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फुलहर स्थान का सबसे प्राचीन उल्लेख रामायण से जुड़ा माना जाता है।कथा के अनुसार, राजा जनक की पुत्री👉 सीता यहाँ एक फूलों के...
11/05/2026

फुलहर स्थान का सबसे प्राचीन उल्लेख रामायण से जुड़ा माना जाता है।
कथा के अनुसार, राजा जनक की पुत्री
👉 सीता यहाँ एक फूलों के बगीचे (फुलवारी) में पूजा के लिए फूल तोड़ने आती थीं
उसी समय राम अपने गुरु
👉 विश्वामित्र के साथ मिथिला आए थे
इसी फुलवारी में राम और सीता की पहली मुलाकात हुई
👉 यही घटना आगे चलकर सीता स्वयंवर और विवाह का कारण बनी
👉 इस कारण यह स्थान “फुलहर” (फूलों का स्थान) कहलाया
2. प्राचीन ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यह क्षेत्र प्राचीन मिथिला/विदेह राज्य का हिस्सा था
उस समय यहाँ उद्यान आश्रम और सरोवर बनाए जाते थे
फुलहर को एक राजकीय उद्यान के रूप में भी देखा जाता है
👉 हालांकि:
इस स्थल का सीधा लिखित पुरातात्त्विक रिकॉर्ड सीमित है
लेकिन स्थानीय परंपरा और भू-आकृति इसकी प्राचीनता को दर्शाती है
मध्यकालीन विकास
मध्यकाल में यहाँ छोटे-छोटे मंदिर और पूजा स्थल विकसित हुए
राम-सीता कथा के कारण यह क्षेत्र तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध हुआ
स्थानीय राजाओं और जमींदारों ने यहाँ:
मंदिर निर्माण
सरोवर (पोखर) की मरम्मत
धार्मिक आयोजन शुरू किए
आज फुलहर स्थान एक प्रमुख हिंदू तीर्थ स्थल है
यहाँ प्रमुख संरचनाएँ हैं:
राम-जानकी मंदिर
फुलहर पोखर (पवित्र सरोवर)
पूजा स्थल और मेला मैदान
प्रमुख मेले और आयोजन:
रामनवमी
विवाह पंचमी (राम-सीता विवाह उत्सव)
स्थानीय धार्मिक मेलों में हजारों श्रद्धालु आते हैं

08/05/2026
मान्यता है कि यह मंदिर बहुत प्राचीन (हजारों वर्ष पुराना) है“शिलानाथ” नाम का अर्थ:शिला = पत्थरनाथ = भगवान (शिव) 👉 यानी यह...
08/05/2026

मान्यता है कि यह मंदिर बहुत प्राचीन (हजारों वर्ष पुराना) है
“शिलानाथ” नाम का अर्थ:
शिला = पत्थर
नाथ = भगवान (शिव) 👉 यानी यहाँ भगवान शिव पत्थर (शिला) के रूप में स्वयंभू प्रकट हुए माने जाते हैं
स्थानीय परंपराओं के अनुसार:
यह शिवलिंग स्वयं प्रकट (Self-manifested) है
इसे किसी मनुष्य ने स्थापित नहीं किया
🕉️ पौराणिक मान्यताएँ
कहा जाता है कि यह स्थान त्रेता युग / रामायण काल से जुड़ा है
मिथिला क्षेत्र (राजा जनक की भूमि) होने के कारण:
भगवान राम और सीता के समय से इसका संबंध माना जाता है
कुछ कथाओं में यह भी कहा जाता है:
यहाँ ऋषि-मुनि तपस्या करते थे
कमला नदी के किनारे होने से यह क्षेत्र तपस्थली रहा है
🌊 कमला नदी से संबंध
मंदिर के पास बहने वाली कमला नदी को पवित्र माना जाता है
मान्यता:
पहले नदी सीधे मंदिर के पास बहती थी
भक्त स्नान करके शिव पूजा करते थे
👉 आज भी सावन और महाशिवरात्रि में नदी का धार्मिक महत्व बना हुआ है
🏛️ मध्यकालीन इतिहास
समय के साथ यह मंदिर कई बार प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़ आदि) से प्रभावित हुआ
स्थानीय राजाओं और भक्तों ने समय-समय पर इसका पुनर्निर्माण (renovation) कराया
🔱 धार्मिक महत्व
यह मंदिर मिथिला के प्रमुख शिव धामों में से एक है
विशेष अवसर:
महाशिवरात्रि
सावन महीना
इन समयों में हजारों श्रद्धालु जलाभिषेक करने आते हैं
👉 इसे “मनोकामना पूर्ण करने वाला मंदिर” भी माना

Jai maa Sarvswati 🙏
23/01/2026

Jai maa Sarvswati 🙏

आज दरभंगा की अंतिम महारानी, स्वर्गीय महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की पत्नी, काम सुंदरी जी का तीन बजे प्रातः स्वर्गवास हो ग...
12/01/2026

आज दरभंगा की अंतिम महारानी, स्वर्गीय महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की पत्नी, काम सुंदरी जी का तीन बजे प्रातः स्वर्गवास हो गया। एक युग का दुःखद अंत।
ॐ शांति






11/01/2026

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1857 की क्रांति : इस पासी ने घोड़े सहित अंग्रेज को बीच से आधा आधा काट डाला ।================================परिचय :     ...
09/01/2026

1857 की क्रांति : इस पासी ने घोड़े सहित अंग्रेज को बीच से आधा आधा काट डाला ।
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परिचय :
गोकरन पासी
राजा = राजा नरपति सिंह के अंगरक्षक
क्षेत्र = रोईया गढ़ी (भड़ायल- हरदोई )
सन् = 1857 ई की क्रांति

रोचक तथ्य = अपने 40 किलो के फरसे से अंग्रेज घुड़सवार को बीच से घोड़े सहित चीर डाला

इतिहास में अभी तक राणा प्रताप के लिए जाना जाता था कि अकबर के सेनापति को एक वार में बीच से चीर डाला था

दूसरा किस्सा अब महाबली गोकरन पासी का नाम जुड़ गया है जिसने अंग्रेज घुड़सवार को बीच से घोड़े सहित बीच से चीर डाला था इसकी पुष्टि एक ठाकुर लेखक धर्मेन्द्र सिंह सोमवंशी की पुस्तक "हरदोई का स्वतंत्रा संग्राम और सेनानी " से होती है

महाबली गोकरन पासी का 40 सेर का फरसा धारी थे

राजा नरपति सिंह रैकवार हरदोई जिले में बिलग्राम से दस मील दूर सदामऊ ( रोइया ग्राम ) स्थित है । जहां के नरपति सिंह सत्तावनी क्रान्ति में अमर हो गए । राजा नरपति सिंह स्वयं वीर और वीरों के प्रशंसक एवं पोषक थे । उनकी सेना में वही भरती हो सकता था जो सेर भर या इससे अधिक भोजन सामग्री को पचा ले ।

महाबली गोकरन पासी

गोकरन पासी बेहद लंबा और बदन का गठीला बलिष्ठ नौजवान था वह लाठी भाजने में निपुण और बेहतर धनुषधारी था उसकी हिम्मत और दिलेरी पूरा गांव जानता है खेतों में ढीठ बैलो को काबू करना, बिगड़ैल बैलों के के गर्दनों में सरावन लगाना उसके दाएं हाथ का काम था , इलाके में गोकरन नाम गूंजता 6 फिट 4 इंच से ज्यादा लंबा था ( क्यूंकि कहते है पहले घर के दरवाजे घर के लंबे सदस्य के बराबर नाप से बनाया जाता था ऊपरी सज्जे से एक- दो अंगुल छोड़कर ,दरवाजे कि नाप 7 फिट के करीब थी ) वो क्योंकि इलाके में कोई उसके जैसा लंबा नहीं था जितना उसका शरीर मानो उतना ही भोजन करता, कुश्ती लड़ना, पहलवानी करता,

( तभी तो 40 सेर का फरसा लेकर चलता था )

अभी वह जवानी में ही था इलाके में राजा की सेना भरती में डुग्गी बजी जो राजा की सेना में भर्ती होना चाहता है वह स्वेच्छा से भर्ती हो सकता है उसे ऐलान करने वाले ने एक शर्त भी बताई भर्ती केवल वहीं हो सकता है जो सेर भर से ज्यादा आटा फांक लें ।

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