Devatma Science Museum

Devatma Science Museum Devatma

Devatma Science Museum Represents the philosophy of Devatma-ONTOLOGY, EPISTEMOLOGY, ETHICS & RELIGION which motivates the Altruistic conduct, pathways of altruistic conduct and scientic philosophy on life after death. First time in the History, Devatma Science Museum explains how to be good in relation to self, society and world in the light of science.

11/06/2020

तुम कैसे सपने के बाहर जाग जाओ।
तो ही तुम जीवन के वास्तविक रूप को जान सकोगे,
तो ही तुम उस जीवन को जान सकोगे जिसकी कोई मृत्यु नहीं है।
अभी तो जिसे तुमने जीवन समझा है, वह मान्यता है। वह जीवन नहीं है।
इसे कौन जीवन कहेगा जो आज है और कल नहीं हो जाएगा?
पानी का बबूला है, भोर का तारा है, अभी है, अभी गया।
घास के पत्ते पर टिकी शबनम की बूंद है।
कब गिर जाएगी, कोई भी नहीं जानता।
ऐसे जीवन पर भरोसा कर लेता है आदमी!
नींद बड़ी गहरी होनी चाहिए, बेहोशी महान होनी चाहिए।
और रोज तुम देखते हो कोई बूंद गिरी, रोज तुम देखते हो कोई तारा डूबा,
रोज तुम देखते हो कोई बबूला फूटा और खो गया हवा में।
तुम दो आंसू भी बहा लेते हो किसी की मृत्यु पर, सहानुभूति भी प्रगट कर आते हो;
लेकिन तुम्हें यह बोध नहीं आता कि यह मृत्यु तुम्हारी मृत्यु की भी खबर है।तुम मरघट भी हो आते हो और फिर वैसे के वैसे संसार में वापस लौट आते हो।
नींद बड़ी गहरी होगी। मरघट भी नहीं तोड़ पाता।

निकटतम प्रियजन मर जाता है तो भी तुम जो मर गया उसके लिए रो लेते हो, लेकिन तुम्हें यह होश नहीं आता कि तुम्हारी मौत भी करीब आयी चली जाती है। आज कोई मरा है, कल तुम भी मरोगे। लोग इस विचार से बचते हैं, लोग इस विचार से डरते हैं।

11/06/2020

हम अपने पूरे जीवन में नाम देने को ही ज्ञान मानते हैं।
एक बच्चा पूछता है सामने खड़े पशु को देख कर, क्या है?
और हम कहते हैं, गाय है। या हम कहते हैं कुत्ता, या हम कहते हैं घोड़ा। और बच्चा नाम सीख लेता है। इस सीखने को ही वह जानना मानेगा।

जो हमारा ज्ञान है, वह इसी तरह सीखे गए नाम हैं।

न हम गाय को जानते हैं, न हम घोड़े को जानते हैं।
हम नाम जानते हैं, हम लेबल लगाना जानते हैं।
और जो आदमी जितने ज्यादा लेबल पहचानता है,
उतना बड़ा ज्ञानी समझा जाता है।
यह नाम जान लेना भी बड़े मजे की बात है।

क्योंकि न तो गाय कहती है कि उसका नाम गाय है,
और न घोड़ा कहता है कि उसका नाम घोड़ा है।
हमने ही दिए हैं नाम और फिर हम ही उन नामों
से परिचित होकर ज्ञानी हो जाते हैं।
वह जो अस्तित्व है, अपरिचित ही रह जाता है, अनजाना रह जाता है।
अब्राहम मैसलो ने एक संस्मरण लिखा है। उसने लिखा है कि मैं जिस विश्वविद्यालय में पढ़ता था, उस विश्वविद्यालय में एक बहुत बड़े ज्ञानी प्रोफेसर थे। और उनको चीजों को नाम देने की और हर चीज को व्यवस्थित करने की ऐसी विक्षिप्त आदत थी कि अखबार भी पुराने वे तारीखें-नाम लगा कर फाइल करते जाते थे।
दाढ़ी बनाने का ब्लेड भी जब खराब हो जाए, तो किस तारीख को शुरू किया और किस तारीख को खराब हुआ, वे लेबल लगा कर सम्हाल कर रख देते थे।

मैसलो ने लिखा है कि एक दिन वह उनके घर गया तो उसने पियानो का ढक्कन उठा कर देखा, तो उसमें नीचे बड़े अक्षरों में लिखा था--पियानो।यह प्रोफेसर हमें पागल मालूम पड़ेगा।
लेकिन अगर यह पागल है तो हम भी थोड़ी मात्रा में पागल हैं।
वह अंतिम सीमा तक चला गया। कुर्सी पर लिखा हुआ है
कुर्सी, दरवाजे पर लिखा हुआ है दरवाजा; यह हमें पागल मालूम पड़ता है।
लेकिन हमारा ज्ञान भी और क्या है? हमारा सारा ज्ञान नामकरण है, लेबलिंग। और हमने--मजा यह है कि उस प्रोफेसर ने तो पियानो पर लिखा कि पियानो, दरवाजे पर लिखा दरवाजा, कुर्सी पर लिखा कुर्सी--हमने देवात्मा पर भी लिख छोड़ा है देवात्मा ।
आत्मा, मोक्ष, स्वर्ग, नरक।नाम देने से ऐसा भ्रम पैदा होता है कि हम जानते हैं।

10/06/2020

इंग्लैंड में ब्रिस्टल में लोगों ने सत्रहवीं सदी के गुलामों के खरीदार बदनाम
सांसद एडवर्ड कोलस्टन की प्रतिमा गिरा डाली। इंसानियत के कलंक की मूर्ति को ढहाने वाले ज्यादातर गोरे ही हैं।
एडवर्ड बहुत बड़ा समाजसेवी था। बहुत सारे अस्पताल, स्कूल, इमारतें और सड़कें उसने बनवाईं, लेकिन काले लोगों की खरीद-फरोख्त में अव्वल था।
उसकी कंपनी करीब 84,000 अफ्रीकी लोगों को गुलाम बनाकर इंग्लैंड लाई थी और उन्हें बेच दिया था। इनमें से करीब 19,000 रास्ते में ही मर गए।
लोगों ने एडवर्ड के तमाम नेक कार्यों को एकदम दरकिनार करते हुए उसे इंसानियत का दुश्मन बताया और उसकी प्रतिमा को पैरों से कुचला।
अगर भारत में ये हो जाए, तो जाने कितने महान और महात्मा जमींदोज़ होते दिखेंगे।

09/06/2020

"मैं आपके लिए एक उच्च ज्योति (Light) लाया हूं। आप मेरे साथ जुड़ो तथा उस ज्योति को लाभ करो, जोकि मुझ में है”—देवात्मा

Shriman Devat singh
08/06/2020

Shriman Devat singh

अद्वितीय है रूप तुम्हारा - जन-समाज में हैभगवन,
अद्वितीय प्रकाश तुम्हारा -विश्व के भीतर है भगवन ।
आत्म-जगत में अंधकार के - तुम हो नाशक हे भगवन;
जीवन विषयक तत्व-ज्ञान के - तुम प्रकाशक हे भगवन ।
धर्म-अधर्म के सत्य-ज्ञान के - तुम हो दाता हे भगवन;
आत्म-रूप और सत्य धर्म के - तुम दर्शाता हे भगवन ।
पापी-जनों के जीवन के तुम - सच्चे त्राता हे भगवन;
महा-मोह के कठिन जाल से - मुक्ति-दाता हे भगवन ।
पाप-बोध पापी के भीतर - उतपन्न कर्ता हे भगवन;
पाप-मला से उसके मन को - निर्मल कर्ता हे भगवन ।
योग्य-जनों में उच्च जीवन के - विकसित कर्ता हे भगवन;
धर्म-कार्य करने के हेतु - तुम बल दाता हे भगवन ।
विश्व के सारे ही जगतों के - तुम हितकर्ता हे भगवन;
सम्बन्धों में उच्च मेल के - उत्तपन्न कर्ता हे भगवन ।
ऐसा देवरूप जो तुमरा - उसको ध्याऊँ हे भगवन;
नगर नगर में उसकी महिमा - मैं फैलाऊँ हे भगवन ।

07/06/2020

“हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पर रोती है, बड़ी मुशकिल से होता है चमन मे दीदावर पैदा"
"कभी- कभी ये बात सबके जेहन में आती होगी, कि उसके मन की फकीरी पर कुबेर की सम्पदा भी रोती होगी "

यही नहीं कि अँधेरों को दर-ब-दर कर दे।चराग़ वो है जो आँधी को बेअसर कर दे।।Butज़रूरत थी खतम हो गईमोहब्बत होती तो आज भी होती
24/05/2020

यही नहीं कि अँधेरों को दर-ब-दर कर दे।
चराग़ वो है जो आँधी को बेअसर कर दे।।
But
ज़रूरत थी खतम हो गई
मोहब्बत होती तो आज भी होती

मदर्स डे के उपलक्ष में एक बेटी के द्वारा पिता के सम्मान में लिखा गया पत्र, जो नीचे दिया जा रहा है, यह एक भावना प्रधान ले...
16/05/2020

मदर्स डे के उपलक्ष में एक बेटी के द्वारा पिता के सम्मान में लिखा गया पत्र, जो नीचे दिया जा रहा है, यह एक भावना प्रधान लेख है, जो बहन शशि जी के माध्यम से प्राप्त हुआ है।
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. मदर्स डे पर पिता के
प्यार की पाती।
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*मुझसे कोई गलती हुई है, तो सुधारने का एक मौका दें, मैं आप का सदैव ऋणी रहूंगा।*
एक शहर के अन्तरराष्ट्रीय प्रसिद्धि के विद्यालय के बगीचे में वह तेज धूप और गर्मी की परवाह किये बिना, बड़ी लग्न के साथ पेड़ पौधों की काट-छांट में लगा था कि, तभी विद्यालय के चपरासी की आवाज सुनाई दी, "गंगादास! तुझे प्रधानाचार्या जी तुरंत बुला रही हैं।"
गंगादास को आखिरी पांच शब्दों में काफी तेजी महसूस हुई और उसे लगा कि कोई महत्वपूर्ण बात हुई है, जिसकी वजह से प्रधानाचार्या जी ने उसे तुरंत ही बुलाया है।
वह शीघ्रता से उठा, अपने हाथों को धोकर साफ किया और द्रुत गति से चल दिया प्रधानाचार्य के कार्यलय की ओर।
उसे प्रधानाचार्य महोदया के कार्यालय की दूरी मीलों की लग रही थी, जो खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। उसकी ह्र्दयगति बढ़ गई थी। सोच रहा था, कि उससे क्या गलत हो गया, जो आज उसको प्रधानाचार्य महोदया ने तुरंत ही अपने कार्यालय में आने के लिए कहा है।
वह एक ईमानदार कर्मचारी था और अपने कार्य को पूरी निष्ठा के साथ पूर्ण करता था । पता नहीं उससे क्या गलती हो गयी ? वह इसी चिंता के साथ प्रधानाचार्य के कार्यालय पहुचा......
"मैडम क्या मैं अंदर आ सकता हूं, आपने मुझे बुलाया था।"
"हाँ आओ और यह देखो" प्रधानाचार्या महोदया की आवाज में कड़की थी और उनकी उंगली एक पेपर पर इशारा कर रही थी। "पढ़ो इसे" प्रधानाचार्या ने आदेश दिया।
"मैं, मैं, मैडम! मैं तो इग्लिश पढ़ना नही जानता मैडम!" गंगादास ने घबरा कर उत्तर दिया।
"मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ मैडम। यदि कोई गलती हो गयी हो तो। मैं आपका और विद्यालय का पहले से ही बहुत ऋणी हूँ, क्योंकि आपने मेरी बिटिया को इस विद्यालय में निःशुल्क पढ़ने की अनुमति दी हुई है। मुझे कृपया एक और मौका दें, मेरी कोई गलती हुई है तो सुधारने का। मैं आप का सदैव ऋणी रहूंगा।" गंगादास बिना रुके घबरा कर बोलता चला जा रहा था।

प्रधानाचार्या ने उसे टोका "तुम बिना वजह अनुमान लगा रहे हो। थोड़ा इंतज़ार करो मैं तुम्हारी बिटिया की कक्षा-अध्यापिका को बुलाती हूँ।"

वे पल जब तक उसकी बिटिया की कक्षा-अध्यापिका प्रधानाचार्या के कार्यालय में पहुची बहुत ही लंबे हो गए थे गंगादास के लिए। सोच रहा था कि क्या उसकी बिटिया से कोई गलती हो गयी, कहीं मैडम उसे विद्यालय से निकाल तो नहीं रही। उसकी चिंता और बढ़ गयी थी।
कक्षा-अध्यापिका के पहुंचते ही प्रधानाचार्या महोदया ने कहा "हमने तुम्हारी बिटिया की प्रतिभा को देखकर और परख कर ही उसे अपने विद्यालय में पढ़ने की अनुमति दी थी। इस पेपर में जो लिखा है, अब ये मैडम उसे पढ़कर और हिंदी में तुम्हे सुनाएंगी। गौर से सुनो।"
कक्षा-अध्यापिका ने पेपर को पढ़ना शुरू करने से पहले बताया, "आज मातृ दिवस था और आज मैने कक्षा में सभी बच्चों को अपनी अपनी माँ के बारे में एक लेख लिखने को कहा, तुम्हारी बिटिया ने जो लिखा उसे सुनो।"
उसके बाद कक्षा-अध्यापिका ने पेपर पढ़ना शुरू किया।
मैं एक गाँव में रहती थी, एक ऐसा गाँव जहाँ शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाओं का आज भी बहुत अभाव है। चिकित्सक के अभाव में कितनी ही माँयें दम तोड़ देती हैं बच्चों के जन्म के समय। मेरी माँ भी उनमें से एक थी। उसने मुझे छुआ भी नहीं, कि चल बसी। मेरे पिता ही वे पहले व्यक्ति थे मेरे परिवार के जिन्होंने मुझे गोद में लिया। पर सच कहूँ तो मेरे परिवार के वो अकेले व्यक्ति थे, जिन्होंने मुझे गोद में उठाया था। बाकी शेष की नजर में मैं अपनी माँ को खा गई थी। मेरे पिताजी ने मुझे माँ का प्यार दिया। मेरे दादा दादी चाहते थे कि मेरे पिताजी दुबारा विवाह करके एक पोते को इस दुनिया में लाएं, ताकि उनका वंश आगे चल सके। परंतु मेरे पिताजी ने उनकी एक न सुनी और दुबारा विवाह करने से मना कर दिया। इस वजह से मेरे दादा दादीजी ने उनको अपने से अलग कर दिया और पिताजी सब कुछ, जमीन, खेती बाड़ी, घर सुविधा आदि छोड़ कर मुझे साथ लेकर शहर चले आये और इसी विद्यालय में माली का कार्य करने लगे। मुझे बहुत ही लाड़ प्यार से बड़ा करने लगे। मेरी जरूरतों पर माँ की तरह हर पल उनका ध्यान रहता है।"
"आज मुझे समझ आता है, कि वे क्यों हर उस चीज को जो मुझे पसंद थी, ये कह कर खाने से मना कर देते थे, कि वह उन्हें पसंद नही है, क्योंकि वह आखिरी टुकड़ा होती थी। आज मुझे बड़ा होने पर उनके इस त्याग के महत्व का पता चला।"
"मेरे पिता ने अपनी क्षमताओं में मेरी हर प्रकार की सुख सुविधाओं का ध्यान रखा, और मेरे विद्यालय ने उनको यह सबसे बड़ा पुरुस्कार दिया, जो मुझे यहाँ निःशुल्क पढ़ने की अनुमति मिली। उस दिन मेरे पिता की खुशी का कोई ठिकाना न था।"

"यदि माँ, प्यार और देखभाल करने का नाम है, तो मेरी माँ मेरे पिताजी हैं।"
"यदि दया भाव, माँ को परिभाषित करता है, तो मेरे पिताजी उस परिभाषा के हिसाब से पूरी तरह मेरी माँ हैं।"
"यदि त्याग, माँ को परिभाषित करता है, तो मेरे पिताजी इस वर्ग में भी सर्वोच्च स्थान पर हैं।"
"यदि संक्षेप में कहूँ कि प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग माँ की पहचान है, तो मेरे पिताजी उस पहचान पर पूरी तरह खरे उतरते हैं। और मेरे पिताजी विश्व की सबसे अच्छी माँ हैं।"
आज मातृ दिवस पर मैं अपने पिताजी को शुभकामना दूंगी और कहूंगी, कि आप संसार के सबसे अच्छे प्रतिपालक हैं। बहुत गर्व से कहूंगी कि ये जो हमारे विद्यालय के परिश्रमी माली हैं, ये मेरे पिता हैं।"
"मैं जानती हूं कि मैं आज की लेखन परीक्षा में असफल हो जाऊंगी, क्योकि मुझे माँ पर लेख लिखना था। पर मैने पिता पर लिखा, पर यह बहुत ही छोटी सी कीमत होगी उन सबकी तुलना में, जो कुछ मेरे पिता ने मेरे लिए किया है। धन्यवाद"।
आखरी शब्द पढ़ते पढ़ते अध्यापिका का गला भर आया था और प्रधानाचार्या के कार्यालय में शांति छा गयी थी।
इस शांति में केवल गंगादास के सिसकने की आवाज सुनाई दे रही थी। बगीचे में धूप की गर्मी उसकी कमीज को गीला न कर सकी, पर उस पेपर पर बिटिया के लिखे शब्दों ने उस कमीज को पिता के आसुंओ से गीला कर दिया था। वह केवल हाथ जोड़ कर वहाँ खड़ा था।
उसने उस पेपर को अध्यापिका से लिया और अपने हृदय से लगाया और रो पड़ा।
प्रधानाचार्या ने खड़े होकर उसे एक कुर्सी पर बैठाया और एक गिलास पानी दिया तथा कहा, "गंगादास तुम्हारी बिटिया को इस लेख के लिए पूरे 10/10 नम्बर दिए गए हैं। यह लेख मेरे अब तक के पूरे विद्यालय जीवन का सबसे अच्छा मातृ दिवस का लेख है। हम कल मातृ दिवस अपने विद्यालय में बड़े जोरशोर से मना रहे हैं। इस दिवस पर विद्यालय एक बहुत बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है। विद्यालय की प्रबंधक कमेटी ने आपको इस कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाने का निर्णय लिया है। यह सम्मान होगा उस प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग का, जो एक आदमी अपने बच्चे के पालन के लिए कर सकता है, यह सिद्ध करता है, कि आपको एक औरत होना आवश्यक नहीं है एक प्रतिपालक बनने के लिए। साथ ही यह अनुशंषा करता है उस विश्वास का जो विश्वास आपकी बेटी ने आप पर दिखाया है। हमे गर्व है कि संसार का सबसे अच्छा पिता हमारे विद्यालय में पढ़ने वाली बच्ची का है, जैसा कि आपकी बिटिया ने अपने लेख में लिखा है। गंगादास हमे गर्व है कि आप एक माली हैं और सच्चे अर्थों में माली की तरह न केवल विद्यालय के बगीचे के फूलों की देखभाल करते हैं, अपितु अपने इस घर के फूल को भी सदा खुशबूदार बनाकर रखते हैं, जिसकी खुशबू से हमारा विद्यालय महक उठा है। तो क्या आप हमारे विद्यालय के इस मातृ दिवस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बनेगे?"
रो पड़ा गंगादास और दौड़ कर बिटिया की कक्षा के बाहर से आँसू भरी आँखों से निहारता रहा अपनी प्यारी बिटिया को।

मित्रो ! उच्च संवेदनाओं के बिना मनुष्य पत्थर के समान होता है। काश ! हम सब भी संवेदनशील मनुष्य बन सकें !!
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(देवधर्मी)

सोचने योग्य विषय1 दस रू किलो टमाटर  लेकर ताजा चटनी खा सकते हैं  है मगर हम डेढ़ सौ रू किलो टमाटो साॅस खाते हैं वो भी  एक ...
14/05/2020

सोचने योग्य विषय

1 दस रू किलो टमाटर लेकर ताजा चटनी खा सकते हैं है मगर हम डेढ़ सौ रू किलो टमाटो साॅस खाते हैं वो भी एक दो माह पहले बनी हुई बासी।
2 पहले हम एक दिन पुराना. घड़े का पानी नहीं पीते थे अब तीन माह पुराना बोतल का पानी बीस रू लीटर खरीद कर पी रहे हैं।
3 पचास रू लीटर का दूध हमे महंगा लगता हैं और सत्तर रू लीटर का दो महीने पहले बना हुआ कोल्ड ड्रिंक हम पी लेते हैं।
4 दो सौ रू पाव मिलने वाला शरीर को ताकत देने वाला ड्राई फ्रुट हमे महंगा लगता है मगर 400 रू का मैदे से बना पीज्जा शान से खा रहे हैं।
5 अपनी रसोई का सुबह का खाना हम शाम को खाना पसंद नहीं करते जब कि कंपनियों के छह छह माह पुराने सामान हम खा रहे हैं जबकि हम जानते है कि खाने को सुरक्षित रखने के लिए उसमें प्रिजर्वेटिव मिलाया जाता है।
6 डेढ़ माह के लाक डाऊन मे सबको समझ आ गया होगा कि बाहर के खाने के बिना भी हमारा जीवन चल सकता हैं बल्कि बेहतर चल सकता है।

02/05/2020
Pintu pathak

Pintu pathak

#मजदूर_दिवस_की_हार्दिक_शुभकामनाएं

26/04/2020

यही नहीं कि अँधेरों को दर-ब-दर कर दे।
चराग़ वो है जो आँधी को बेअसर कर दे।।

तुम्हारी ज़ुल्फ़ के हिस्से में है ये फ़न अब तक।
सहर को शाम करे, शाम को सहर कर दे।।

हयात सबको मिली है सँवारने के लिये।
ये और बात है कोई इधर-उधर कर दे।।

“तुम्हारे सन्मुख दो बातें अच्छी तरह से साफ रहनी चाहिए। एक तो यह कि हम नेचर में कोई क्रिया करके उसके फल से नहीं बच सकते। ...
26/04/2020

“तुम्हारे सन्मुख दो बातें अच्छी तरह से साफ रहनी चाहिए। एक तो यह कि हम नेचर में कोई क्रिया करके उसके फल से नहीं बच सकते। यह फल दो ही प्रकार के हो सकते हैं, शुभ कर या अशुभ कर। दूसरे यह कि यदि इस तत्व को उपलब्ध करके भी तुम्हारे दिल में शुभ के पथ पर चलने की कोई आकांक्षा न जागे तो नेचर के अपने अटल नियम के अनुसार तुम्हारा अपने लिए और औरों के लिए अहितकर बन्ना आवश्यक है।”—Devatma

The facts show the real picture of human nature 1- मंदोदरी " मेंढकी " से पैदा हुई थी !2- " श्रंगी ऋषि " " हिरनी " से पैद...
22/04/2020

The facts show the real picture of human nature

1- मंदोदरी " मेंढकी " से पैदा हुई थी !
2- " श्रंगी ऋषि " " हिरनी " से पैदा हुये थे !
3- " सीता" " मटकी" मे से पैदा हुई थी !
4- " गणेश " अपनी " माँ के मैल " से पैदा हुये थे !
5- " हनुमान " के पिता पवन " कान " से पैदा हुये थे !
6- हनुमान का पुत्र # मकरध्वज था जो # मछ्ली के मुख से पैदा हुआ था !
7- मनु सूर्य के पुत्र थे उनको छींक आने पर एक लड़का नाक से पैदा हुआ था !
8- राजा दशरथ की तीन रानियो के चार पुत्र जो फलो की खीर खाने से पैदा हुये थे
9- सूर्य कर्ण का पिता था। भला सूर्य सन्तान कैसे पैदा कर सकता है वो तो आग का गोला है !

👉🏻इन्द्र ने - गौतम ऋषि की पत्नी "अहिल्या " के साथ रेप किया !
👉🏻चन्द्रमा ने - अर्क अर्पण करती ब्रहस्पति की पत्नी "तारा " के साथ रेप किया !
👉🏻अगस्त्य ऋषि ने - सोम की पत्नी "रोहिणी " के साथ रेप किया !
👉🏻ब्रहस्पति ऋषि ने - औतथ्य की पत्नी व मरूत की पुत्री "ममता "के साथ रेप किया !
👉🏻पराशर ऋषि ने - वरुण की पुत्री "काली "के साथ रेप किया !
👉🏻विश्वामित्र ने - अप्सरा "मोहिनी" के साथ सम्भोग किया !
👉🏻वरिष्ठ ऋषि ने - "अक्षमाला " के साथ रेप किया !
👉🏻ययाति ऋषि ने - "विश्ववाची "के साथ रेप किया !
👉🏻पांडु ने - "माधुरी "के साथ रेप किया !
👉🏻राम के पूर्वज राजा दण्ड ने - शुक्राचार्य की पुत्री "अरजा "के साथ रेप किया !
👉🏻ब्रह्मा ने - अपनी बहिन गायत्री और पुत्री सरस्वती के साथ रेप किया !


Note— 💥"रावण महान " जैसे महा विद्वान शीलवान व्यक्तित्व का जिसने सीता का अपहरण तो किया पर कोई शील भंग नहीँ किया, ऐसे नारी को सम्मान देने वाले "रावण " का दहन 🔥आखिर क्यों ?💥

चार्ल्स डार्विन (वैज्ञानिक)* चार्ल्स डार्विन एक महान प्रकृतिवादी वैज्ञानिक थे* चार्ल्स डार्विन ने क्रमविकास के सिद्धांत ...
19/04/2020

चार्ल्स डार्विन (वैज्ञानिक)
* चार्ल्स डार्विन एक महान प्रकृतिवादी वैज्ञानिक थे
* चार्ल्स डार्विन ने क्रमविकास के सिद्धांत को दुनिया के सामने रखा
* चार्ल्स डार्विन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड में हुआ था
* चार्ल्स डार्विन अपने माता पिता के पांचवे संतान थे
* चार्ल्स डार्विन एक बहुत ही पढ़े-लिखे और अमीर परिवार में पैदा हुए थे
* चार्ल्स डार्विन के पिता रावर्ड डार्विन एक जाने माने डॉक्टर थे
* चार्ल्स डार्विन जब 8 वर्ष के थे तभी उनकी माता का निधन हो गया था
* चार्ल्स डार्विन को 1817 में प्रारंभिक शिक्षा के लिए एक ईसाई मिशनरी स्कूल में दाखिला किया गया
* चार्ल्स डार्विन के पिता उन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे इसलिए वह उन्हें ट्रेनिंग देते थे
* 1825 में चार्ल्स डार्विन को एडिनबर्ग की मेडिकल यूनिवर्सिटी में दाखिला करवाया गया
* चार्ल्स डार्विन को मेडिकल में कोई ज्यादा रुचि नहीं थी वह हमेशा प्रकृति का इतिहास जानने की कोशिश करते थे
* 1827 में मेडिकल के आगे पढ़ाई करने के लिए चार्ज डार्विन को क्राइस्ट कॉलेज में दाखिला कराया गया
* क्राइस्ट कॉलेज के दौरान चार्ल्स डार्विन ने प्राकृति विज्ञान को भी ज्वाइन कर लिया था
* प्रकृति विज्ञान की साधारण अंतिम परीक्षा में चार्ल्स डार्विन 178 विद्यार्थियों में से दसवें नंबर पर थे
* चार्ल्स डार्विन कॉलेज में ही थे तभी उनकी प्रोफेसर जॉन स्टीवन से अच्छी दोस्ती हो गई थी
* प्रोफ़ेसर जॉन स्टीवन के कहने पर चार्ल्स डार्विन 1831 में HMS बीगल नाम के जहाज से शोध के लिए लंबी समुद्री यात्रा पर गए
* यात्रा के दौरान चार्ल्स डार्विन एक छोटे से केबिन के आधे भाग में गुजारा करते थे
* खोज कार्य के लिए चार्ल्स डार्विन को जगह-जगह पत्ते लकड़ियां पत्थर कीड़ों और जीवो की हड्डियां एकत्रित करनी पड़ी
* यात्रा के दौरान एक बार चार्ल्स डार्विन ने अपनी बोट को किनारे से दूर जाने से बचाया जिससे जहाज के कप्तान ने खुश होकर उस जगह का नाम Darwin Sound रख दिया
* यात्रा के बाद डार्विन ने पाया कि बहुत से पौधे और जीव की प्रजातियां एक जैसी थी बस उनमें थोड़ा सा फर्क था
* डार्विन ने 20 साल अध्ययन के बाद 1858 में क्रमविकास का सिद्धांत पेश किया
* डार्विन ने ही बताया कि मनुष्य के पूर्वज पहले बंदर थे
* 19 अप्रैल 1882 को चार्ल्स डार्विन का निधन हुआ
* 26 अप्रैल को उनके अंतिम यात्रा में लाखों लोग शामिल हुए थे
* चार्ल्स डार्विन अत्याचार के घोर विरोधी थे
* चार्ल्स डार्विन की शादी उनकी चचेरी बहन ईमा से हुई जिनसे कुल 10 संताने हुई

गंगा नदी के विषय में देव-चिन्तन।हे हिमालय-पुत्री गंगे ! तुम अपना मनोहर रूप हमारे सम्मुख प्रकाशित करो तथा हमारे हृदय को अ...
13/04/2020

गंगा नदी के विषय में देव-चिन्तन।

हे हिमालय-पुत्री गंगे ! तुम अपना मनोहर रूप हमारे सम्मुख प्रकाशित करो तथा हमारे हृदय को अपनी ओर आकृष्ट करो। यदि तुम अपने पिता हिमालय के घर से निकलकर हमारे देश की भूमि में प्रवेश न करती, तो अब तक तुम्हारे द्वारा हमारे देश का जो-जो उपकार हुआ है तथा हो रहा है, वह कहाँ से होता ? हमारे वह पूर्वज जो आज से हज़ारों वर्ष पहले इस देश में निवास के लिए आये थे तथा पहले-पहल पंजाब की एक व दूसरी नदी के किनारे पर अपने बहुत से निवास-स्थान स्थापन करके आगे बढ़ रहे थे, तब सबसे बढ़-चढ़कर तुम्हीं ने उन्हें अपने प्रति आकृष्ट किया था। तुम्हीं ने उन्हें अपनी शोभा के द्वारा धीरे-धीरे सबसे बढ़कर मोहित किया था| इसलिए तुम्हारे तट पर वास करना उन्होंने अपना बहुत बड़ा सौभाग्य समझा।

हे हमारी जाति की मित्रा गंगे ! विगत सहस्त्र वर्षों के वृतान्त को छोड़कर इस वर्तमान काल में भी तुम्हारे तटस्थ नगरों के कितने बन ही नगरवासी; हाँ, शत-शत और सहस्त्र- सहस्त्र नगरवासी उषाकाल में, और कितने ही उससे भी पहले तुम्हारे जल से अपने शरीर को शुद्ध करके, तुम्हारे तट पर अपने एक व दूसरे प्रकार के विश्वास के अनुसार धर्म-साधन करते हैं। प्रात:काल का सुहावना समय और तुम्हारे एक व दूसरे घाट पर सहस्त्र-सहस्त्र नर-नारियों का स्नान के लिए एकत्र होना तथा उनमे सहस्त्र-सहस्त्र जनों का अपने-अपने विश्वास के अनुसार तुम्हारे तट पर बैठे हुए पूजन व पाठ करना कैसा सुन्दर दृश्य ! तुम्हारे तट पर एक-एक स्थान हमारी जाति के लोगों के बैठने, स्नान तथा पूजन आदि करने के लिए कैसा रमणीय स्थान !! तुम्हारे तट पर आबाद होकर हमारे देश का एक-एक नगर जो शोभा पा रहा है, वह शोभा तुम्हारे बिना उसे कहाँ से प्राप्त होती ? सहस्त्र सहस्त्र मनुष्य, चौपाये एवं पक्षी तुम्हारे जल को अपनी विविध आवश्यकताओं के लिए प्रयोग करके जो-जो सुख पाते हैं, वह सुख उन्हें कहाँ से मिलता, यदि तुम उन्हें अपने इस जल का दान करने के लिए प्रवाहित न होती ?

प्रिय गंगे ! तुम्हारे तट के एक-एक रमणीय स्थान में बैठकर नाना जन जो कुछ आराम पाते हैं, तथा विद्यार्थी-गण जो कुछ विद्या उपार्जन करते हैं, वह सब तुम्हारे बिना कहाँ से लाभ करते। उसके अतिरिक्त तुम्हारे जल से साक्षात रूप से अथवा तुमसे नहर आदि काटकर उसके जल से हमारे कृषक लोग क्या अपने तथा क्या अन्य लाखों जनों एवं अन्य जीव धारियों के लिए जो विविध प्रकार का अनाज तथा पशुओं के लिए चारा उपार्जन करते हैं, वह सब कहाँ से उपार्जन करते ? नौका आदि के द्वारा तुम्हारे तटस्थ एक व दूसरे नगरवासी जो-जो वाणिज्य आदि करते हैं तथा उसके द्वारा बहुत कुछ लाभ उठाते हैं, वह सब लाभ तुम्हारे बिना उन्हें कहाँ से मिलता ? और कितने ही लोग जो नौका में बैठकर तुम्हारे भीतर वायु सेवन करते हैं, अथवा एक स्थान से दूसरे स्थान तक यात्रा करते हैं, वह सब तथा इनके भिन्न और कई प्रकार के उपकार जो हमारे देशवासी केवल तुम्हारे द्वारा लाभ करते हैं, वह उन्हें कहाँ से प्राप्त होते | उनके भिन्न पशु जगत के लाखों छोटे तथा बड़े जीव एवं वनस्पति-जगत के लाखों पौधे तुम्हारे जल से जो कई प्रकार का उपकार पाते हैं, वह सब कहां से पाते, यदि हे गंगे ! तुम हमारे देश में वर्तमान न होती ?

हे गंगे ! तुम अपने इन नाना उपकारों के विचार से अवश्य हमारी स्तवनीय हो (अर्थात पूजनीय हो)| तुम धन्य हो ! तुम धन्य हो !! तुम्हारे इसी मनोहर रूप को देखकर अथवा अपने किसी कल्पित विश्वास से परिचालित होकर यदि हमारे लाखों देश वासियों ने तुम्हारे तट पर वास करना तथा मरना एवं अपने सम्बन्धियों की मृत-देहों को जलाना तथा उनकी भस्म व बची खुची हड्डियों को तुम्हारी गोद में सौंपना अपना सौभाग्य समझा है, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं।

प्रिय गंगे ! तुम्हारे तटस्थ स्थानों के शत-शत निवासियों को छोड़कर भारत वर्ष के प्रत्येक प्रदेश और उससे बाहर और कितने ही देशों के रहने वाले हिन्दूगण तुम्हारे साथ अपने सम्बन्ध को एक व दूसरे प्रकार से अनुभव करते हैं | यही कारण है, कि न केवल स्वदेशीय वरन् विदेशीय हिन्दू जाति के लोगों को भी तुम एक व दूसरे समय में अपने दर्शन के लिए आकृष्ट करती हो।

हे गंगे ! ऐसा हो कि हम भारत वासी होकर और अपने देश के साथ तुम्हारे गहरे सम्बन्ध को अनुभव करके तथा तुम्हारे उपकारों को सम्मुख लाकर ख़ुद भी परोपकारी बनें तथा तुम्हारे न्याईं अपने देश के मनुष्यों एवं पशुओं आदि के लिए सेवाकारी होकर अपने अस्तित्व को धन्य धन्य तथा कृतार्थ अनुभव करें।—Devatma

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Chase the Dreams which make your life meaningful.
~My humble request to all, kindly read in full. From …ALTRUISM …Secular Moral Spectrum A Student---What is the kind of atmosphere that the Dev Samaj provides? Teacher ---I give you a few facts and you can draw the conclusions for yourselves. In the first place, the Dev Samaj does not admit any man even as the lowest grade member, who has not given up eight specified gross sins about which he takes the following pledges: 1.I shall not myself take or give or cause to be given to others intoxicants, such as wine, opium, bhang, tobacco, charas, chandu, cocaine etc., except on medical grounds. 2.I shall not myself eat or give or cause to be given to others for eating, flesh or eggs or anything made therefrom. 3.I shall neither gamble nor be helpful to the others in such an act. 4.I shall neither steal anything nor help others in committing theft. 5.I shall not take bribes in performance of my legitimate duties. 6.I shall not withhold any money or any other thing entrusted to me as deposit; I shall not suppress payment of any donation promised by me towards a beneficent cause, nor withhold any debt borrowed by me from anybody, when I am able to pay or return it; I shall not suppress payment of the price of anything purchased by me. 7.I shall neither commit adultery, nor help others in doing so, nor remarry in the life time of my wife or husband. 8.I shall not knowingly kill any sentient being without a just cause for doing so, i.e. , when one is obliged to use the right of defense for himself or his relations or property etc. The freedom from these gross sins is the minimum moral life which the Dev Samaj is achieving in the lives of fit souls who come under its influence.