Devatma Science Museum

Devatma Science Museum Devatma Devatma Science Museum Represents the philosophy of Devatma-ONTOLOGY, EPISTEMOLOGY, ETHICS & RELIGION which motivates the Altruistic conduct, pathways of altruistic conduct and scientic philosophy on life after death.

First time in the History, Devatma Science Museum explains how to be good in relation to self, society and world in the light of science.

Operating as usual

07/02/2021

“क्या तुम्हें अपने जन्मदाता, रक्षाकर्ता, पालनकर्ता तथा शिक्षादाता सम्बन्धी याद आते हैं ? क्या वह तुम्हें अपने सम्बन्धी बोध होते हैं ? क्या उनके लिए तुम्हारे हृदय में किसी प्रकार का अनुराग या प्रेम या सच्ची श्रद्धा या कृतज्ञता आदि का कोई शुभ भाव जाग्रत हुआ अनुभव होता है ?”

https://youtu.be/oFtyCFDxG9I“मेरी प्यारी बेटी,रात का समय है। क्रिसमस की रात। मेरे इस छोटे से घर की सभी निहत्थी सेना सो च...
05/02/2021

https://youtu.be/oFtyCFDxG9I

“मेरी प्यारी बेटी,
रात का समय है। क्रिसमस की रात। मेरे इस छोटे से घर की सभी निहत्थी सेना सो चुकी हैं। तुम्हारे भाई-बहन भी नीद की गोद में हैं। तुम्हारी मां भी सो चुकी है। मैं अधजगा हूं, कमरे में धीमी सी रौशनी है। तुम मुझसे कितनी दूर हो पर यकीन मानो तुम्हारा चेहरा यदि किसी दिन मेरी आंखों के सामने न रहे, उस दिन मैं चाहूंगा कि मैं अंधा हो जाऊं। तुम्हारी फोटो वहां उस मेज पर है और यहां मेरे दिल में भी, पर तुम कहां हो? वहां सपने जैसे भव्य शहर पेरिस में! चैम्प्स एलिसस के शानदार मंच पर नृत्य कर रही हो। इस रात के सन्नाटे में मैं तुम्हारे कदमों की आहट सुन सकता हूं। शरद ऋतु के आकाश में टिमटिमाते तारों की चमक मैं तुम्हारी आंखों में देख सकता हूं। ऐसा मनोहर और इतना सुन्दर नृत्य। सितारा बनो और चमकती रहो। परन्तु यदि दर्शकों का उत्साह और उनकी प्रशंसा तुम्हें मदहोश करती है या उनसे उपहार में मिले फूलों की सुगंध तुम्हारे सिर चढ़ती है तो चुपके से एक कोने में बैठकर मेरा खत पढ़ते हुए अपने दिल की आवाज सुनना।
मैं तुम्हारा पिता, प्यारी बेटी जेरल्डिन!
मैं चार्ली, चार्ली चेपलिन!
क्या तुम जानती हो जब तुम नन्ही बच्ची थी तो रात-रातभर मैं तुम्हारे सिरहाने बैठकर तुम्हें स्लीपिंग ब्यूटी की कहानी सुनाया करता था। मैं तुम्हारे सपनों का साक्षी हूं। मैंने तुम्हारा भविष्य देखा है, मंच पर नाचती एक लड़की मानो आसमान में उड़ती परी। लोगों की करतल ध्वनि के बीच उनकी प्रशंसा के ये शब्द सुने हैं, इस लड़की को देखो! वह एक बूढ़े विदूषक की बेटी है, याद है उसका नाम चार्ली था।
...हां! मैं चार्ली हूं! बूढ़ा विदूषक! अब तुम्हारी बारी है! मैं फटी पेंट में नाचा करता था और मेरी राजकुमारी! तुम रेशम की खूबसूरत ड्रेस में नाचती हो। ये नृत्य और ये शाबाशी तुम्हें सातवें आसमान पर ले जाने के लिए सक्षम है। उड़ो और उड़ो, पर ध्यान रखना कि तुम्हारे पांव सदा धरती पर टिके रहें। तुम्हें लोगों की जिन्दगी को करीब से देखना चाहिए। गलियों-बाजारों में नाच दिखाते नर्तकों को देखो जो कड़कड़ाती सर्दी और भूख से तड़प रहे हैं। मैं भी उन जैसा था, प्यारी बेटी जेरल्डिन! उन जादुई रातों में जब मैं तुम्हें लोरी गा-गाकर सुलाया करता था और तुम नीद में डूब जाती थी, उस वक्त मैं जागता रहता था। मैं तुम्हारे चेहरे को निहारता, तुम्हारे हृदय की धड़कनों को सुनता और सोचता, चार्ली! क्या यह बच्ची तुम्हें कभी जान सकेगी? तुम मुझे नहीं जानती, प्यारी बेटी जेरल्डिन! मैंने तुम्हें अनगिनत कहानियां सुनाई हैं, पर उसकी कहानी कभी नहीं सुनाई। वह कहानी भी रोचक है। यह उस भूखे विदूषक की कहानी है, जो लन्दन की गंदी बस्तियों में नाच-गाकर अपनी रोजी कमाता था। यह मेरी कहानी है। मैं जानता हूं पेट की भूख किसे कहते हैं! मैं जानता हूं कि सिर पर छत न होने का क्या दंश होता है। मैंने देखा है, मदद के लिए उछाले गये सिक्कों से उसके आत्म सम्मान को छलनी होते हुए पर फिर भी मैं जिंदा हूं, इसीलिए फिलहाल इस बात को यही छोड़ते हैं।
...तुम्हारे बारे में ही बात करना उचित होगा, प्यारी बेटी! तुम्हारे नाम के बाद मेरा नाम आता है चेपलिन! इस नाम के साथ मैने चालीस वर्षों से भी अधिक समय तक लोगों का मनोरंजन किया, पर हंसने से अधिक मैं रोया हूं। जिस दुनिया में तुम रहती हो वहां नाच-गाने के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आधी रात के बाद जब तुम थियेटर से बाहर आओगी तो तुम अपने समृद्ध और सम्पन्न चाहने वालों को तो भूल सकती हो, पर जिस टैक्सी में बैठकर तुम अपने घर तक आओ, उस टैक्सी ड्राइवर से यह पूछना मत भूलना कि उसकी पत्नी कैसी है? यदि वह उम्मीद से है तो क्या अजन्मे बच्चे के नन्हे कपड़ों के लिए उसके पास पैसे हैं? उसकी जेब में कुछ पैसे डालना न भूलना। मैंने तुम्हारे खर्च के लिए पैसे बैंक में जमा करवा दिए हैं, सोच समझकर खर्च करना।
...कभी कभार बसों में जाना, सब-वे (सुरंगमार्ग) से गुजरना, कभी पैदल चलकर शहर में घूमना। लोगों को ध्यान से देखना, विधवाओं और अनाथों को दया-दृष्टि से देखना। कम से कम दिन में एक बार खुद से यह अवश्य कहना कि, मैं भी उन जैसी हूं। हां! तुम उनमें से ही एक हो बेटी!

...कला किसी कलाकार को पंख देने से पहले उसके पांवों को लहुलुहान जरूर करती है। यदि किसी दिन तुम्हें लगने लगे कि तुम अपने दर्शकों से बड़ी हो तो उसी दिन मंच छोड़कर भाग जाना, टैक्सी पकड़ना और पेरिस के किसी भी कोने में चली जाना। मैं जानता हूं कि वहां तुम्हें अपने जैसी कितनी नर्तक मिलेंगी। तुमसे भी अधिक सुन्दर और प्रतिभावान ! फर्क सिर्फ इतना है कि उनके पास थियेटर की चकाचौंध और चमकीली रोशनी नहीं है। उनकी सर्चलाईट चन्द्रमा है! अगर तुम्हें लगे कि इनमें से कोई तुमसे अच्छा नृत्य करती है तो तुम नृत्य छोड़ देना। हमेशा कोई न कोई बेहतर होता है, इसे स्वीकार करना। आगे बढ़ते रहना और निरंतर सीखते रहना ही तो कला है।
...मैं मर जाउंगा, तुम जीवित रहोगी। मैं चाहता हूं तुम्हें कभी गरीबी का एहसास न हो। इस खत के साथ मैं तुम्हें चेकबुक भी भेज रहा हूं ताकि तुम अपनी मर्जी से खर्च कर सको। पर दो सिक्के खर्च करने के बाद सोचना कि तुम्हारे हाथ में पकड़ा तीसरा सिक्का तुम्हारा नहीं है, यह उस अज्ञात व्यक्ति का है जिसे इसकी बेहद जरूरत है। ऐसे इंसान को तुम आसानी से ढूंढ सकती हो, बस पहचानने के लिए एक नजर की जरूरत है। मैं पैसे की इसलिए बात कर रहा हूं क्योंकि मैं इस राक्षस की ताकत को जानता हूं।
...हो सकता है किसी रोज कोई राजकुमार तुम्हारा दीवाना हो जाए। अपने खूबसूरत दिल का सौदा सिर्फ बाहरी चमक-दमक पर न कर बैठना। याद रखना कि सबसे बड़ा हीरा तो सूरज है जो सबके लिए चमकता है। हां! जब ऐसा समय आये कि तुम किसी से प्यार करने लगो तो उसे अपने पूरे दिल से प्यार करना। मैंने तुम्हारी मां को इस विषय में तुम्हें लिखने को कहा था। वह प्यार के सम्बन्ध में मुझसे अधिक जानती है।
...मैं जानता हूं कि तुम्हारा काम कठिन है। तुम्हारा बदन रेशमी कपड़ों से ढका है पर कला खुलने के बाद ही सामने आती है। मैं बूढ़ा हो गया हूं। हो सकता है मेरे शब्द तुम्हें हास्यास्पद जान पड़ें पर मेरे विचार में तुम्हारे अनावृत शरीर का अधिकारी वही हो सकता है जो तुम्हारी अनावृत आत्मा की सच्चाई का सम्मान करने का सामर्थ्य रखता हो।
...मैं ये भी जानता हूं कि एक पिता और उसकी सन्तान के बीच सदैव अंतहीन तनाव बना रहता है पर विश्वास करना मुझे अत्यधिक आज्ञाकारी बच्चे पसंद नहीं। मैं सचमुच चाहता हूं कि इस क्रिसमस की रात कोई करिश्मा हो ताकि जो मैं कहना चाहता हूं वह सब तुम अच्छी तरह समझ जाओ।
...चार्ली अब बूढ़ा हो चुका है, प्यारी बेटी! ! देर सबेर मातम के काले कपड़ों में, तुम्हें मेरी कब्र पर आना ही पड़ेगा। मैं तुम्हें विचलित नहीं करना चाहता l पर समय-समय पर खुद को आईने में देखना, उसमें तुम्हें मेरा ही अक्स नजर आयेगा। तुम्हारी धमनियों में मेरा रक्त प्रवाहित है। जब मेरी धमनियों में बहने वाला रक्त जम जाएगा तब तुम्हारी धमनियों में बहने वाला रक्त तुम्हें मेरी याद कराएगा। याद रखना, तुम्हारा पिता कोई फरिश्ता नहीं, कोई जीनियस नहीं, वह तो जिन्दगी भर एक इंसान बनने की ही कोशिश करता रहा। तुम भी यही कोशिश करना।

ढेर सारे प्यार के साथ”
Charlie Chaplin

जब कोई जन किसी का अनुरागी होता है, तो वह —“1. अपने अनुराग-भाजन की ख़ुद दूसरों के सम्मुख प्रशंसा करने तथा सुनने की गाढ़ आका...
30/01/2021

जब कोई जन किसी का अनुरागी होता है, तो वह —

“1. अपने अनुराग-भाजन की ख़ुद दूसरों के सम्मुख प्रशंसा करने तथा सुनने की गाढ़ आकांक्षा रखता है।
2. अपने अनुराग-भाजन की प्रशंसा कर के वा सुन के हृदय में अपार सुख तथा रस पाता है।
3. अपने अनुराग-भाजन के समीप रहना चाहता है।
4. अपने अनुराग-भाजन से जुदा होने पर उससे शीघ्र मिलने हेतु व्याकुल हो जाता है।
5. अपने अनुराग-भाजन की प्रत्येक इच्छा पूरी करके अपने प्रति उसके आकर्षण को उत्पन्न या उन्नत करने की गाढ़ आकांक्षा करता है।
6. अपने अनुराग-भाजन को सदा प्रसन्न देखना चाहता है।
7. अपने अनुराग-भाजन को अपनी सेवाओं से सदा प्रसन्न रखने का प्रयास करता है।
8. अपने अनुराग-भाजन को सदा सुन्दर, सुसज्जित एवं स्वस्थ अवस्था में देखने का आकांक्षी रहता है।
9. अपने अनुराग-भाजन के दुःख से दुखी तथा चिन्तित होकर उसके दूर करने हेतु हर तरह का यत्न करने का प्रयास करता है।
10. अपने अनुराग-भाजन की सदा कुशलता चाहता है, तथा जान बूझकर ख़ुद उसे कोई दुःख या हानि नहीं पहुँचाना चाहता, तथा यथा-साध्य किसी अन्य से भी उसे कोई हानि पहुंचने नहीं देता।
11. अपने अनुराग-भाजन की किसी ज्ञात हानि से बहुत क्लेश पाता है।
12. अपने अनुराग-भाजन के किसी अभाव वा दुःख को दूर करके तथा उसके सुख को बढ़ाकर अपने हृदय में सुख वा रस पाता है।”—Spiritual Master Devatma

13/01/2021

अगर बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करें तो देश की बहुत सी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है ...

किनारा ना मिले तो कोई बात नहीं,
लेकिन दूसरों को डूबा कर तैरना नहीं है l

“जब तक कोई जन केवल भलाई के लिए ही भलाई नहीं करता, तब तक उसके जीवन में धर्म का आरम्भ नहीं होता l धर्मवान आत्मा किसी गरज़ य...
09/01/2021

“जब तक कोई जन केवल भलाई के लिए ही भलाई नहीं करता, तब तक उसके जीवन में धर्म का आरम्भ नहीं होता l धर्मवान आत्मा किसी गरज़ या बदले को सन्मुख रखकर नहीं चलता l उसको कोई गाली दे, या कोई बुरा कहे, उसको परवाह नहीं होती l” —Spiritual Master Devatma

https://m.youtube.com/watch?v=IAx46qw-Ctg

“क्या किसी उच्च भाव या उच्च शक्ति की सुंदर छवि नज़र आती हैं ? देव समाज में कितने ग्रेजुएट हैं, जिन्होंने देवात्मा की जीवन...
08/01/2021
श्रद्धावानम लभते ज्ञानम 31/12/2020 Dr. Khera

“क्या किसी उच्च भाव या उच्च शक्ति की सुंदर छवि नज़र आती हैं ? देव समाज में कितने ग्रेजुएट हैं, जिन्होंने देवात्मा की जीवन कथा लिखी हो ? मेरे इर्द गिर्द बहुत पढ़े लिखे रहते हैं l क्या उन्होंने देवात्मा की महिमा के सम्बन्ध में लिखा हैं ? इससे मालूम हो जायेगा की उनका हुनर कहा तक काम आया हैं l”—Devatma

https://www.youtube.com/watch?v=xu-pg_qlQv8

In brief summary —The series of THE HIGHEST MEANING OF LIFE.Devatma School of thought is based on Naturalistic philosophy, Evolution, Scientific Method, Opti...

“रात का समय था, और चारों ओर सन्नाटा था l मेरे इर्द गिर्द जो लोग मौजूद थे, वह यही समझते थे कि मेरे लिए वह रात काटनी मुश्क...
23/12/2020

“रात का समय था, और चारों ओर सन्नाटा था l मेरे इर्द गिर्द जो लोग मौजूद थे, वह यही समझते थे कि मेरे लिए वह रात काटनी मुश्किल हैं l मुझे खुद भी पता न था, की मैं कहा हूं l परन्तु इस घोर संकट की अवस्था में भी मेरे कुछ परलोकवासी उच्च सम्बन्धी मेरे पास उपस्थित होकर मेरे बचाने के लिए अपना अपना धर्म बल प्रयोग कर रहे थे l जीवन और मृत्यु में संग्राम जारी था l आखिरकार धर्मबल गालिब आया, मृत्यु का कार्य बंद हुआ, और प्राय: दो महीने में मैं फिर चलने फिरने के लायक बन गया l मौत के बिस्तर से उठकर मैं फिर अपने व्रत सम्बन्धी कार्य में लग गया l”—Spiritual Master Devatma

“ज़िन्दगी गुलाम रहने के लिए नहीं हैं, इसलिए तुम गुलामी से निकलो और उच्च जीवन लाभ के लिए संग्राम करो l जिंदगी संग्राम की च...
13/12/2020

“ज़िन्दगी गुलाम रहने के लिए नहीं हैं, इसलिए तुम गुलामी से निकलो और उच्च जीवन लाभ के लिए संग्राम करो l जिंदगी संग्राम की चीज हैं, वह संग्राम से ही बनती हैं और यूं ही नहीं बनती ”—Spiritual Master Devatma

“जो वज़ूद जिस सम्मान और इज़्ज़त  के योग्य हैं, वह चाहे इस दुनियां में रहता हो और चाहे इस दुनियां को छोड़ कर परलोक में चला गय...
09/12/2020

“जो वज़ूद जिस सम्मान और इज़्ज़त के योग्य हैं, वह चाहे इस दुनियां में रहता हो और चाहे इस दुनियां को छोड़ कर परलोक में चला गया हो, तुम उसे वह सम्मान देते हो या नहीं ? यदि ऐसा सम्मान नहीं देते, तो तुम अपनी जिंदगी के विचार से बहुत घटिया मनुष्य हो और यदि उसके खिलाफ तुम उसका अपमान भी करते हो, तो तुम बहुत ही नीच मनुष्य हो l”
—Spiritual Master Devatma

“गैलीलियो ने कहा था कि न कोई सूर्यास्त होता है, न कोई सूर्योदय। धारणा यह थी कि सूरज चक्कर लगाता है पृथ्वी के। और गैलीलिय...
07/12/2020

“गैलीलियो ने कहा था कि न कोई सूर्यास्त होता है, न कोई सूर्योदय। धारणा यह थी कि सूरज चक्कर लगाता है पृथ्वी के। और गैलीलियो ने कहा कि पृथ्वी चक्कर लगाती है सूरज के। बात ही बदल दी। सारी दुनिया मानती थी एक बात और गैलीलियो ने लिखी दूसरी ही बात।

महा निंदा हुई। कैथलिक पोप ने उसे रोम बुलाया और कहा, तुम माफी मांग लो। वह बूढ़ा हो चुका था--पचहत्तर साल का हो चुका था। बीमार था, बिस्तर से उसे घसीट कर लाया गया और कहा कि तुम क्षमा मांग लो, अन्यथा मरने के लिए तैयार हो जाओ।

गैलीलियो बड़ा समझदार आदमी रहा होगा। बहुत कम लोगों ने उसकी समझदारी की प्रशंसा की है। लोग समझते हैं वह कायर था, क्योंकि उसने क्षमा मांग ली। मैं ऐसा नहीं समझता, क्योंकि क्षमा उसने इस ढंग से मांगी कि वह कायरता नहीं बताती। वह उस आदमी की समझदारी बताती है। और वह उस आदमी की इतनी गहरी समझदारी बताती है कि पोप और उनका पूरा का पूरा मंडल जो निर्णायक बना बैठा था, उसकी मूर्खता सिद्ध होती है। गैलीलियो ने कहा कि आप कहें तो अभी क्षमा मांग लूं। मुझे क्या अड़चन है! अरे, मुझे लेना-देना क्या! मैं लिख दूंगा अपनी किताब में कि पृथ्वी चक्कर नहीं लगाती, सूरज ही चक्कर लगाता है।

पोप प्रसन्न हुआ, उसका मंडल प्रसन्न हुआ। गैलीलियो ने खड़े होकर कहा, लेकिन एक बात खयाल रहे, मेरे लिखने से कुछ भी न होगा। चक्कर तो पृथ्वी ही लगाती है। मैं लिख दूंगा, मुझे लिखने में कोई अड़चन नहीं। मैं क्यों झंझट में पडूं, मुझे क्या लेना-देना, पृथ्वी लगाए चक्कर कि सूरज लगाए चक्कर। मगर इतना मैं कहे देता हूं, मेरे लिखने से कुछ बदलाहट होगी नहीं, बात कुछ बनेगी नहीं। लाख मेरे जैसे गैलीलियो लिखते रहें कि सूरज चक्कर लगाता है, सूरज सुनेगा नहीं। और तुम सूरज को सजा भी नहीं दे सकते। तुम उसे अदालत में भी नहीं ला सकते। मैं तो घुटने टेक कर क्षमा मांगता हूं कि मुझे माफ कर दो। न मालूम किस पागलपन में मैंने यह बात लिख दी। सच्ची बातें कहनी ही नहीं चाहिए। सच्ची बातें कहने का परिणाम बुरा होता है, यह तो मैंने सुना था, आज देख भी लिया। मैं माफी मांगता हूं और मैं लिखता हूं कि सूरज चक्कर लगाता है। मगर फिर भी जाते-जाते मैं कह जाता हूं, ध्यान रखना, मेरी सूरज मानता नहीं, पृथ्वी मेरी मानती नहीं। चक्कर तो पृथ्वी ही लगाती है और लगाती रहेगी।

यह आदमी अदभुत सूझ-बूझ का आदमी रहा होगा। इसने क्या व्यंग्य किया, गहरा व्यंग्य किया! माफी भी मांग ली और उन बुद्धुओं को बुद्धू भी साबित कर दिया। लेकिन आज हम जानते हैं कि गैलीलियो सही था।

यह सनातन कथा है कि बहुत बार कांच कंचन होने का दावा करता है। और भीड़ को जंचती है यह बात, क्योंकि कांच सस्ता मिल जाता है, बिना कीमत चुकाए मिल जाता है।”

“नेचर तुमसे चाहती हैं की जिस जिस पहलू में कोई अस्तित्व सम्मान का पात्र हैं, तुम उस उस पहलू में उसे सम्मान दो l यदि तुम ऐ...
05/12/2020

“नेचर तुमसे चाहती हैं की जिस जिस पहलू में कोई अस्तित्व सम्मान का पात्र हैं, तुम उस उस पहलू में उसे सम्मान दो l यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम जीवन के विचार से बहुत घटिया इंसान हो l किसी जन की कोई सच्ची खूबी देखकर उसके आगे दिल का झुकना सच्चा सम्मान हैं l सच्चे सम्मान के भाव से परिचालत होकर यदि सम्मान के पात्र वज़ूद का सम्मान किया जावे, तो उससे आत्मा में बेहतरी आती हैं l”—Spiritual Master Devatma

श्रद्धा विषयक सात्विक भाव “जब किसी मनुष्य के आत्मा में विशुद्ध परोपकार विषयक किसी सात्विक भाव की उत्पत्ति हुई हो, और वह ...
04/12/2020

श्रद्धा विषयक सात्विक भाव
“जब किसी मनुष्य के आत्मा में विशुद्ध परोपकार विषयक किसी सात्विक भाव की उत्पत्ति हुई हो, और वह अपने उस सात्विक भाव से ही परिचालित होकर नेचर के मनुष्य वा पशु वा उद्भित जगतों में से किसी जगत के अस्तित्वों में से किसी के सम्बन्ध में कोई विशुद्ध परोपकार विषयक कार्य और उसके निमित सब प्रकार का आवश्यक समर्पण और त्याग करता हो, तब उसके किसी ऐसे परोपकार सम्बन्धी काम के सौन्दर्य को देखकर वा जानकर यदि किसी ऐसे परोपकार सम्बन्धी काम के सौंदर्य को देखकर वा जानकर यदि किसी मनुष्यों को उसकी महिमा दिखाई दे, और वह एक उस महिमा को उपलब्ध करने पर अपने भीतर प्रबल आकांक्षा अनुभव करता हो, और दूसरी और किसी प्रकार के लालच वा डर के बिना अन्य जनों के सम्मुख उनकी प्रशंसा करने के लिए अपने में यथेष्ट उच्च भाव रखता हो, और इस भाव के अनुसार उसका प्रचार करता हो, और ऐसा करके ही अपने भीतर उच्च आराम व शांति अनुभव करता हो, और इस हितकर कार्य के निमित वह एक व दूसरी सीमा तक आप भी आवश्यक समर्पण और त्याग करता हो, तो उसके इस भाव को सात्विक श्रद्धा कहते हैं l”—Spiritual Master Devatma

“जब कोई जन किसी मनुष्य वा पशु जगत के किसी बड़े वा छोटे जीव के किसी शारीरिक कष्ट को देख वा सुन कर (कि जिसके साथ नीच अनुराग...
20/11/2020

“जब कोई जन किसी मनुष्य वा पशु जगत के किसी बड़े वा छोटे जीव के किसी शारीरिक कष्ट को देख वा सुन कर (कि जिसके साथ नीच अनुराग बंधन से बंधा हुआ न हो) अपने ह्रदय में कोई आघात वा चोट अनुभव करता हो, और उस आघात के अनुभव करने पर उसके उस कष्ट के चले जाने के निमित्त अपने ह्रदय में बार बार उसी प्रकार की आकांक्षा वा प्रेरणा अनुभव करता हो, जिस प्रकार वह अपने किसी कष्ट के दूर हो जाने के निमित करता है; और वह अपनी इस प्रबल आकांक्षा वा प्रेरणा के अनुसार उसके दूर होने के निमित्त कोई चिंता वा विचार करता हो और वह अपने इस विचार के अनुसार उसके दूर होने के निमित्त अपनी और से उसे कोई परामर्श देता वा उसे कोई उपाय बताता हो, अथवा इससे भी बढ़कर उसके उस कष्ट को दूर करने के निमित्त वह आप कोई उचित उपाय वा काम करता हो; तब उसके भीतर का यह श्रेष्ठ भाव कि जिसके द्वारा वह किसी और के दुःख व कष्ट को अनुभव करता और उसके दूर होने का आकांक्षी बनता हैं, पर-कष्ट अनुभुति विषयक सात्विक भाव कहलाता हैं l”—Spiritual Master Devatma
https://www.youtube.com/channel/UCMtp5bVKwb2By859fF6dZRA

देवात्मा ने एक बार लाहौर की एक वाटिका में छात्रों को संबोधित करते हुए कामना की थी —“समय आएगा जब मेरे दर्शन को भी विद्यार...
16/11/2020

देवात्मा ने एक बार लाहौर की एक वाटिका में छात्रों को संबोधित करते हुए कामना की थी —“समय आएगा जब मेरे दर्शन को भी विद्यार्थी इसी प्रकार पढेंगे l” देवात्मा के प्रकृतिवादी दर्शन की इस प्रस्तुति के फलस्वरूप समकालीन भारतीयदर्शन की एकांगी विचारधारा की परिणति एक सर्वांग दर्शन के रूप में होगी, ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास हैं l —Dr Rakesh kumar Satyashree

“जब किसी मनुष्य के आत्मा में कोई ऐसा भाव जाग्रत हुआ हो, कि जिसकी प्रेरणा से वह अपने उन पारिवारिक और कुछ अन्य जनों के भिन...
13/11/2020

“जब किसी मनुष्य के आत्मा में कोई ऐसा भाव जाग्रत हुआ हो, कि जिसकी प्रेरणा से वह अपने उन पारिवारिक और कुछ अन्य जनों के भिन्न कि जिन से साथ वह किसी नीच अनुराग व मोह के बंधन से बंधा हुआ हो; किसी और मनुष्य वा पशु वा वृक्ष वा पौधे आदि के सम्बन्ध में बिना किसी और की प्रेरणा के अपने आप किसी प्रकार का उपकार विषयक कोई कर्म करना चाहता और करता हो, और ऐसा करके उसके बदले में अपना कोई सुख विषयक अभीष्ट सिद्ध करना न चाहता हो, तब उसके ऐसे किसी भी भाव को परोपकारी सम्बन्धी सात्विक भाव कहते हैं l”—Spiritual Master Devatma

अगर जिदंगी में बड़ी यात्रा करनी हो और जीवन को उन महान रास्तों पर ले जाना हो कि जीवन में महानता की रौशनी या असर निकले, तब...
09/11/2020

अगर जिदंगी में बड़ी यात्रा करनी हो और जीवन को उन महान रास्तों पर ले जाना हो कि जीवन में महानता की रौशनी या असर निकले, तब तो फिर बहुत कुछ करना पड़ेगा। खुद को मिटाना पड़ेगा, नया करना पड़ेगा; खुद को बदलना पड़ेगा। मेहनत की बात होगी, श्रम लगेगा, साधना लगेगी। हमें उच्च भावनाओं को विकसित करना होगा। उच्च मूल्यों को विकसित करना होगा। अन्यथा जीवन व्यर्थ एवं बेस्वाद हो जाएगा।

जिसको हम अभी तक इंसान कहते रहे हैं, वह कोई इंसान नहीं है। केवल थोड़े से लोग मनुष्य-जाति के इतिहास में इंसान बने हैं। वे ...
08/11/2020

जिसको हम अभी तक इंसान कहते रहे हैं, वह कोई इंसान नहीं है। केवल थोड़े से लोग मनुष्य-जाति के इतिहास में इंसान बने हैं। वे ही थोड़ी से इंसान, जिन्होंने अपने हृदय में उच्च भावनाओं का विकास किया है। जो दूसरों के लिए जीते है। जो अपने जीवन को उच्चतम अर्थ देते है। Newton, Galileo, Darwin, Einstein, Freud etc. in the world of Science; Lincoln, Shri Vidyasagar, Raja Ram Mohun Roy, Karl Marx etc. in the social field; Mazzini, Lenin, Gandhi etc. in the political field etc etc. —whose contributions are monuments to their greatness and humanity takes off its hat in homage to their great sacrifice, gigantic courage and master intellects. They have fought against false beliefs and social tyrannies and political injustices.
शेष सब नाममात्र के आदमी हैं। उनके ऊपर लेबल आदमी का है, खोखा आदमी का है। भीतर कुछ भी नहीं है। और जो कुछ भी है, वह हर तरह के जहर से भरा है, ईर्षा से भरा है, विध्वंस से भरा है, हिंसा से भरा है।
अंतिम रूप में हमें यह समझ लेना होगा कि अगर जीवन में जरा भी बुद्धि है, तो इस चुनौती को स्वीकार कर लेना कि बिना अपने को जाने or without the true knowledge of soul अर्थात बिना आत्मा का पूर्ण सत्य ज्ञान और आत्म बोध, अर्थी को उठने नहीं देंगे। हाँ, अपने को जानकर कल की उठने वाली अर्थी आज उठ जाए, तो भी कोई हर्ज नहीं, क्योंकि जिसने अपने को जान लिया, उसकी फिर कोई मृत्यु नहीं है। यह अमृत का अनुभव एकमात्र विकास है। और यह सब देवात्मा के देवप्रभावों के बिना कतई संभव नहीं हैं l

“क्या मेरा मिशन नेचर के नियमानुसार नहीं ? क्या वह कभी मिट सकता है ? क्या वह उन्नति करने और फ़ैलने के बिना रह सकता है ? हे...
06/11/2020

“क्या मेरा मिशन नेचर के नियमानुसार नहीं ? क्या वह कभी मिट सकता है ? क्या वह उन्नति करने और फ़ैलने के बिना रह सकता है ? हे आकाश तू बोल ! हे पृथ्वी तू साक्षी दे !” इन धर्म-बल से परिपूर्ण शब्दों की लहर से धरती हिल गई, आकाश कांप उठा और मेरे इन प्रश्नों के उत्तर में गुप्त-स्वर में यह गूँज उत्पन्न हुई :—
“निश्चय तेरा मिशन नेचर के नियमानुसार है — धैर्य रख और विश्वास कर, कि यह उन्नति करने और फ़ैलने के बिना नहीं रहेगा — हम दोनों ही इस बात की सच्ची साक्षी देते हैं |”
Spiritual Master Devatma

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Chase the Dreams which make your life meaningful.
~My humble request to all, kindly read in full. From …ALTRUISM …Secular Moral Spectrum A Student---What is the kind of atmosphere that the Dev Samaj provides? Teacher ---I give you a few facts and you can draw the conclusions for yourselves. In the first place, the Dev Samaj does not admit any man even as the lowest grade member, who has not given up eight specified gross sins about which he takes the following pledges: 1.I shall not myself take or give or cause to be given to others intoxicants, such as wine, opium, bhang, tobacco, charas, chandu, cocaine etc., except on medical grounds. 2.I shall not myself eat or give or cause to be given to others for eating, flesh or eggs or anything made therefrom. 3.I shall neither gamble nor be helpful to the others in such an act. 4.I shall neither steal anything nor help others in committing theft. 5.I shall not take bribes in performance of my legitimate duties. 6.I shall not withhold any money or any other thing entrusted to me as deposit; I shall not suppress payment of any donation promised by me towards a beneficent cause, nor withhold any debt borrowed by me from anybody, when I am able to pay or return it; I shall not suppress payment of the price of anything purchased by me. 7.I shall neither commit adultery, nor help others in doing so, nor remarry in the life time of my wife or husband. 8.I shall not knowingly kill any sentient being without a just cause for doing so, i.e. , when one is obliged to use the right of defense for himself or his relations or property etc. The freedom from these gross sins is the minimum moral life which the Dev Samaj is achieving in the lives of fit souls who come under its influence.