13/10/2026
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📗✨ मीरा कथा – भाग 220 ✨📗
📗✨ दोहा ✨📗
तेरे बिन सूना हृदय, सूनी मेरी साँस।
भीड़ खड़ी संसार की, तू ही मन के पास॥
📗✨ दोहे का अर्थ ✨📗
संसार में कितने ही लोग हमारे आसपास हों, फिर भी मन को सच्चा सहारा उसी प्रिय से मिलता है, जिससे आत्मा का गहरा संबंध हो। मीरा के लिए वह सहारा उनके गिरधर थे। उनका नाम उन्हें शक्ति देता था, लेकिन उनके प्रत्यक्ष दर्शन की अभिलाषा हर दिन उनके हृदय में नई होकर जाग उठती थी।
📗✨ कथा प्रसंग ✨📗
उस दिन मंदिर में भजन समाप्त होने के बाद मीरा देर तक ठाकुरजी के सामने बैठी रहीं। यात्रियों की आवाजाही थम गई थी। वृद्ध पुजारी ने दीपक में घी डाला और धीरे से मंदिर का बाहरी द्वार बंद करने लगा।
“बेटी, अब रात बहुत हो गई है। तुम भी कुछ विश्राम कर लो।”
मीरा ने ठाकुरजी की ओर देखते हुए कहा, “बाबा, विश्राम तो कर लूँगी, लेकिन इस मन को कैसे समझाऊँ? जब आँखें बंद करती हूँ, तब भी श्याम दिखाई देते हैं। जब आँखें खोलती हूँ, तब भी उन्हीं को खोजती हूँ। यह कैसी प्यास है, जो स्मरण से और बढ़ जाती है?”
वृद्ध पुजारी ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसने केवल उनके पास एक दीपक रख दिया और बाहर चला गया।
मीरा ने दीपक की लौ को देखा। उन्हें लगा, जैसे वह लौ भी किसी अदृश्य प्रिय की प्रतीक्षा में स्थिर खड़ी हो।
उन्होंने धीरे से वीणा उठाई और गाने लगीं—
“मेरे श्याम, आज मन बहुत थक गया है। सबको तुम्हारी कथा सुनाती हूँ, सबको तुम्हारे प्रेम का भरोसा देती हूँ, लेकिन जब रात अकेली होती है, तब तुम्हारी याद मेरे भीतर ऐसी उतरती है कि अपने ही आँसू सँभालना कठिन हो जाता है।”
उनकी आवाज़ धीरे-धीरे मौन में विलीन हो गई।
रात के अंतिम पहर मीरा की आँख लग गई। स्वप्न में उन्होंने देखा कि यमुना का तट चाँदनी से नहाया हुआ है। जल पर छोटी-छोटी लहरें उठ रही हैं। दूर कदंब के वृक्ष के नीचे एक साँवला युवक बाँसुरी बजा रहा है।
मीरा का हृदय धड़क उठा।
“श्याम!”
वे दौड़कर उसकी ओर बढ़ीं। उनके चरण यमुना की रेत पर पड़ रहे थे, पर जितना वे आगे बढ़तीं, वह आकृति उतनी ही दूर होती जाती।
मीरा ने व्याकुल होकर पुकारा, “प्रभु, ठहर जाइए! मैं कितने समय से आपको खोज रही हूँ। आज तो मुझे अपने चरणों तक पहुँचने दीजिए।”
बाँसुरी का स्वर कुछ क्षणों के लिए थमा। उस साँवली आकृति ने जैसे पीछे मुड़कर देखा। मीरा की आँखों में आनंद के आँसू भर आए। वे अपने हाथ फैलाकर आगे बढ़ीं।
लेकिन उसी क्षण यमुना की लहरें तेज हो गईं। चाँदनी धुँधली पड़ने लगी और वह आकृति प्रकाश में विलीन हो गई।
“श्याम! मुझे छोड़कर मत जाइए!”
मीरा की पुकार से उनकी नींद खुल गई।
मंदिर में दीपक जल रहा था। बाहर पक्षियों की पहली आवाज़ सुनाई देने लगी थी। मीरा ने अपने गालों पर बहते आँसू पोंछे, लेकिन उनका हृदय अब भी स्वप्न के विरह में डूबा हुआ था।
उन्होंने ठाकुरजी की मूर्ति के सामने हाथ जोड़ दिए।
“यह कैसी दया है, मेरे गिरधर? स्वप्न में भी तुम्हें पाने के लिए दौड़ती हूँ और जागने पर तुम्हारी याद के सिवा कुछ नहीं मिलता। यदि यह तुम्हारी लीला है, तो मुझे इतनी शक्ति देना कि मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में टूटूँ नहीं।”
सुबह होते ही मीरा ने वृंदावन की ओर अपनी यात्रा आरंभ की। वृद्ध पुजारी ने उनके लिए थोड़ा भोजन बाँध दिया और चरणों में प्रणाम किया।
“बेटी, तुम्हारे आने से मुझे समझ आया कि प्रतीक्षा करते हुए भी मनुष्य दूसरों के लिए जी सकता है। अब जब कोई मेरे द्वार पर आएगा, मैं उसे केवल भोजन नहीं दूँगा, उसकी बात भी सुनूँगा।”
मीरा ने प्रसन्न होकर कहा, “बाबा, किसी की बात धैर्य से सुन लेना भी बहुत बड़ी सेवा है। कभी-कभी मनुष्य को रोटी से पहले यह विश्वास चाहिए कि संसार में कोई ऐसा है, जो उसके दुःख को सुनने के लिए तैयार है।”
पुजारी ने उन्हें आशीर्वाद दिया।
मीरा आगे बढ़ीं। कुछ दूर चलने पर उन्हें पगडंडी के किनारे एक युवती बैठी दिखाई दी। उसके हाथ में विवाह के लाल वस्त्रों का छोटा-सा टुकड़ा था। वह उसे बार-बार अपने आँचल से पोंछती और फिर सीने से लगा लेती।
मीरा उसके पास जाकर बैठ गईं।
“बहन, तुम्हारी आँखें बहुत रोई हुई लगती हैं। क्या तुम किसी कठिनाई में हो?”
युवती ने पहले कुछ नहीं कहा। फिर धीरे-धीरे अपना दुःख बताने लगी।
“मेरा विवाह होने वाला था। जिस युवक से मेरा विवाह तय हुआ था, वह अचानक बीमारी में चल बसा। घर के लोग कहते हैं कि अब मुझे सब भूलकर आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन मैं कैसे भूल जाऊँ? मैंने उसके साथ जीवन के कितने सपने देखे थे।”
उसकी आवाज़ टूट गई।
“मुझे लगता है कि मेरे जीवन के सारे रंग उसी के साथ चले गए। अब यह लाल वस्त्र भी मुझे दुःख देता है। इसे फेंक दूँ तो लगता है, जैसे उसकी स्मृति मिटा दूँगी; सँभालकर रखूँ तो हर बार हृदय टूट जाता है।”
मीरा ने उस वस्त्र के टुकड़े को देखा। उसमें किसी के अधूरे सपनों की पीड़ा छिपी थी।
उन्होंने युवती से कहा, “बहन, तुम्हारे दुःख को कोई एक वाक्य मिटा नहीं सकता। जिसे मन ने अपने भविष्य का हिस्सा मान लिया हो, उसके चले जाने से केवल एक व्यक्ति नहीं जाता—उसके साथ अनेक कल्पनाएँ भी टूट जाती हैं।”
युवती ने आश्चर्य से मीरा की ओर देखा। पहली बार किसी ने उसे यह नहीं कहा था कि वह तुरंत सब भूल जाए।
मीरा ने उसका हाथ थाम लिया।
“तुम्हें अपनी स्मृतियों को मिटाने की आवश्यकता नहीं। उन्हें सँभालने का ढंग धीरे-धीरे बदल सकता है। आज यह वस्त्र तुम्हें रुलाता है, तो इसे थोड़ी देर के लिए रख दो। जब मन तैयार हो, तब इसे फिर देख लेना। अपने दुःख के बीच भोजन करना, विश्राम करना और अपने प्रिय लोगों से बात करना मत छोड़ना। तुम्हारा जीवन भी मूल्यवान है।”
युवती की आँखों से आँसू बहने लगे।
“क्या प्रेम करने के बाद फिर कभी हँसा जा सकता है?”
मीरा का हृदय काँप उठा। उन्होंने आकाश की ओर देखा और कुछ क्षण मौन रहीं।
“हाँ, बहन,” उन्होंने कहा, “हँसना तुम्हारे प्रेम को छोटा नहीं करेगा। तुम्हारे प्रिय की स्मृति तुम्हारे हृदय में रह सकती है और तुम्हारे जीवन में फिर से उजाला भी आ सकता है। दुःख और आशा एक ही हृदय में साथ रह सकते हैं।”
युवती ने पहली बार अपने आँचल से आँसू पोंछे।
मीरा ने अपनी वीणा उठाई और उसके लिए एक कोमल पद गाया। उसमें बिछोह की वेदना थी, लेकिन साथ ही यह विश्वास भी था कि टूटे हुए मन को समय, स्नेह और प्रार्थना के सहारे फिर से जीना सिखाया जा सकता है।
युवती सुनती रही। गीत समाप्त हुआ तो उसने वस्त्र के उस टुकड़े को सावधानी से मोड़ा और अपनी पोटली में रख लिया।
“मैं इसे अभी नहीं फेंकूँगी,” उसने कहा, “लेकिन अब इसे देखकर स्वयं को दोष भी नहीं दूँगी कि मैं रोती क्यों हूँ।”
मीरा ने उसे स्नेह से देखा।
“अपने मन के प्रति इतनी कठोर मत बनना। आँसू आना कमजोरी नहीं है। और जब तुम्हें सहारे की आवश्यकता हो, तो अपने घर के उन लोगों के पास जाना जो तुम्हारी बात प्रेम से सुनते हैं।”
युवती ने मीरा के चरणों में प्रणाम किया और अपने घर की ओर चल पड़ी।
मीरा उसे जाते हुए देखती रहीं। उनके भीतर अपनी पीड़ा फिर जाग उठी। उन्होंने दूसरों को समझाया था कि स्मृतियों के साथ जीना संभव है, लेकिन अपने गिरधर की याद आते ही उनके हृदय में वही पुरानी तड़प भर गई।
वे पगडंडी के किनारे खड़ी होकर बोलीं—
“मेरे श्याम, मैं संसार को समझाती हूँ कि बिछोह के बाद भी जीवन चलता है। पर तुमसे बिछुड़कर मेरा मन हर दिन तुम्हारे दर्शन की याचना करता है। मैं तुम्हारे नाम से शक्ति पाती हूँ, फिर भी तुम्हें सामने देखने की अभिलाषा कम नहीं होती। क्या यही मेरा प्रेम है, या मेरी आत्मा तुम्हारे बिना अपने घर को खोज रही है?”
हवा चली। वृक्षों की पत्तियाँ हिलीं और कहीं दूर से बाँसुरी जैसा एक मधुर स्वर सुनाई दिया।
मीरा ने तुरंत सिर उठाया।
उनकी आँखों में आशा चमक उठी। वे उस दिशा में देखने लगीं, जहाँ से स्वर आया था।
लेकिन वहाँ केवल वन-पथ था।
उन्होंने आँखें बंद कर लीं। इस बार वे रोईं अवश्य, पर उनके अधरों पर एक शांत मुस्कान भी थी।
“ठीक है, श्याम,” उन्होंने कहा, “आज भी यदि तुम्हें सामने नहीं देख पाई, तो तुम्हारे नाम को अपने हृदय में लेकर आगे बढ़ूँगी। मेरी राह लंबी हो सकती है, लेकिन तुम्हारी स्मृति मेरा साथ नहीं छोड़ेगी।”
और मीरा फिर चल पड़ीं—अपने गिरधर की खोज में, अपने विरह को गीत बनाकर, और राह में मिलने वाले हर टूटे हृदय के लिए थोड़ी-सी करुणा सँजोकर।
📗✨ मीरा का पद ✨📗
स्वप्न में देखा साँवरा, जागी तो अँधियार,
हाथ बढ़ाया श्याम को, रह गई पुकार।
आँखों में तेरी छवि बसी, अधरों पर तेरा नाम,
फिर भी मन की प्यास कहे, आ जाओ घनश्याम॥
जिसका अपना छूट गया, उसको धीर बँधाऊँ,
अपने विरह की आग में, उसका दीप जलाऊँ।
सबको राह दिखाती फिरूँ, खुद राह निहारूँ,
मेरे गिरधर, तेरे बिना किसको अपना मानूँ॥
📗✨ भजन ✨📗
श्याम, स्वप्न में आकर फिर क्यों दूर चले जाते हो,
मेरे रोते हुए मन को और अधिक तड़पाते हो।
रात की नीरव छाया में, तेरा रूप निहारा,
यमुना तट पर लगा मुझे, मिल जाएगा सहारा।
बाँहें फैलाकर दौड़ी मैं, टूट गया सपना सारा,
श्याम, स्वप्न में आकर फिर क्यों दूर चले जाते हो?
श्याम, स्वप्न में आकर फिर क्यों दूर चले जाते हो,
मेरे रोते हुए मन को और अधिक तड़पाते हो।
तेरे नाम से जीती हूँ मैं, तेरे नाम से रोती,
तेरी याद की चादर ओढ़े, रातें सारी खोती।
भीतर तेरी छवि बसती है, आँखें दर्शन को रोतीं,
मेरे मन की प्यास को मोहन, कब आकर समझाते हो?
श्याम, स्वप्न में आकर फिर क्यों दूर चले जाते हो,
मेरे रोते हुए मन को और अधिक तड़पाते हो।
किसी बिछुड़े को समझाया, आँसू पोंछे उसके,
किसी अकेले मन को थामा, दर्द सुने थे उसके।
लेकिन जब तेरी याद जगी, नैन बरसते मेरे,
अपने ही इस टूटे मन को कैसे धीर बँधाते हो?
श्याम, स्वप्न में आकर फिर क्यों दूर चले जाते हो,
मेरे रोते हुए मन को और अधिक तड़पाते हो।
मैं न माँगूँ जग का वैभव, न चाहूँ सम्मान,
तेरे चरणों में मिल जाए, बस इतना वरदान।
दर्शन चाहे देर से देना, देना प्रेम महान,
मेरे अंतिम क्षण में मोहन, लेना मेरा नाम।
श्याम, स्वप्न में आकर फिर क्यों दूर चले जाते हो,
मेरे रोते हुए मन को और अधिक तड़पाते हो।
क्रमश:……
🩷💚❤️🤎🩵💗💜💙💛🧡💖