वीरवर झुझार सिंह जाट
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झुंझुनू जिले के संस्थापक वीरवर झुझार सिंह नेहरा जाट।
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Jhujhar Singh Statue, Milap Nagar, Jhunjhunu, Https://maps. App. Goo. Gl/HVuKHF4apqcgdozm 6
Jhunjhunun
333001
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रण-केसरी महाराजा जुझारसिंह जाट
राजस्थान में नेहरा जाटों का लगभग दो सौ वर्गमील भूमि पर किसी समय अधिकार रहा था। उनके नाम से झुंझनूं के निकट का पहाड़ आज भी नेहरा पहाड़ कहलाता है।
दूसरे पहाड़ का नाम मौड़ा (मौरा) है जो कि मौर्य (मोर जाटों ) लोगों के नाम पर प्रसिद्ध है। नेहरा लोगों में सरदार झूंझा अथवा जुझारसिंह बड़े प्रसिद्ध वीर हुए हैं।
उनके नाम से झूंझनूं जैसा प्रसिद्ध नगर विख्यात है। कुंवर पन्नेंसिंह ने ‘रण-केसरी सरदार जुझारसिंह’ नाम की पुस्तक लिखी थी। पन्द्रहवीं सदी में नेहरा लोगों का नरहड़ में राज्य था, वहां पर उनका एक दुर्ग भी था। उससे 16 मील पच्छिम मे नहरा पहाड़ के नीचे नाहरपुर में उनके दूसरे दल का राज्य था। सोलहवीं सदी के अन्तिम भाग और सत्रहवीं सदी के आरम्भ में नेहरा लोगों का मुसलमान शासकों से युद्ध हुआ। सरदार जुझारसिंह का जन्म 1721 विक्रम श्रावण महीने में हुआ था। उनके पिता नायब के यहां फौजदार के पद पर थे। युवा होने पर सरदार जुझार नवाब की सेना के जनरल हो गये।
उनके हृदय में एक बात थी और वह यह कि वे भारत में फिर से जाट-साम्राज्य स्थापित हुआ देखना चाहते थे। जाट-शाही की स्थापना के सन्दर्भ में पंजाब और ब्रज के जाट राजाओं व गोकुला के बलिदान की चर्चा उनके कानों तक पहुंच गई थी। वे चाहते थे कि मुस्लिम-शाही के विरुद्ध जाट लोग सम्मिलित बगावत कर दें। इन्हीं दिनों, उनकी एक राजपूत से भेंट हुई। वह किसी रिश्ते के सम्बन्ध से, नवाब के यहां आकर, मुलाजिम हुआ था। उसका नाम शार्दूलसिंह था। दोनों में सौदा हुआ। शार्दूल ने वचन दिया कि इधर से नवाबशाही के नष्ट करने पर तुम्हें (जुझारसिंह को) अपना सरदार मान लेंगे। अवसर आया और सरदार जुझार ने झुंझनूं और नरहड़ के नवाबों को परास्त कर दिया, उनके साथी भगा दिए। ‘रणकेसरी जुझारुसिंह’ नामक पुस्तक में लिखा है – जुझारुसिंह को दरबार करके सरदार बनाया गया। सरदारी का तिलक करने के बाद उसे एकान्त में अकेला पाकर राजपूतों ने उनके ऊपर हमला कर दिया और इस भांति उन्हें मार डाला। लिखा गया है कि सरदार जुझार के यह पूछने पर कि यह कैसी सरदारी दी जा रही है, जवाब मिला हम मूर्ख नहीं हैं, “तुम्हें जिन्दों का नहीं तो मरे हुए लोगों का सरदार बना रहे हैं। तुम्हें चाहिए था, सावधान रहते।” इस घृणित कृत्य का समाचार ज्यों ही नगर में फैला, हाहाकार मच गया, जाट सेनाएं बिगड़ खड़ी हुई। उनमें से कुछेक लोभी मनुष्यों को विपक्षियों ने अपने में मिला लिया। कहा जाता है उस समय एक चारण ने शार्दूलसिंह के पास जाकर कहा था – “सादे, लीन्हों झूंझणूं, लीनो अमर पटै। बेटे पोते पड़ौते पीढ़ी सात लटै।”