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07/09/2026
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11/06/2026

महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका की कथा सनातन धर्म की सबसे प्रेरणादायक और रहस्यमयी कथाओं में से एक मानी जाती है। यह कथा तप, पतिव्रता धर्म, आज्ञापालन और पुनर्जन्म की दिव्य लीलाओं से परिपूर्ण है।

महर्षि भृगु के वंश में जन्मे ऋषि जमदग्नि महान तपस्वी और वेदों के ज्ञाता थे। उनका विवाह राजा रेनु की कन्या रेणुका से हुआ। माता रेणुका इतनी महान पतिव्रता थीं कि प्रतिदिन नदी से बिना पके मिट्टी के घड़े में जल भरकर आश्रम ले आती थीं। उनका सतीत्व ही उस घड़े को टूटने नहीं देता था।

एक दिन नदी तट पर उन्होंने गंधर्वराज चित्ररथ को अपनी पत्नियों के साथ जलक्रीड़ा करते देखा। क्षणभर के लिए उनका मन उस दृश्य की ओर आकर्षित हुआ और उसी क्षण उनका योगबल क्षीण हो गया। जब वे जल लेकर लौटने में विलंब कर बैठीं, तब महर्षि जमदग्नि ने अपने तपबल से सारी घटना जान ली।

क्रोधित होकर उन्होंने अपने पुत्रों को माता का वध करने की आज्ञा दी। बड़े पुत्रों ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, परन्तु सबसे छोटे पुत्र भगवान परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए माता रेणुका का सिर धड़ से अलग कर दिया। महर्षि जमदग्नि पुत्र की आज्ञाकारिता से प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा। परशुराम ने माता रेणुका तथा अपने भाइयों को पुनर्जीवित करने का वर मांगा। महर्षि ने तपबल से सभी को पुनर्जीवन प्रदान कर दिया।

इसके पश्चात् एक और महान घटना घटी। राजा कार्तवीर्य अर्जुन ने महर्षि जमदग्नि के आश्रम की कामधेनु गाय को बलपूर्वक छीन लिया। विरोध करने पर उसके सैनिकों ने महर्षि जमदग्नि का वध कर दिया। जब भगवान परशुराम लौटे और माता रेणुका को विलाप करते देखा, तब उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे पृथ्वी को अत्याचारी क्षत्रियों से मुक्त करेंगे। इसी प्रतिज्ञा के कारण भगवान परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को अधर्मी शासकों से मुक्त किया।

माता रेणुका बाद में देवी रूप में पूजित हुईं। दक्षिण भारत में वे येल्लम्मा, रेणुकाम्बा और एकवीरा देवी के रूप में विख्यात हैं। आज भी लाखों भक्त उन्हें मातृशक्ति और करुणा की अधिष्ठात्री देवी मानकर पूजा करते हैं।

जमदग्नि-रेणुका स्तोत्र

॥ नमो जमदग्नये तुभ्यं तपोमूर्ते महायशः । भृगुवंशप्रदीपाय धर्मसंरक्षणाय च ॥१॥

॥ नमो रेणुकायै देव्या पतिव्रतपरायणायै । शक्तिरूपे जगन्मातः भक्तानां सुखदायिनि ॥२॥

॥ जमदग्नि-रेणुका देवौ परशुरामस्य कारणम् । भक्तरक्षार्थमाविर्भूतौ नमामि चरणौ शुभौ ॥३॥

॥ तपसा तेजसा चैव पावनौ लोकपूजितौ । आशीर्वादं प्रयच्छेतां सर्वसिद्धिप्रदायकौ ॥४॥

प्रार्थना

॥ ॐ जमदग्नि-रेणुकाभ्यां नमः ॥ ॥ ॐ रेणुकाम्बायै नमः ॥ ॥ ॐ भृगुवंशदीप्ताय नमः ॥

जिन घरों में श्रद्धा से महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका का स्मरण किया जाता है, वहां धर्म, तप, पारिवारिक सौहार्द और आध्यात्मिक उन्नति का वास माना जाता है। उनकी कथा हमें सिखाती है कि तप और सत्य का प्रकाश युगों तक संसार को दिशा देता रहता है।

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