03/10/2025
🔷 अवतार सिंह 'पाश' और झूठा आरोप: हरिमंदिर साहिब सरोवर वाली भ्रांति का सच
🔹प्रस्तावना
पंजाबी क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह संधू 'पाश' पर यह गंभीर आरोप लगाया गया कि उन्होंने कथित रूप से कहा था कि हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) के सरोवर में धान उगाया जाना चाहिए। यह कथन अत्यधिक अपमानजनक और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला प्रतीत होता है। लेकिन जब उनके सम्पूर्ण लेखन, जीवनी और वैचारिक आलोचनाओं की गहराई से जाँच की गई तो स्पष्ट हुआ कि इस तरह का कोई कथन उनकी किसी भी कविता, लेख या वक्तव्य में मौजूद नहीं है। यह आरोप पूरी तरह निराधार, गढ़ा हुआ और राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित एक दुष्प्रचार है।
🔹झूठे आरोप की पृष्ठभूमि
पाश के जीवनकाल में पंजाब दो बड़े वैचारिक संघर्षों का केंद्र था।
▫️एक ओर नक्सलवादी आंदोलन था जिसके साथ पाश गहराई से जुड़े थे। यह आंदोलन वर्ग आधारित क्रांति और शोषण की समाप्ति चाहता था।
▫️दूसरी ओर ख़ालिस्तान आंदोलन था, जो पंजाब में एक अलग धार्मिक राज्य स्थापित करने की मांग कर रहा था।
पाश की विचारधारा इन दोनों से अलग खड़ी थी। वे साम्प्रदायिकता और धर्माधारित राजनीति के घोर विरोधी थे। उनके विचार वर्ग-संघर्ष, सामाजिक न्याय और समानता पर आधारित थे। स्वाभाविक है, इस परिस्थितिक संघर्ष में उनके विरोधियों ने उन्हें धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध खड़ा दिखाने के लिए मनगढ़ंत आरोप गढ़े।
🔹आरोप का असली उद्देश्य🔹
"सरोवर में खेती" का झूठा आरोप महज़ एक राजनीतिक हथियार था।
1. यह धार्मिक आस्था पर सीधा आघात करता है, ताकि आम सिख जनता पाश को दुश्मन मान ले।
2. इसका मकसद था कि किसान और श्रमिक वर्ग, जिनके लिए पाश लिखते थे, उनसे दूरी बना लें।
3. यह शिकायत अकादमिक न होकर प्रचार तंत्र का हिस्सा थी—एक ऐसा “प्रतीकात्मक हथियार” जो गुस्सा और दुख पैदा करने के लिए बहुत प्रभावी हो सकता है।
दूसरे शब्दों में, यह आरोप पाश की वैचारिक ताक़त को कम करने और उनकी छवि को धार्मिक विरोधी के रूप में प्रस्तुत करने की सोची-समझी साज़िश थी।
🔹पाश का वास्तविक दृष्टिकोण🔹
▫️पाश स्वयं एक जाट कृषक परिवार से थे। उनकी कविताओं में प्रकृति, खेत-खलिहान और मेहनतकश किसान की छवि बार-बार मिलती है।
▫️वे धार्मिक कट्टरवाद के विरोधी थे, लेकिन धर्म-संवेदनाओं का अपमान करने वाले व्यक्ति नहीं थे।
▫️उनकी पत्रिकाओं सिआड़ और रोहले बाँण में प्रकाशित लेखनों में उन्होंने खुलकर खालिस्तानी हिंसा का विरोध किया और सिख धर्म के मूल संदेश “समानता और करुणा” को उद्धृत करते हुए कट्टरपंथ का खंडन किया।
▫️उन्होंने प्रवास (अमेरिका) में रहते हुए भी “Anti-47 Front” और Anti-1947 जैसी पत्रिकाओं द्वारा धार्मिक आतंकवाद का विरोध जारी रखा।
इन तथ्यों से साफ है कि कोई भी गंभीर, शोधपरक पाठक पाश को धार्मिक अपमान का दोषी नहीं ठहरा सकता।
🔹कविता और मिथ्या व्याख्या🔹
पाश की कविताएँ अक्सर प्राकृतिक रूपकों से भरी होती थीं। जैसे प्रसिद्ध कविता “मैं घास हाँ” में उन्होंने घास को क्रांतिकारी चेतना और जीवन-शक्ति का प्रतीक बनाया।
लेकिन इसी तरह की कविताओं की प्रतीकात्मक भाषा को तोड़-मरोड़कर शत्रुओं ने उसे शाब्दिक (literal) अर्थों में घुमाने की कोशिश की।
▫️कविता का संदर्भ: जनता की जिजीविषा और राज्य-दमन के विरुद्ध संघर्ष।
▫️विरोधियों की व्याख्या: इसे धार्मिक स्थल पर “खेती” जैसा अपमानजनक रूपक गढ़कर पेश किया गया।
ये प्रचार-तकनीक की क्लासिक रणनीति थी—पहले कविता को संदर्भ से अलग करना, फिर प्रतीक को शाब्दिक रूप में पेश करना और अंततः उसे सबसे पवित्र स्थल (स्वर्ण मंदिर) से जोड़ देना ताकि जन-भावनाओं को भड़काया जा सके।
🔹निष्कर्ष🔹
अवतार सिंह 'पाश' पर लगाया गया यह आरोप न केवल तथ्यात्मक रूप से झूठा है बल्कि उनकी पूरी वैचारिक यात्रा और साहित्यिक दृष्टिकोण के विरुद्ध जाता है। यह एक गढ़ी हुई कहानी थी, जिसका असली मकसद उनके क्रांतिकारी स्वरूप को कलंकित करना था।
पाश की हत्या तो ख़ालिस्तानी आतंकवादियों ने 23 मार्च 1988 को कर दी, लेकिन उनकी कविताएँ आज भी पंजाब और भारत की जनता के संघर्षों में गूँजती हैं। झूठे प्रचार और राजनीतिक हत्याएँ भी उनकी कविताओं की असल ताक़त को दबा नहीं पाईं।
उनकी सबसे प्रसिद्ध पंक्ति यही कहती है कि
“सबसे खतरनाक चीज़ सपनों और उम्मीदों का मर जाना है।”🔻🔻🔻
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मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
गद्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना—बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना—बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में
सही होते हुए भी दब जाना—बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ना—बुरा तो है
मुट्ठियाँ भींचकर बस वक़्त निकाल लेना—बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर जाना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वह घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी निगाह में रुकी होती है
सबसे ख़तरनाक वह आँख होती है
जो सब कुछ देखती हुई भी जमी बर्फ़ होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मुहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीज़ों से उठती अंधेपन की भाप पर ढुलक जाती है
जो रोज़मर्रा के क्रम को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वह चाँद होता है
जो हर हत्याकांड के बाद
वीरान हुए आँगनों में चढ़ता है
पर आपकी आँखों को मिर्चों की तरह नहीं गड़ता है
सबसे ख़तरनाक वह गीत होता है
आपके कानों तक पहुँचने के लिए
जो मरसिये पढ़ता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
जो ग़ुंडे की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वह रात होती है
जो ज़िंदा रूह के आसमानों पर ढलती है
जिसमें सिर्फ़ उल्लू बोलते और हुआँ-हुआँ करते गीदड़
हमेशा के अँधेरे-बंद दरवाज़ों-चौगाठों पर चिपक जाते हैं
सबसे ख़तरनाक वह दिशा होती है
जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाए
और उसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्म के पूरब में चुभ जाए
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
गद्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती।
🔹लेखन : अवतार पाश🔸
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स्रोत :पुस्तक : लहू है कि तब भी गाता है (पृष्ठ 17) संपादक : चमनलाल, कात्यायनी रचनाकार : पाश प्रकाशन : परिकल्पना प्रकाशन संस्करण : 2004
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पाश आज भी इसी तरह जीवित हैं जनता के स्वप्नों और प्रतिरोधों में।
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