21/06/2026
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🎻👩🦰 मीरा और सखी वृन्दावल्लरी का संवाद — भाग 360✨📙
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कुटिया के भीतर दीपक की लौ काँप रही थी।
पर उससे कहीं अधिक वृन्दावल्लरी का हृदय काँप रहा था।
उनके कानों में केवल एक ही वाक्य गूँज रहा था—
“तेरा एक जुड़वाँ भाई भी था…”
उनकी आँखें विस्मय से फैली हुई थीं।
होंठ काँप रहे थे।
वे वृद्धा का हाथ पकड़कर बोलीं—
“माता…”
“यह… यह आप क्या कह रही हैं…?”
वृद्धा की आँखों से आँसू बहने लगे।
उन्होंने काँपते स्वर में कहा—
“हाँ बेटी…”
“तुम दोनों जुड़वाँ थे।”
“तू जन्म से कुछ ही क्षण बड़ी थी।”
“और तेरा भाई…”
“वह तेरे बिना एक पल भी नहीं रहता था।”
वृद्धा की आँखें कहीं दूर अतीत में खो गईं।
“जब तुम दोनों छोटे थे…”
“तो एक-दूसरे का हाथ पकड़कर सोते थे।”
“यदि एक रोता…”
“तो दूसरा भी रोने लगता।”
“यदि एक हँसता…”
“तो दूसरा भी खिलखिला उठता।”
यह कहते-कहते वृद्धा मुस्कुरा दीं।
पर अगले ही क्षण उनकी मुस्कान आँसुओं में बदल गई।
“और फिर वह दिन आया…”
“जब यमुना में भयंकर बाढ़ आई।”
“चारों ओर चीख-पुकार मच गई।”
“लोग अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे।”
“और उसी अफरा-तफरी में…”
“तुम दोनों हमसे बिछड़ गए।”
वृन्दावल्लरी की आँखों से आँसू बह निकले।
वे धीरे से बोलीं—
“फिर…?”
वृद्धा का कंठ भर आया।
“फिर हमें केवल तेरी एक पायल मिली…”
“और लगा कि शायद तू कहीं बह गई।”
“पर तेरे भाई का कोई पता नहीं चला।”
“न उसका वस्त्र…”
“न कोई निशानी…”
“कुछ भी नहीं…”
कुटिया में मौन छा गया।
वृन्दावल्लरी के भीतर अजीब वेदना उठ रही थी।
जिस भाई के बारे में उन्हें आज तक पता भी नहीं था…
उसके लिए उनका हृदय रोने लगा।
उन्होंने आँसू पोंछते हुए पूछा—
“माता…”
“क्या वह जीवित हो सकता है…?”
वृद्धा ने काँपते हुए कहा—
“मैं नहीं जानती बेटी…”
“पर एक बात आज तक मेरे मन में जीवित है।”
“उस दिन…”
“जब तुम दोनों बिछड़े…”
“मैंने देखा था कि एक साधु तुम्हारे भाई को अपनी बाँहों में उठाकर कहीं ले जा रहा था।”
वृन्दावल्लरी की साँस रुक गई।
“एक साधु…?”
“हाँ।”
“मैं दूर थी…”
“मैं उसे रोक नहीं पाई…”
“फिर वह भीड़ में कहीं खो गया।”
मीरा अब तक शांत बैठी थीं।
उन्होंने धीरे से कहा—
“सखी…”
“यदि श्याम ने तुझे तेरी माता से मिलाया है…”
“तो यह कथा यहीं समाप्त नहीं होगी।”
“प्रेम की डोर जहाँ टूटती दिखाई देती है…”
“वहाँ भी वह अदृश्य रूप से बँधी रहती है।”
वृन्दावल्लरी ने आँसू भरी आँखों से उनकी ओर देखा।
उनके भीतर आशा और भय दोनों थे।
उसी समय वृद्धा ने अपने पास रखा एक पुराना लकड़ी का संदूक खोला।
उसमें वर्षों पुरानी कुछ वस्तुएँ रखी थीं।
उन्होंने उनमें से एक छोटी-सी नीली डोरी निकाली।
डोरी में आधा टूटा हुआ चाँदी का लटकन बँधा था।
वृद्धा बोलीं—
“यह तेरे भाई के गले में था।”
“लटकन का आधा भाग उसके पास था…”
“और आधा तेरे पास।”
यह सुनकर वृन्दावल्लरी चौंक उठीं।
उन्होंने तुरंत अपना पुराना ताबीज़ निकाला।
जो बचपन से उनके पास था।
जब दोनों टुकड़े पास लाए गए…
तो वे एक-दूसरे में पूरी तरह जुड़ गए।
कुटिया में उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए।
वृद्धा फूटकर रो पड़ी।
“हे राधारानी…”
“आज इतने वर्षों बाद यह निशानी फिर पूरी हो गई…”
वृन्दावल्लरी उस लटकन को अपने हृदय से लगाकर रोने लगीं।
उन्हें लग रहा था…
मानो उनका कोई बिछड़ा हुआ अंश उन्हें पुकार रहा हो।
तभी…
संदूक के कोने से एक और वस्तु नीचे गिर पड़ी।
वह एक बहुत पुराना कागज़ था।
पीला पड़ चुका।
किनारे टूट चुके थे।
वृद्धा ने आश्चर्य से उसे उठाया।
“यह तो…”
“मैंने वर्षों से इसे नहीं देखा…”
उन्होंने काँपते हाथों से उसे खोला।
उस पर कुछ शब्द लिखे थे—
“यदि यह पत्र कभी वृन्दा तक पहुँचे…”
“तो उसे बता देना…”
“उसका भाई जीवित है…”
यह पढ़ते ही सबके शरीर में सिहरन दौड़ गई।
वृन्दावल्लरी की आँखें फैल गईं।
पत्र आगे था—
“मैं उसे अपने साथ लेकर नन्दग्राम की ओर जा रहा हूँ…”
“उसका नाम मैंने माधव रखा है…”
“यदि भाग्य ने चाहा…”
“तो एक दिन भाई-बहन अवश्य मिलेंगे…”
पत्र के नीचे किसी साधु का नाम लिखा था…
और तिथि भी…
जो लगभग पच्चीस वर्ष पुरानी थी।
वृन्दावल्लरी की आँखों से आँसू झरने लगे।
उन्होंने काँपते स्वर में कहा—
“तो वह जीवित था…”
“वह सचमुच जीवित था…”
मीरा ने आकाश की ओर देखा।
और धीरे से मुस्कुराईं।
“सखी…”
“श्याम की लीला देखो।”
“पहले माता मिली…”
“अब भाई का संकेत मिला है।”
“पर मुझे लगता है…”
“यह कथा अभी और भी गहरी होने वाली है।”
तभी कुटिया के बाहर किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।
एक यात्री तेजी से दौड़ता हुआ आया।
उसके हाथ में एक माला थी।
और वह हाँफते हुए बोला—
“क्या यहाँ वृन्दावल्लरी हैं…?”
“मैं नन्दग्राम से आया हूँ…”
“और मेरे पास माधव का संदेश है…”
यह सुनते ही वृन्दावल्लरी का हृदय जैसे थम गया…
क्या इतने वर्षों बाद उनके भाई का समाचार स्वयं उनके द्वार तक आ पहुँचा था…?
🌸🌸🌸 क्रमशः…………… 🌸🌸🌸
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💖 अगले भाग 361 में — नन्दग्राम से आए संदेशवाहक के मुख से माधव का समाचार सुनकर वृन्दावल्लरी का हृदय प्रेम, आशा और विरह से भर उठेगा। 💖
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