गई।और हिंदुस्तान की आज़ादी का सपना आंखों में संजोए वे भारतमाता के आंचल में सदा के लिए सो गए। ये देख, कक्षा 6 के छात्र 14 वर्ष के विद्यार्थी कृष्ण कुमार ने आले अली की पिस्तौल छीनने का लिए झपटे।परन्तु प्रतिशोध की ज्वाला में जलता आले अली तो पहले ही तैयार था। उसने सीधे बालक कृष्णकुमार पर गोली चला दी।पहली गोली बाँह में लगी परन्तु क्रांति के दीवाने को इसकी परवाह कहाँ। बाँह झटक आगे बढ़ा तो अगली गोली जांघ में लगी। 14 वर्ष का वो बालक ज़मीन पर गिर गया परन्तु आंखों में सजा सपना अभी टूटा नहीं था। एक बार फिर अपनी सारी शक्ति समेट अंतिम झपट्टा मारा पर आलेअली की पिस्तौल तक हाथ पहुँचे उनसे पहले ही तीन गर्म जलती गोलियां उस चौदह वर्ष के बालक के पेट में समा गईं। वही थाने के सामने बायीं तरफ खड़े नीम के पेड़ के पास दो गोलियाँ सीताराम गुप्त के पेट में लगीं और वे गिर पड़े। वहैं सैकड़ों गोलियों से अनेको लोग घायल हुए परन्तु किसी तरह वहाँ से निकल गए।पुलिस ने शहीद हो चुके जमुनाप्रसाद त्रिपाठी व घायल अवस्था में विद्यार्थी कृष्ण कुमार व सीताराम गुप्त को खींच कर थाने के अन्दर खींचकर अपमानजनक तरीके से डाल दिया। उस दिन सीताराम गुप्त के भाई रामलाल महाशय थाने के अन्दर ही बंद थे और अपने भाई सीताराम गुप्त व कृष्ण कुमार की पानी की पुकार के साथ सिपाहियों द्वारा किया जा रहा अपमानजनक व्यवहार देख कर व्याकुल हो रहे थे। पानी पिलाने के लिए लगातार सिपाहियों से गुहार लगा रहे थे पर सुनने वाला कोई न था। शनै शनै दोनों क्रांतिवीरों की पानी की चाह कम हो गई। आवाज़ मध्यम हो गई लगभग चार घन्टे बाद पुलिस गाड़ी में शहीद हो चुके जमुनाप्रसाद त्रिपाठी, व अभी तक अंतिम सांस ले रहे विद्यार्थी कृष्णकुमार व सीताराम गुप्त को लेकर मैनपुरी रवाना होगये।रास्ते में भोगांव पहुचते पहुंचते विद्यार्थी कृष्ण कुमार ने जोर की हिचकी के साथ अंतिम सांस ली और वो किशोर शहीदों की टोली में अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो गया। सीताराम गुप्त भी अब अंतिम सांस ले चुके थे। इन शहीदों ने बेवर नगर की माटी का अभिषेक अपने रक्त से कर इसे चंदनीय, वंदनीय कर दिया।
16 अगस्त 1942 की घटना कल
क्रमशः

#शहीदमंदिर #भारतछोड़ो #करोयामरो #आज़ादी #शहीदोंकीगाथा #स्वतंत्रतादिवस #15अगस्त

वीरांगना लावण्या प्रभा घोष को जन्म जयंती पर सादर नमन... #शहीदोंकीगाथा      #शहीदमेला  #14अगस्त    #आज़ादी    # #भारतछोड़ो
14/08/2025

वीरांगना लावण्या प्रभा घोष को जन्म जयंती पर सादर नमन...

#शहीदोंकीगाथा #शहीदमेला #14अगस्त #आज़ादी # #भारतछोड़ो

   #शहीदों_की_दास्तां     #शहीदोंकीगाथा आज ही के दिन यानी 14 अगस्त 1942 ,  #आज़ादी से ठीक पांच वर्ष पहले  #बेवर नगर विदेश...
14/08/2025

#शहीदों_की_दास्तां #शहीदोंकीगाथा
आज ही के दिन यानी 14 अगस्त 1942 , #आज़ादी से ठीक पांच वर्ष पहले #बेवर नगर विदेशी दासता से हो गया था आज़ाद....
मिडिल स्कूल (वर्तमान में जूनियर हाईस्कूल पुराना बाजार)के कक्षा 6 व 7 के छात्र व नगर के नौजवान क्रांतिवीर (कक्षा 6के छात्र 14वर्षीय विद्यार्थी कृष्ण कुमार, कक्षा 7 के छात्र 15 वर्षीय जगदीश नारायण त्रिपाठी, व नगर के क्रांतिवीर नौजवान गयाप्रसाद भारद्वाज, बाबूराम झा,मदन मोहन दीक्षित, बाबूराम गुप्ता,रामलाल महाशय,सूबेदार आर्य, शम्भूदयाल, मन्नीलाल, मनफूल, सोनेलाल, भारतचंद्र गुप्ता, परमानंद,आनंद स्वरूप गुप्ता, मुंशीलाल आदि) बेवर नगर में अंग्रेजी सत्ता के सबसे बड़े प्रतीक पुलिस थाने पर तिरंगा झंडा फहराने का संकल्प लेकर नगर को अंग्रेजी राज की दासता से मुक्त कराने चल पड़े। और थाने पर तिरंगा झंडा फहरा दिया। नन्हे क्रांतिवीरों के तेवर के आगे बेवर थाना इंचार्ज आले अली की पिस्तौल और सिपाहियों की बंदूके नतमस्तक हो गईं। ये अंग्रेजी सत्ता के प्रतीक बेवर थाने का आत्मसमर्पण था इन नन्हे क्रांतिवीरों के समक्ष। इस जीत से उत्साहित बाल क्रांतिकारी मिठाईयां बाटने लगे। कुछ ही घण्टों के लिए सही पर 14 अगस्त 1942 को मैनपुरी जनपद का यह नगर बेवर अग्रेजी दासता से आज़ाद हो गया था। पर आलेअली ने जिलाधिकारी से क्रांतिकारियों को कुचलने के लिए और कुमुक व सहायता भेजने की याचना की। आश्वासन मिलने के बाद, पुलिस आतंक मचाने लगी। डाकखाने की तोड़फोड़ की जांच के लिए पहुंची पुलिस का व्यहार जनता को आतंकित और उत्तेजित करने वाला था। पुलिस ने गयाप्रसाद भारद्वाज को डाकखाने के पास ही उनके घर की ओर ,गिरफ्तार कर ले जाने लगी। जैसे ही ये सूचना मिठाई खाते, जश्न मनाती बाल सेना को लगी तो यह बाल सेना अपने नेता जगदीश नारायण त्रिपाठी के नेतृत्व में लाठी डंडा और जो भी हाथ मे पड़ा लेकर दौड़ पड़ी और पुलिस की पलटन को चौराहे पर घेर लिया। तब तक उत्तेजित नगर के लोग भी आ गए। गयाप्रसाद भारद्वाज को पुलिस से छीन लिया, तो थानेदार आलेअली ने पिस्तौल निकाल, लोगों पर तान दी। लगा कि अब गोली चली। परन्तु बंदूकों,तोपों,मशीनगनों से सज्जित विदेशी सत्ता से जो आज़ादी के दीवाने न डरते थे फिर उनके सामने इस पिस्तौल की तो औकात ही क्या थी। कि तभी अचानक भीड़ ने एक नया नेता पैदा कर दिया और एक जोशीले युवक मदनमोहन दीक्षित ने सीने की बटन खोलकर पिस्तौल के सामने अड़ा दी,और आलेअली की ओर चीखकर कहा " कि चला गोली देखते हैं कि तेरी गोली मजबूत है या मेरा सीना" इस जोश ने पुलिस के हौसले पस्त कर दिए और थानेदार आलेअली व उसके मातहत सिपाही मेहताब खां व मेहताब सिंह साइकिलों पर सवार होकर भागने से पहले बाल सेना की लाठी डंडों का स्वाद तो लेते ही गए।
इस प्रकार आज का दिन अंग्रेजी सत्ता से बेवर की आज़ादी का पहला दिन था।
सभी सेनानियों को नमन...
क्रमशः
#शहीदमेला #14अगस्त
शहीद मेला बेवर मैनपुरी उ0प्र0

12 वर्ष की छोटी सी उम्र में देश पर बलिदान हो जाने वाली  #शहीद  #कालीबाई को कोटिशः नमन...     #शहीदमेला
20/06/2025

12 वर्ष की छोटी सी उम्र में देश पर बलिदान हो जाने वाली #शहीद #कालीबाई को कोटिशः नमन...
#शहीदमेला

15/04/2025

“मेरी पुस्तक क्रांति की धरोहर , विचार और राष्ट्र”आज उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री आदरणीय श्री स्वतंत्र देव सिंह जी से भेंट हुई।उनसे विचार साझा करना, अपनी पुस्तक “क्रांति की धरोहर” उन्हें भेंट करना और उनके द्वारा अंगवस्त्र और भारत माता की तस्वीर से सम्मानित होना मेरे लिए अत्यंत गौरवपूर्ण क्षण रहा।यह केवल एक पुस्तक या चित्र और अंगवस्त्र का आदान-प्रदान नहीं था, बल्कि यह उस विचारधारा का सम्मान था जो शहीदों के सपनों, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक गौरव से जुड़ी है।श्री सिंह जी की सरलता निसंदेह प्रेरणादायक है।मैं यह क्षण समर्पित करता हूँ उन अनगिनत क्रांतिकारियों को, जिनकी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाना मेरा संकल्प है।जय हिन्द, जय भारत। #शहीद_मेला #रुकना_नहीं #इंक़लाब_ज़िन्दाबाद

दस्तावेज़ इतिहास बोलते हैं...यह रसीद मार्च 1927 की है — उस टोपी की जो शहीद-ए-आज़म भगत सिंह ने खुद खरीदी थी। वही टोपी जो ...
06/04/2025

दस्तावेज़ इतिहास बोलते हैं...

यह रसीद मार्च 1927 की है — उस टोपी की जो शहीद-ए-आज़म भगत सिंह ने खुद खरीदी थी। वही टोपी जो उनका प्रतीक बनी, क्रांति की पहचान बनी।

8 नवंबर 1929 को यह रसीद कोर्ट में सबूत के तौर पर पेश की गई थी। अंग्रेज़ों ने इसे एक गवाह बनाया, पर हम इसे एक गौरव की निशानी मानते हैं।

सोचिए, एक साधारण सी टोपी और उसकी रसीद आज भी हमें याद दिलाती है कि आज़ादी सिर्फ नारा नहीं, बलिदान की दास्तां है।

भगत सिंह जिंदा हैं — हर उस दिल में जो सवाल करता है, जो अन्याय के ख़िलाफ़ खड़ा होता है।





#क्रांति_की_टोपी

आइए मिलते शहीद दिवस के अवसर पर  #शौर्यभूमि   #राजस्थान की राजधानी  #जयपुर में ।जहां रहेगी   #हिंदुस्तान की जंग ए आज़ादी ...
22/03/2025

आइए मिलते शहीद दिवस के अवसर पर #शौर्यभूमि #राजस्थान की राजधानी #जयपुर में ।
जहां रहेगी #हिंदुस्तान की जंग ए आज़ादी के शहीदों, लड़ाका योद्धाओं के शीर्षस्थ 40 से अधिक परिवारों की मौजूदगी....

#भगतसिंह #शहीद_मेला

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Aposite Police Thana Bewar, G. T Road Bewar
Mainpuri
205301

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