29/03/2025
राजस्थान की मांगणियार गायकी समृद्ध संस्कृति एवं ऐतिहासिक संगीत परंपरा के कारण संपूर्ण विश्व में अनूठी है। इसके सरंक्षण के लिए पूर्वजों द्वारा 'धम-परंपरा' को शुरू किया गया था। जैसलमेर में आज भी इस परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है। इसमें गांव की प्रमुख जातियों के लोग गांव के ग़रीब जरूरतमंद परिवारों को केवल सरंक्षण ही नहीं बल्कि उनके जन्म से लेकर शादी व मृत्यु तक वित्तीय संबल देते है। सदियों से चली आ रही यह परम्परा हम सबके लिए गौरव का विषय है।
साँकड़ा के बोनाडा में सिद्धहस्त मांगणियार लोक कलाकार जूठे ख़ान के निधन के पश्चात धम परंपरा का निर्वहन किया गया। उनकी स्मृति में श्रद्धांजलि सभा के साथ ही जैसलमेर-बाड़मेर-फलोदी के हजारों संगीतकार परिवार उपस्थित रहे। सबके लिए भोजन आदि की व्यवस्था कर ग्रामीणों ने रस्म अदा की।
लोक-कलाकार सदियों से संगीत की विरासत को सहेजकर इसे लोक में संचरित कर रहे हैं। हम सबका कर्तव्य बनता है कि उनका सम्मान करें, हौसला बढ़ाये एवं मुश्किल में साथ दें। साथ ही, बोनाड़ा ग्रामवासियों का भी हृदय से आभारी हूँ कि उन्होंने पूर्वजों की इस विरासत को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
हमारी संस्कृति में बहुत सारे रीति-रिवाज और परंपराएं ऐसी थी जिसका उद्देश्य निर्बल की सहायता और दुःख-दर्द में सहभागी बनना था। जिसमें जाति-धर्म का भेद नहीं था। कालांतर में कुछ परंपराएं रूढ़ियों में बदलने लगी। आज समय है रूढ़ियों को खत्म करते हुए परम्पराओं को पोषित करने और संरक्षण प्रदान करने की। जैसलमेर के कई गांवों में आज भी धम परंपरा का निर्वहन किया जाता है। यह परंपरा इसलिए भी अनोखी है क्योंकि यह मांगणियार और उसके जजमानों के पीढ़ियों से चले आ रहे रिश्तों की नींव पर टिकी है, जिसमें ना जातिय भेद है और ना कोई सामाजिक दबाव।