06/06/2026
नवाब फतेह खां का फतेहपुर बसाना
किसी नगर के बसने का मौलिक रूप वहां की संस्कृति, जीवन-चरित्र प्रकृति का इत्यादि वहां के समाज का आईना होता है। जिस नगर का जैसा समाज होगा, वैसा का राज होगा। समाज की इकाई का आधार जन है। किसी राज्य में जब कोई घटना घटित होती है, तो उसके पीछे कोई ना कोई कारण अवश्य होता है। जब टूटती है, तो वहाँ के आम आदमी के मानस को झकझोरती हैं, शासन पलटते हैं।
"घटनाओं के उल्लेख और सन्-संवत् देकर हम किसी राज्य की चिरस्मरणीय याद्दान्तों को उजागर करते हैं। उस राज्य की अच्छाइयों और जनता की भलाई के लिये उठाये गये कदमों पर और उनकी गौरवमयी अच्छाइयाँ परम्पराओं पर प्रकाश डालते हैं। अगर कोई लेखक किसी शासन काल की घटनाओं को वर्णित करते हुए जाति, धर्म या वंश को अपने साथ जोड़ते हुए उनकी बड़ाई करना व अन्य किसी शासन काल पर टीका करते हुए पटिया और मनपड़न्त प्रसंगों को उनके साथ जोड़ता है, तो इतिहास का स्वरूप बिगड़ता है। मगर अफसोस कि शेखावाटी क्षेत्र के कुछ लेखकों ने इन सभी बातों का बेधड़क इस्तेमाल किया।
फतेहपुर जैसे नगर को कायमखानी वीर फतेहखां ने बसाया तथा गंगानाथ साधु ने अपने रूप था युवा तप-तेज की प्रचंडता से फतेहपुर नगर की रक्षा की। इसलिए इस नगर संस्थापक नवाब फतेह खां की आत्मा स्वामी गंगादास महात्मा जैसी अलौकिक शक्तियों को समर्पित हो गई थी। फतेहखां फतेहपुर कायमखानी राज्य का संस्थापक ही था। मगर उसका बल शस्त्र के साथ-साथ शास्त्र भी था। वह अनि वंशीय चौहान मुस्लिम धर्म स्वीकारने के पश्चात् भी संस्कारों से सनातनी था। लोक देवता गोगाजी जो राजस्थान की जन-जातियों के प्राण हैं। इस कायमखानी वंश की साक्षी देते हैं। ददरेवा के मोटाराम चौहान कर्मसिंह से कायमखां तक और इन चौहान वंशीय कायमखानी बन्धुओं की हिन्दु-मुस्लिम संस्कृति-संगम की एक अनूठी मिसाल है। इन कायमखानी नवाबों ने अस्लिम धर्म स्वीकारने के पश्चात् भी अपने शासन काल के दौरान अधिकतर शादियों राजपूत जाति के अन्य शासक व जागीरदारों के यहाँ की। इनके शासन काल के अन्तिम समय तक यह सम्बन्ध होते रहे थे और अपनी राजपूत पत्नियों के लिए गढ़ में मन्दिर बनवाया उन्हें अपनी आस्था के अनुसार पूजा-अर्चना की पूरी लि शताब्दियों के बाद आज भी अन्य जाति और धर्म के लोगों को पहले जैसा सत्कार देते हैं। तथा आज भी वीर गोगाजी की तरह अपने देश पर होने वाले आक्रमण के समय अपनी जान की कुर्बानी देते हैं।
कायमखानी आज भी अपनी आन-बान पर कायम है। कायमखानी वंश फतेहपुर अपनी धार्मिक सहिष्णुता के आधार पर डटे रह कर ही लगभग 280 वर्ष तक निर्विरोध अपना शासन चलाते रहे। गढ़ की नींव के साथ-साथ मन्दिरों को भी नींव रखी तथा उन्हें भूमि दी. ताम्र पत्र देकर उन्हें अधिकार दिये।
फतेहपुर नगर बसाए जाने की चर्चा करते हुये इतिहासकारों, लेखकों ने अपनी राय अलग-अलग जाहिर की है। माधव वंश प्रकाश के लेखक ने इसे संवत् 1578 में बसाया जाना माना है। शार्दुलसिंह शेखावत के लेखक देवीसिंह वि. संवत् 1578 में इसका बसना मानते हैं, जो कायम रासा से ही मेल खाता है। पन्डित झाबरमल शर्मा ने सीकर के में फतेहपुर का बसता संवत् 1510 में माना है व कियातक कौम कायमखानी के फतेहपुर की बुनियाद चैत मुदी 5-1458 मंगलवार (अप्रेल 19-1401) में रखना माना है तथा किले की संगे बुनियाद संवत् 1462 (सन् 1405) में रखी गई, ऐसा जाता है। मारवाड़ के इतिहास में रेऊजी ने भी संवत् 1510 में फतेहपुर का बसना ता है।
मगर इन सभी संवत् और सन को देखने से ऐसा आभास होता है कि या तो कामम राम के दोहे को आधार मानकर उन्होंने उसे समझने की भूल की है या फिर देखा-देखी एक-दूसरे का अनुसरण करते हुए यह सब लिखा है। मगर यह सब सन्, संवत् निराधार ।। इन सभी लेखकों से हटकर कायमखानी वंश के इतिहास के लेखक डॉ. रतनलाल मिश्र यागियों के मन्दिर का हवाला देते हुए लिखा है कि इस मंदिर के शिलालेख ताकि मंदिर की नींव संवत् 1508 में रखी गई, जो एक निश्चित आधार है।
फतेहपुर परिचय के लेखक ने लिखा है कि संवत् 1508 में सेठ तुहिनमल जी ने फतेहपुर जैन मन्दिर कायम रासा के लेखक ने जो समय दिया है, निश्चित ही किले कि नींव रखने का है। मन्दिर का निर्माण किले की नींव रखने के समय लगभग 1 माह पूर्व का है। किसी स्थान पर स्थापना से पहले यह रिवाज भी था कि वह अपने इष्टदेव का स्थान पहले थरपें , ताकि सभी विपदाओं से बचा जा सके।
फतेहपुर नगर के बसाने का एक ठोस प्रमाण यह भी है कि फतेहखां के साथ हिसार से आने वाले बहुत में बनिया अन्य जाति के लोग थे जिनका वर्णन ऊपर किया जा है। जन्में भी महाजन फतेहपुर आकर बसे, जिनमें से एक नाम हरितवाल गौड़वाल का है जो नारनौल से आकर यहां बसा। (वि. संवत् 1503 )
इन सभी ठोस आधार से यह साबित होता है कि फतेहपुर नगर वि. स. 1503 (1446 ई.) में फतेह खां द्वारा बसाया गया क़िले की संगे बुनियाद वि. संवत् 1508 में लगाई गई थी और लगभग 2साल की अवधि में किला बनकर तैयार हो गया।
जहां फतेहपुर का किला बना हुआ हैवहां पहले पानी का तालाब वर्कशॉप इंसान थी जैसे मनोरम स्थान पर महात्मा गंगा नाथ जी अपना धुना लगाए हुए थे। स्थान स्थान इस स्थान के आसपास कोई बस्ती अवश्य रही होगी तभी गंगा नाथ जी का वहां रहना संभव था और फतेह खान के कारिंदे किले के नींव खुदवा रहे थे तो उन्होंने महात्मा गगनाथ जी से कहा कि आप अपना धुआं उठा लो यह किल्ले की सीध में आता है गंगा दास जी ने कहा कि किला बांका बनवा लो किला तो बांका ही अच्छा लगता है लेकिन वह नहीं माने और नाथ जी को धुना उठाने को कहा और नथ जी ने वहां से चादर में धुने के अंगारे भरे और उठकर चल दिए यह चमत्कारी दृश्य देखकर सभी चकित रह गए । और इसकी सूचना तुरंत रिनाव जाकर नवाब को दी और विवरण सुनाया । नवाब तुरंत घोड़ा लेकर आए और महात्मा के पीछे दौड़ते हुए उनके पास पहुंचे। गंगादास जी एक झाड़ी के पीछे धुना लगाए बैठे थे लेकिन वह नहीं मैने उसी स्थान पर आज महात्मा गंगानाथ जी का मंदिर बना हुआ हैं। जिसमे एक फारसी भाषा में शिलालेख लगा हुआ है और मंदिर निर्माण का समय वि. 1549 लिखा है ।
शिलालेख का मूल पाठ इस प्रकार है जो महबूब अली खां एलमान की पुस्तक "कायमखानियो का शोधपूर्ण इतिहास के पृष्ठ संख्या 65 के " में दिया गया है।
दरो मादेशाह मारन्दे मीदार दौलत खाँ
जनतखाँ अलवक्ष इमारते अंबरिख साख
फतेह खां बड़ा प्रतापी था। उन्होंने छह किलो की नीव एक ही दिन में लगवाई थी। रासा के मुताबिक पलू सेहवा भादरा भड़ांग बाइला और फतेहपुर: का निर्माण हुआ। सभी किले सीमांत भागों में बनवाए ताकि राज्य की सुरक्षा कायम रहे। डॉ रतनलाल मिश्र का मत है कि भाड़ंग और सेहवा दोनों पास पास है । यह डीडवाना तहसील का सेवा गांव है जो डीडवाना से 14 किमी है ।