02/06/2026
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🎻👩🦰 मीरा और सखी वृन्दावल्लरी का संवाद — भाग 306✨📙
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वृद्ध संत के शब्दों ने उस रात वृन्दावल्लरी के हृदय में गहरी छाप छोड़ दी थी। वे देर तक सोचती रहीं कि वास्तव में प्रभु का प्रेम कभी नष्ट नहीं होता। वह कभी माँ की लोरी बनकर हृदय में बसता है, कभी किसी संत की वाणी बनकर जाग उठता है और कभी किसी आँसू की बूँद बनकर आँखों से बह निकलता है।
अगले दिन प्रातःकाल वृन्दावन में हल्का कोहरा छाया हुआ था। यमुना के ऊपर धुंध की एक पतली चादर फैली हुई थी। मंदिर के घंटे की मधुर ध्वनि दूर-दूर तक सुनाई दे रही थी। वृन्दावल्लरी फूलों की टोकरी लेकर मंदिर की ओर जा रही थीं।
रास्ते में उन्होंने देखा कि मंदिर की सीढ़ियों पर एक छोटा बालक बैठा हुआ है। उसकी आयु आठ-नौ वर्ष से अधिक नहीं थी। उसके हाथ में एक मिट्टी की बांसुरी थी। वह उसे बजाने का प्रयास कर रहा था, पर कोई मधुर स्वर नहीं निकल रहा था।
फिर भी वह बार-बार प्रयास कर रहा था।
वृन्दावल्लरी उसके पास जाकर बैठ गईं।
उन्होंने मुस्कुराकर पूछा—
“बेटा, क्या कर रहे हो?”
बालक ने चमकती आँखों से उत्तर दिया—
“मैं श्याम जैसी बांसुरी बजाना सीख रहा हूँ।”
वृन्दावल्लरी मुस्कुरा उठीं।
उन्होंने पूछा—
“और क्यों सीखना चाहते हो?”
बालक ने बड़ी सरलता से कहा—
“क्योंकि अगर मैं अच्छी बांसुरी बजाने लगूँ, तो शायद श्याम मुझे अपना मित्र बना लें।”
उसकी बात सुनकर वृन्दावल्लरी का हृदय प्रेम से भर गया।
उन्होंने पूछा—
“अगर श्याम तुम्हारे मित्र बन जाएँ, तो उनसे क्या माँगोगे?”
बालक कुछ क्षण सोचता रहा।
फिर बोला—
“कुछ भी नहीं।”
“मैं बस उनके साथ यमुना किनारे बैठूँगा।”
“वे बांसुरी बजाएँगे और मैं सुनूँगा।”
“जब वे थक जाएँगे, तब मैं उनके लिए फूल चुनकर लाऊँगा।”
इतना कहते-कहते उसकी आँखों में ऐसी निष्कपट चमक आ गई कि वृन्दावल्लरी की पलकों पर आँसू आ गए।
उन्होंने सोचा—
कितना सरल होता है बाल-हृदय।
न उसे वैभव चाहिए, न सिद्धि, न सम्मान।
उसे तो केवल प्रभु का साथ चाहिए।
वृन्दावल्लरी बालक को लेकर मंदिर के भीतर आईं।
गिरधर के सामने पहुँचते ही बालक ने अपनी छोटी मिट्टी की बांसुरी चरणों में रख दी।
फिर हाथ जोड़कर बोला—
“श्याम, मैं अभी अच्छा नहीं बजा पाता।”
“पर एक दिन सीख जाऊँगा।”
“तब आपको सुनाऊँगा।”
उसकी प्रार्थना सुनकर अनेक भक्तों की आँखें भर आईं।
वृन्दावल्लरी ने उसी भाव में वीणा उठा ली।
उनके हृदय में आज वात्सल्य और प्रेम का सागर उमड़ रहा था।
वे गाने लगीं—
“बाल हृदय की छोटी इच्छा,
श्याम तुम्हें प्रिय लगती है…”
“निर्मल मन की कोमल भाषा,
सीधे तुम तक जाती है…”
“जिसको केवल तुम ही चाहो,
वह धन्य जगत में होता है…”
“प्रेम भरा जो बालक बन जाए,
वह जल्दी तुमको पाता है…”
भजन सुनते ही मंदिर का वातावरण बदल गया।
कुछ वृद्ध भक्त अपने बचपन को याद करके रोने लगे।
कुछ संत मुस्कुरा रहे थे।
और वह छोटा बालक आँखें बंद किए बैठा था, जैसे सचमुच कहीं दूर से वंशी की धुन सुन रहा हो।
उसी समय मंदिर के द्वार से एक शीतल हवा का झोंका भीतर आया।
गिरधर के मुकुट में लगा एक छोटा कदम्ब पुष्प टूटकर धीरे से उस बालक के सामने आ गिरा।
बालक ने आश्चर्य से उसे उठाया।
फिर मुस्कुराकर बोला—
“माता, देखो!”
“श्याम ने मेरी बांसुरी स्वीकार कर ली!”
उसकी बात सुनकर पूरा मंदिर प्रेम से भर उठा।
वृन्दावल्लरी की आँखों से अश्रुधारा बहने लगी।
उन्हें लगा—
प्रभु को सबसे अधिक प्रिय वही हृदय है जिसमें बालक जैसी सरलता हो।
जहाँ छल न हो…
जहाँ अपेक्षा न हो…
जहाँ केवल प्रेम हो…
और उसी निष्कपट प्रेम, उसी बाल-सुलभ भक्ति, उसी मधुर विश्वास और उसी श्याममय आनंद के बीच—
कथा में मीरा से वृन्दावल्लरी का संवाद ही चलता रहा…
क्रमशः …………
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