Art of भक्ति सागर

Art of भक्ति सागर ''जय श्री नारायण हरि''

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव।
पितु मात स्वामी सखा हमारे-2 हे नाथ नारायण वासुदेव-2।।

बुध शुद्ध तिथि अष्टमी प्यारी।
भाद्र मॉस वर्षा अति भारी।।
बन्दी गृह में अर्ध निशा में (प्रगट हुए सर्वानंदकारी)-2
सुर नर मुनि सब हुए सुखारे।
पितु मात स्वामी सखा हमारे . हे नाथ नारायण वासुदेव
श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव।

चंद्र वंश का चंद्र सुहाना, कृष्ण जगत गुरु जग ने म

ाना।
अत्याचारी कंस के घर में (इक पल रुकना उचित न जाना)-2।।
त्याग के मथुरा गोकुल पधारे।
पितु मात स्वामी सखा हमारे हे नाथ नारायण वासुदेव

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव।
पितु मात स्वामी सखा हमारे-2 हे नाथ नारायण वासुदेव-2।।
राधे कृष्णा राधे कृष्णा राधे राधे कृष्णा कृष्णा -3
राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरी बोल हरी बोल हरी हरी...

🦚🐦🦜🦆🛖🦆🦜🐦🦚🕉️प्रभु🧔‍♀️श्रीरामजी द्वारा देवी अहिल्‍या👰‍♀️का उद्धार✨ब्रह्माजी की मानसपुत्री थी जिसका नाम अहिल्‍या था। ब्रह्म...
10/11/2024

🦚🐦🦜🦆🛖🦆🦜🐦🦚
🕉️प्रभु🧔‍♀️श्रीरामजी द्वारा देवी अहिल्‍या👰‍♀️का उद्धार✨
ब्रह्माजी की मानसपुत्री थी जिसका नाम अहिल्‍या था। ब्रह्माजी ने अहिल्‍या को सबसे सुंदर स्‍त्री बनाया था। सभी देवता उनसे विवाह करना चाहते थे। अहिल्‍या से विवाह करने के लिए ब्रह्माजी ने एक शर्त रखी । जो सबसे पहले त्रिलोक का भ्रमण कर आएगा वही अहिल्‍या का वरण करेगा, ऐसे उन्‍होंने कहां।

देवराज इंद्र अपनी सभी शक्‍ति के द्वारा सबसे पहले त्रिलोक का भ्रमण कर आए। परंतु तभी देवर्षि नारद ने ब्रह्माजी को बताया की ऋषि गौतमने इंद्र से पहले त्रिलोक का भ्रमण किया है। नारदजी ने ब्रह्माजी को बताया, ‘‘हे ब्रह्मदेव, ऋषि गौतमने अपने दैनिक पूजा क्रम में गौमाता की परिक्रमा की है। उस समय गौमाता बछडे को जन्‍म दे रही थी। वेदों के अनुसार इस अवस्‍था में गाय की परिक्रमा करना त्रिलोक परिक्रमा समान होता है।’’ देवर्षि नारदजी की यह बात योग्‍य थी। इसलिए ब्रह्माजीने इंद्र को छोड़ देवी अहिल्‍या का विवाह अत्रि ऋषि के पुत्र ऋषि गौतम से कराया। परंतु इंद्र के मन मे देवी अहिल्‍या को पाने की इच्‍छा वैसीही थी।

एक दिन गौतम ऋषि आश्रम के बाहर गए थे। उनकी अनुपस्‍थिति में इन्‍द्र ने गौतम ऋषि के वेश धारण किया और उन्‍होंने अहिल्‍या से प्रणय याचना की। इस समय देवी अहिल्‍याने गौतम ऋषि के वेश में आए इन्‍द्र को पहचान लिया था। इसलिए अहिल्‍याने मना कर दिया। इन्‍द्र अपने लोक लौट रहे थे, तभी ऋषि गौतम भी अपने आश्रम वापस आ रहे थे। इस समय गौतम ऋषि की दृष्‍टि इन्‍द्र पर पड़ी। जिसने उन्‍हीं का वेश धारण किया हुआ था। यह देख गौतम ऋषि क्रोधित हुए और उन्‍होंने इन्‍द्र को शाप दे दिया। इसके बाद उन्‍होंने अपनी पत्नी को भी शाप दिया। ऋषिने कहां, ‘‘तुम सहस्रों वर्षों तक केवल हवा पीकर कष्‍ट उठाती हुई यहां राख में पड़ी रहोगी। जब प्रभु श्रीराम इस वन में प्रवेश करेंगे तभी उनकी कृपा से तुम्‍हारा उद्धार होगा।

उनके चरणों का स्‍पर्श होने पर ही तुम अपना पूर्व शरीर धारण करके मेरे पास आ सकोगी।’’ यह कह कर गौतम ऋषि आश्रम को छोड़कर हिमालय पर्वत पर तपस्‍या करने के लिए गए।

गौतम ऋषि के शाप के कारण देवी अहिल्‍या पत्‍थर की शिला बन गई। सहस्रों वर्ष बीतने के बाद प्रभु श्रीरामजी का जन्‍म हुआ। युवा अवस्‍था में महर्षि विश्‍वामित्र की आज्ञा से प्रभु श्रीरामजी और लक्ष्मणने ताडका राक्षसी का वध किया। ताड़का वध के बाद वे यज्ञ के लिए आगे बढ रहे थे। तब प्रभु की दृष्‍टी उस विरान कुटिया पर पडी और वे वहां रुक गए। उन्‍होंने महर्षि विश्‍वामित्र से पूछा, ‘‘हे गुरुवर ! यह कुटिया किसकी है ?

ऐसा लगता है की कोई युगों से यहां पर आया नही है। कोई पशु पक्षी भी यहां दिखाई नहीं पड़ता। । इस जगह का रहस्‍य क्‍या है ?

तब महर्षि विश्‍वामित्र कहते हैं, ‘‘हे राम, यह कुटिया तुम्‍हारी ही प्रतीक्षा कर रही हैं। यहां बनी वह शिला तुम्‍हारे चरणों की धूल के लिए युगों से तुम्‍हारी प्रतीक्षा कर रही हैं।’’ श्रीरामजी पूछते है, ‘‘कौन है यह शिला ? और मेरी प्रतीक्षा क्‍यों कर रही है। महर्षि विश्‍वामित्र श्रीरामजी और लक्ष्मण को देवी अहिल्‍या के जीवन की पूरी कथा सुनाते हैं।

कथा सुनने के बाद प्रभु श्रीरामजी अपने चरणों से शिला को स्‍पर्श करते हैं। देखते ही देखते वह शिला एक सुंदर स्‍त्री में बदल जाती है और प्रभु श्रीरामजी को वंदन करती है। देवी अहिल्‍या श्रीरामजी से निवेदन करती है, ‘‘प्रभु आपके चरणस्‍पर्श से पावन होकर मेरा उद्धार हुआ है, इसके लिए आपके चरणों में वंदन करती हूं। प्रभु मै चाहती हूं की मेरे स्‍वामी ऋषि गौतम मुझे क्षमा करें और पुनः अपने जीवन में मुझे स्‍थान दे।’’ प्रभु श्रीराम अहिल्‍या से कहते है, ‘‘देवी, जो हुआ उसमें आपकी लेशमात्र भी गलती नही थी और ऋषि गौतम भी अब आपसे क्रोधित नही है; अपितु वो भी आपसे विरह होने के कारण दुःखी है।’’ देवी अहिल्‍या पुन: प्रभु श्रीरामजी को प्रणाम करती है। अहिल्‍या अपने स्‍वरूप में वापस आते ही कुटिया में बहार आ जाती हैं और पुनः पंछी चहचहाने लगते है।
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🤎🌸🤎🌸🤎🌸🤎🌸🤎🫅🏻भरत का💞बंधुप्रेम🫅और👣पादसेवन भक्ति🕉️आज हम भरत की प्रभु श्रीराम के प्रति भक्ति और बंधुप्रेम की यह कथा सुनेंगे।प...
10/11/2024

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🫅🏻भरत का💞बंधुप्रेम🫅और👣पादसेवन भक्ति🕉️
आज हम भरत की प्रभु श्रीराम के प्रति भक्ति और बंधुप्रेम की यह कथा सुनेंगे।

प्रभु श्रीरामजी ने अपने पिता राजा दशरथ की आज्ञा के अनुसार वनवास प्रस्थान किया। जब प्रभु श्रीराम वनवास जा रहे थे, तब उनके छोटे भाई भरत अयोध्या में नहीं थे। भरत अपने ननिहाल मामा के घर गए हुए थे। प्रभु श्रीराम के वन में जाते ही दुःख से राजा दशरथ की मृत्यु हो गई। तब भरत को अयोध्या में लाने के लिए दूत भेजा गया। जब भरत अयोध्या लौटे, तब उन्हें पता चला कि उनकी माता कैकयी ने उन्हें सिंहासन पर बिठाने हेतु बंधु श्रीराम को १४ वर्ष का वनवास दिया है, तब उन्हें बहुत दुख हुआ। अपने बड़े भाई श्रीराम को वापस लाने हेतु वे वन में गए।

उस समय प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता चित्रकूट पर्वत पर रह रहे थे। वहां पहुंचते ही भरत श्रीराम की कुटिया में पहुंचे। वहां उन्हें प्रभु राम वनवासी के वेश में बैठे हुए दिखाई दिए। भरत दौडते हुए श्रीरामजी के चरणों पर गिर पड़े।

भरत अपने बडे भ्राता से बोले, ‘‘मैं आपकी शरण मे आया हूं। आप मुझे क्षमा करें। आप अपना अयोध्या का राज्य संभालकर मेरा उद्धार करें। सारे मंत्रीगण, तीनों माताएं और गुरु वसिष्ठ ये सभी यही प्रार्थना लेकर आपके पास आए हैं। मैं आपका छोटा भाई आपके पुत्रसमान हूं। अयोध्या पर राज्य करने का सामर्थ्य केवल आप ही में है। आपका स्थान अन्य कोई नहीं ले सकता। इसलिए आप अयोध्या लौट चलिए।’’ यह कहने के बाद भरत प्रभु श्रीराम से गले मिलकर रोने लगे। वे श्रीरामजी को बार-बार अयोध्या आने के लिए प्रार्थना पूर्वक आग्रह करने लगे।

तब प्रभु श्रीरामजी ने उन्हें बताया, ‘‘भरत, मैंने पिताजी को १४ (चौदह) वर्ष का वनवास पूर्ण करने के बाद ही अयोध्या लौटने का वचन दिया है। मैं अभी नहीं आ सकता।’’

वचन की बात सुनकर भरत ने सत्य को स्वीकार किया। उन्होंने श्रीरामजी से कहा, ‘‘बंधु, अयोध्या का राज्य चलाने का अधिकार केवल आपका है। आपके वनवास के १४ वर्ष की अवधि तक ही मैं कार्यभार चलाऊंगा, परंतु आपकी चरणपादुकाएं सिंहासन पर रखकर ! कृपया आप अपनी चरण पादुकाएं मुझे दीजिए। आप ही को राजा मानकर आपके प्रतिनिधि के रूप में १४ वर्ष राजकार्य चलाऊंगा। जब १४ वर्ष पूर्ण होंगे, तब आपको पुनः अयोध्या आना ही पड़ेगा, अन्यथा मैं अपने प्राण त्याग दूंगा।’’

इतना कहकर भरत ने प्रभु श्रीरामजी की चरणपादुकाएं अपने मस्तक पर धारण की और वे अयोध्या लौट आए। उसके पश्चात भरत सेवक के रूप मे राज्यकारभार देखने लगे।

भरत को प्रभु श्रीरामजी के सामने राजवभैव, राजा का पद, राज्यकारभार चलाने का अवसर इन सभी में कोई रुचि नहीं थी। उन्होंने अपने बड़े भाई श्रीरामजी के सामने स्वयं राजा बनना भी तुच्छ माना। १४ वर्ष के बाद जब प्रभु श्रीरामजी पुन: अयोध्या आए, तब भरत ने उन्हें राजपाट सौंप दिया। यह होता है आदर्श बंधुप्रेम !

आदर्श भाई कैसा होना चाहिए, इसका भी यह उत्कृष्ट उदाहरण है। साथ ही भगवान के चरणों के प्रति हमारा भाव कैसे होना चाहिए यह भी हमें इस कहानी से सीखने को मिलता है न ?
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🌸🌺🌸🌺🌸🌺🌸🌺🌸💐करुणामयी, कृष्णमयी, त्यागमयी श्रीराधा👸🙏श्रीकृष्ण की आत्मा श्रीराधा का चरित्र अथाह समुद्र के समान है जिसकी गहरा...
09/11/2024

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💐करुणामयी, कृष्णमयी, त्यागमयी श्रीराधा👸🙏
श्रीकृष्ण की आत्मा श्रीराधा का चरित्र अथाह समुद्र के समान है जिसकी गहराई को नापना असंभव है; अर्थात् श्रीराधा-चरित्र के विभिन्न पहलुओं का पूर्णत: वर्णन करना असम्भव है। फिर भी पाठकों की सुविधा के लिए उस समुद्र में डुबकी लगा कर कुछ मोती ढूंढ़ ही लेते हैं।

गोलोक में महारास में रसराज श्रीकृष्ण एकाकी रमण नहीं कर सकते थे, अत: उन्होंने दूसरे की अभिलाषा की। तब दूसरे के अभाव में अपने को ही राधा स्वरूप में प्रकट कर रमण किया। अर्थात उस गोपाल-तत्व से दो ज्योति प्रकट हुईं, एक गौर-तेज तथा दूसरा श्याम-तेज। भगवान श्रीकृष्ण राधा-माधव रूप से दो प्रकार के रूपधारी हुए। इसीलिए गौर-तेज (श्रीराधा) के बिना श्याम-तेज (श्रीकृष्ण) की उपासना करने से मनुष्य पाप का भागी होता है।

👸श्रीराधा के चरित्र के विभिन्न पहलू✨
श्रीकृष्ण की आत्मा श्रीराधा का चरित्र अथाह समुद्र के समान है जिसकी गहराई को नापना असंभव है; अर्थात् श्रीराधा-चरित्र के विभिन्न पहलुओं का पूर्णत: वर्णन करना असम्भव है। फिर भी पाठकों की सुविधा के लिए उस समुद्र में डुबकी लगा कर कुछ मोती ढूंढ़ ही लेते हैं —

🫅श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति✨श्रीराधा👸
चैतन्य-चरितामृत के अनुसार श्रीराधा भगवान की आह्लादिनी शक्ति हैं; जिनके स्वरूप, सौंदर्य, सारस्य आदि से श्रीकृष्ण आह्लादित होते हैं और उस सुख का आस्वाद वे स्वयं भी करती हैं। श्रीकृष्ण को आह्लादित करके वे स्वयं आह्लादित होती हैं।

राधारानी देतीं प्रिय को पल-पल नया-नया आनन्द।
उस आनन्द से शत-शतगुण आनन्द प्राप्त करतीं स्वच्छंद।। (पद रत्नाकर)

श्रीराधा सभी शक्तियों से श्रेष्ठ महाशक्ति हैं और महाभावरूपा हैं। इस आह्लादिनी शक्ति की लाखों अनुगामिनी शक्तियां मूर्तिमान होकर हर क्षण सखी, मंजरी, सहचरी और दूती आदि रूपों से श्रीराधाकृष्ण की सेवा किया करती हैं। श्रीराधाकृष्ण को सुख पहुंचाना और उन्हें प्रसन्न करना ही इनका कार्य है। इन्हीं को ‘गोपीजन’ कहते हैं।

👸करुणामयी श्रीराधा✨
एक बार समस्त अवगुणों ने गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण के पास जाकर प्रार्थना की कि–’हे भगवन् ! हम सभी सद्गुणों से तिरस्कृत होकर इधर-उधर मारे-मारे फिरते हैं, कहीं भी हमारे रहने की जगह नहीं है। हम भी तो आपकी सृष्टि में आप से ही उत्पन्न हुए हैं, अत: हमें भी रहने के लिए कोई स्थान दीजिए।’

जब अवगुणों ने ऐसी प्रार्थना की तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें श्रीराधा की शरण ग्रहण करने को कहा। यह सुनकर अवगुणों ने श्रीराधा की शरण में जाकर प्रार्थना की। तब परम करुणामयी श्रीराधा ने कहा–’तुमने हमारी शरण ग्रहण की है। तुम्हारे बैठने के लिए कोई स्थान नहीं है तो आओ, हमारे अंगों में तुम्हें जहां-जहां अच्छा लगे, वहीं बैठ जाओ।’

करुणामयी श्रीराधा की यह बात सुनकर ‘घोर अंधकार’ रूपी दोष ने श्रीकिशोरीजी के केशों का आश्रय लिया, ‘कुटिलता’ ने उनकी भौंहों का, ‘राग’ ने होठों का, ‘भोलापन’ ने मुखारविन्द का, ‘चंचलता’ ने नेत्रों का, ‘कठिनता’ ने स्तनों का, ‘क्षीणता’ ने कटिप्रदेश का, ‘मन्दता’ (धीमी गति) ने श्रीराधाजी के चरणारविन्दों का आश्रय ग्रहण कर लिया।

इस प्रसंग का भाव यह है कि जिन-जिन अवगुणों ने श्रीराधाजी के श्रीअंगों में स्थान ग्रहण किया, उन-उन अंगों की उनसे और भी अधिक शोभा बढ़ गयी और वे अवगुण सद्गुणों में परिवर्तित हो गये।

👸कृष्णमयी श्रीराधा✨
श्रीराधा स्वयं कृष्णमय हैं। उनके अंग-अंग एवं अन्तर्मन में भी श्रीकृष्ण का निवास है । श्रीराधा-कृष्ण परस्पर इतने और ऐसे ओत-प्रोत हैं कि कभी भी एक-दूसरे से पृथक् नहीं हो सकते। जैसे हाथ में दर्पण लेकर कोई व्यक्ति उसमें अपना मुख देखता है तो दर्पण में अपने नेत्र भी दिखाई देते हैं और उन नेत्रों में हाथ में दर्पण लिए वह व्यक्ति भी दिखायी देता है, ठीक उसी प्रकार श्रीकृष्ण के श्रीअंग में श्रीराधा की झलक बनी रहती है तथा श्रीराधा के कमनीय कलेवर में श्रीकृष्ण की छवि समायी रहती है।

इस सम्बन्ध में एक कथा है–एक बार सूर्यग्रहण के अवसर पर समस्त व्रजवासी– नन्द, यशोदा, श्रीराधा एवं गोपियां कुरुक्षेत्र में स्नान के लिए गए। इधर द्वारकाधाम से श्रीकृष्ण भी अपनी समस्त पटरानियों व द्वारकावासियों के साथ कुरुक्षेत्र पहुंचे। रुक्मिणीजी को श्रीराधा के दर्शनों की सदा इच्छा रहती थी। रुक्मिणीजी आदि पटरानियों ने श्रीराधा का खूब आतिथ्य - सत्कार किया। रुक्मिणीजी श्रीराधा को रात्रि विश्राम के समय स्वयं अपने हाथों से सोने के कटोरे में मिश्री मिलाया हुआ गरम दूध पिलाया करती थीं।

एक दिन विश्राम करते समय जब रुक्मिणी जी श्रीकृष्ण के चरण दबा रहीं थीं तो उन्हें श्रीकृष्ण के चरणों में छाले दिखे। वे आश्चर्य में पड़ गयीं और श्रीकृष्ण से छाले पड़ने का कारण बताने का अनुरोध करने लगीं।

तब श्रीकृष्ण ने कहा–’श्रीराधा के हृदयकमल में मेरे चरणारविन्द सदा विराजमान रहते हैं; उनके प्रेमपाश में बंधकर वह निरन्तर वहीं रहते हैं। वे एक क्षण के लिए भी अलग नहीं होते।

रुक्मिणीजी ! आज आपने उन्हें कुछ अधिक गर्म दूध पिला दिया वह दूध मेरे चरणों पर पड़ा जिससे मेरे चरणों में ये फफोले पड़ गए।’

श्रीराधा की अनन्य कृष्णभक्ति से प्रभावित होकर श्रीरुक्मिणी आदि समस्त पटरानियां आपस में कहने लगीं–’श्रीराधा की श्रीकृष्ण में प्रीति बहुत ही उच्चकोटि की है। उनकी समानता करने वाली भूतल पर कोई स्त्री नहीं है।’

इस प्रकार श्रीराधा के हृदय में कृष्ण और कृष्ण के हृदय में श्रीराधा का निवास है। श्रीराधा कहती हैं—‘कृष्ण विरह में यदि मेरा तन पंचतत्त्वों में विलीन हो जाय तो मेरी इच्छा यह है कि मेरे शरीर का जल-तत्त्व वृन्दावन के तालाब-वाबली में विलीन हो जाए, मेरा अग्नि-तत्त्व उस दर्पण के प्रकाश में मिल जाए जिसमें मेरे प्रियतम अपना स्वरूप निहारते हों। पृथ्वी-तत्व उस मार्ग में मिल जाए, जिस मार्ग से मेरे प्राणाधार आते-जाते हों; नन्दनन्दन के आंगन में मेरा आकाश-तत्त्व समा जाय तथा तमाल के वृक्षों की वायु में मेरा वायु-तत्त्व विलीन हो जाए। मैं विधाता से बार-बार प्रार्थना कर यही वर मांगती हूं।’

👸मोक्षदायिनी श्रीराधा✨
ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार भक्त पुरुष ‘रा’ शब्द के उच्चारणमात्र से परम दुर्लभ मुक्ति को पा लेता है और ‘धा’ शब्द के उच्चारण से वह श्रीहरि के चरणों में दौड़कर पहुंच जाता है। ‘रा’ का अर्थ है ‘पाना’ और ‘धा’ का अर्थ है ‘निर्वाण’ (मोक्ष)। भक्तों को ये निर्वाण मुक्ति प्रदान करती हैं। अत: इनका मात्र नाम-जप ही भवबाधा से पार लगा देता है। श्रीकृष्ण की प्राप्ति और मोक्ष की उपलब्धि दोनों ही श्रीराधा की कृपा दृष्टि पर निर्भर हैं। कवि बिहारी के शब्दों में–

मेरी भवबाधा हरौ राधा नागरि सोइ।
जातन की झांईं परै स्याम हरित दुति होय।।

श्रीराधा के दिव्य शरीर की कान्ति पड़ने से इन्द्रनीलमणि के समान वर्ण वाले श्रीकृष्ण का शरीर भी गौर जान पड़ता है।

👸तत्सुख सुखिया श्रीराधा✨
श्रीराधा की मदीया भक्ति थी। इस मदीया भक्ति में भक्त का सब कुछ भगवान ही बन जाते हैं। स्वयं का रूप, स्वरूप, आकांक्षाएं, इच्छाएं सब आराध्य को समर्पित हो जाती हैं। अपना सुख कोई सुख नहीं, प्रियतम का सुख ही अपना सुख है।

प्रियतम श्रीकृष्ण को यदि मथुरा में रहना प्रिय लगता हो, तो वे वहीं रहें। वृन्दावन कभी न आवें। मैं सारे कष्ट वेदना सहन कर लूंगी; मेरा सुख उनके सुख में विलीन है। यदि वे वहां प्रसन्न हैं तो यह वेदना भी सुखदायी बन जाएगी—यह था श्रीराधा का ‘तत्सुखे सुखित्वं’ भाव। इस भाव से सम्बन्धित एक कथा है–

श्रीराधा अपने अंत:पुर में पालित शुकों (तोतों) से श्रीकृष्ण का नाम उच्चारित करवाती थीं और स्वयं भी श्रीकृष्ण नाम-जप करती थीं। कुछ दिनों के बाद श्रीराधा ने कृष्ण के नाम के स्थान पर अपना नाम ‘बोलो राधे-राधे’ कहलवाना शुरु कर दिया। सभी सखियों को बहुत आश्चर्य हुआ;

लेकिन श्रीराधा निरन्तर शुकों से श्रीराधे-राधे कहलवाती रहीं। जब उनकी सखियों ने बार- बार ऐसा कहलवाने का कारण पूछा तो श्रीराधा ने बताया कि श्रीकृष्ण के नामोच्चारण से मुझे आत्मिक आनन्द मिलता था किन्तु श्रीराधे नाम से मेरे प्रियतम श्रीकृष्ण को आनन्द आता है, अत: जिसमें श्रीकृष्ण का सुख निहित हो, वही मुझे प्रिय है। इस प्रकार श्रीराधा का तत्सुखसुखिया भाव अनन्य था।

👸रासेश्वरी श्रीराधा✨
श्रीराधा रास की अधिष्ठात्री देवी हैं; इसलिए ‘रासेश्वरी’ कहलाती हैं। रासमण्डल के मध्य भाग में उनका स्थान है। ये गोपीवेष में विराजती हैं। समग्र सौन्दर्य, ऐश्वर्य, माधुर्य, लावण्य, तेज, कान्ति, श्रीवैभव, और परमानन्द श्रीराधा में प्रतिष्ठित है।

महारास में भी श्रीराधा की आज्ञा पाकर ही भगवान श्रीकृष्ण उनके साथ रासमण्डल में पधारते हैं। महारास के राजभोग में प्रसाद पाते समय भी भगवान अपने करकमल से प्रथम ग्रास श्रीराधा के मुखारविन्द में अर्पण करते हैं तथा पान का बीड़ा भी प्रथम श्रीराधा को अर्पण करके ही आप अरोगते हैं। इस प्रकार ब्रह्मा आदि के भी सेवनीय श्रीकृष्ण स्वयं ही उनकी सेवा करते हैं।

👸त्यागमयी श्रीराधा✨
श्रीराधा इतनी त्यागमयी हैं, इतनी मधुर-स्वभावा हैं कि अनन्त गुणों की खान होकर भी अपने को प्रियतम श्रीकृष्ण की अपेक्षा से सदा सर्वसद्गुणहीन अनुभव करती हैं, पूर्ण प्रेमप्रतिमा होने पर भी अपने में प्रेम का अभाव देखती हैं; समस्त सौन्दर्य की मूर्ति होने पर भी अपने को सौन्दर्यरहित मानती हैं। वे अपने को सर्वदा हीन-मलिन ही मानतीं है। वे अपनी एक अन्तरंग सखी से कहती हैं–

सखी री ! हौं अवगुण की खान।
तन गोरी, मन कारी, भारी पातक-पूरन प्रान।।
नहीं त्याग रंचकहू मन में, भर्यौ अमित अभिमान।
नहीं प्रेम कौ लेस, रहत नित निज सुख कौ ही ध्यान।।

श्रीराधा के गुण-सौन्दर्य से मुग्ध होकर श्याम- सुन्दर कभी यदि श्रीराधा की तनिक-सी प्रशंसा करने लगते हैं तो वे अत्यन्त संकोच में पड़कर लज्जा के मारे गड़-सी जातीं हैं। एक दिन श्रीराधाजी एकान्त में किसी महान भाव में निमग्न बैठी थीं। तभी उनकी एक सखी ने उनसे प्रियतम श्रीकृष्ण और उनका प्रेम प्राप्त करने का साधन पूछा। बस, श्रीकृष्णप्रेम के साधन का नाम सुनते ही श्रीराधाजी के नेत्रों से आँसुओं की धारा बह चली। वे बोली–’अरी सखी ! मैं क्या साधन बताऊँ। मेरे तन, मन, प्राण, धन, जन, कुल, शील, मान, अभिमान–सभी कुछ एकमात्र श्यामसुन्दर हैं। इस राधा के पास अश्रुजल को छोड़कर और कोई धन है ही नहीं जिसके बदले में श्रीकृष्ण को प्राप्त किया जाए। अत: परम सार का सार है कि श्रीकृष्ण प्रेम का मूल्य केवल पवित्र आंसुओं की धारा ही है।’ यह है श्रीराधा का भक्तों के लिए श्रीकृष्ण-प्रेम पाने का उपाय।

यही कारण है कि जहां श्रीराधा हैं वहीं श्रीकृष्ण हैं और जहां श्रीकृष्ण हैं वहीं श्रीराधा हैं। श्रीराधा की महिमा दिखाते हुए एक कवि ने लिखा है–’राधा’ शब्द में यदि ‘र’ न होता तो क्या होता–

राधे कै रकार जो न होती राधेश्याम माहि।
मेरे जान राधेश्याम आधेश्याम रहते।।

श्रीराधा के श्रीकृष्ण - प्रेम को समझना साधारण मनुष्य के लिए संभव नहीं। बस यही कहा जा सकता है कि श्रीराधा जगज्जननी महाशक्ति एवं महामाया हैं।
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🌼🌺🐄🐄🐂🐂🌺🌼🌹गोपाष्टमी की कथा🌹🐄🐂गोपाष्टमी की हार्दिक बधाई हो सभी मित्रों को🙏कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी के र...
09/11/2024

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🌹गोपाष्टमी की कथा🌹
🐄🐂गोपाष्टमी की हार्दिक बधाई हो सभी मित्रों को🙏
कार्तिक शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि को गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने गौ-चारण लीला आरम्भ की थी।
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🌹गोपाष्टमी पूजन विधि🌹
इस दिन बछड़े सहित गाय का पूजन करने का विधान है। इस दिन प्रातः काल उठ कर नित्य कर्म से निवृत हो कर स्नान करते है, प्रातः काल ही गौओं और उनके बछड़ों को भी स्नान कराया जाता है। गौ माता के अंगों में मेहंदी, रोली हल्दी आदि के थापे लगाए जाते हैं, गायों को सजाया जाता है, प्रातः काल ही धूप, दीप, पुष्प, अक्षत, रोली, गुड, जलेबी, वस्त्र और जल से गौ माता की पूजा की जाती है और आरती उतरी जाती है। पूजन के बाद गौ ग्रास निकाला जाता है, गौ माता की परिक्रमा की जाती है, परिक्रमा के बाद गौओं के साथ कुछ दूर तक चला जाता है।
🐄🐂🐄🐂🐄🐂🐄🐂
🌹श्री कृष्ण की गौ-चारण लीला🐄🐂🐄🐂🐄🐂
भगवान् ने जब छठे वर्ष की आयु में प्रवेश किया तब एक दिन भगवान् माता यशोदा से बोले – मैय्या अब हम बड़े हो गए हैं....
🐄🐂🐄🐂🐄🐂🐄🐂
मैय्या यशोदा बोली – अच्छा लल्ला अब तुम बड़े हो गए हो तो बताओ अब क्या करें...
🐄🐂🐄🐂🐄🐂🐄🐂
भगवान् ने कहा – अब हम बछड़े चराने नहीं जाएंगे, अब हम गाय चराएंगे...
🐄🐂🐄🐂🐄🐂🐄🐂
मैय्या ने कहा – ठीक है बाबा से पूछ लेना” मैय्या के इतना कहते ही झट से भगवान् नन्द बाबा से पूछने पहुंच गए...
🐄🐂🐄🐂🐄🐂🐄🐂
बाबा ने कहा – लाला अभी तुम बहुत छोटे हो अभी तुम बछड़े ही चराओ.. . .
🐄🐂🐄🐂🐄🐂🐄🐂
भगवान् ने कहा – बाबा अब मैं बछड़े नहीं गाय ही चराऊंगा ...
🐄🐂🐄🐂🐄🐂🐄🐂
जब भगवान नहीं माने तब बाबा बोले- ठीक है लाल तुम पंडित जी को बुला लाओ- वह गौ चारण का मुहूर्त देख कर बता देंगे...
🐄🐂🐄🐂🐄🐂🐄🐂
बाबा की बात सुनकर भगवान् झट से पंडित जी के पास पहुंचे और बोले –पंडित जी, आपको बाबा ने बुलाया है, गौ चारण का मुहूर्त देखना है, आप आज ही का मुहूर्त बता देना मैं आपको बहुत सारा माखन दुंगा...
🐄🐂🐄🐂🐄🐂🐄🐂
पंडित जी नन्द बाबा के पास पहुंचे और बार-बार पंचांग देख कर गणना करने लगे तब नन्द बाबा ने पूछा, पंडित जी के बात है ?
🐄🐂🐄🐂🐄🐂🐄🐂
आप बार-बार क्या गिन रहे हैं?
🐄🐂🐄🐂🐄🐂🐄🐂
पंडित जी बोले, क्या बताएं नन्दबाबा जी केवल आज का ही मुहूर्त निकल रहा है, इसके बाद तो एक वर्ष तक कोई मुहूर्त नहीं है.. पंडित जी की बात सुन कर नंदबाबा ने भगवान् को गौ चारण की स्वीकृति दे दी।
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भगवान जो समय कोई कार्य करें वही शुभ-मुहूर्त बन जाता है।
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उसी दिन भगवान ने गौ चारण आरम्भ किया और वह शुभ तिथि थी कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष अष्टमी, भगवान के गौ-चारण आरम्भ करने के कारण यह तिथि गोपाष्टमी कहलाई।
🐄🐂🐄🐂🐄🐂🐄🐂
माता यशोदा ने अपने लल्ला के श्रृंगार किया और जैसे ही पैरो में जूतियां पहनाने लगी तो लल्ला ने मना कर दिया और बोले मैय्या यदि मेरी गौएं जूतियां नहीं पहनती तो में कैसे पहन सकता हूं। यदि पहना सकती हो तो उन सभी को भी जूतियां पहना दो... और भगवान जब तक वृन्दावन में रहे, भगवान ने कभी पैरों में जूतियां नहीं पहनी।
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आगे-आगे गाय और उनके पीछे बांसुरी बजाते भगवान उनके पीछे बलराम और श्री कृष्ण के यश का गान करते हुए ग्वाल-गोपाल इस प्रकार से विहार करते हुए भगवान् ने उस वन में प्रवेश किया तब से भगवान् की गौ-चारण लीला का आरम्भ हुआ।
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जब भगवान् गौएं चराते हुए वृन्दावन जाते तब उनके चरणों से वृन्दावन की भूमि अत्यन्त पावन हो जाती, वह वन गौओं के लिए हरी-भरी घास से युक्त एवं रंग-बिरंगे पुष्पों की खान बन गया था।
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💚🌿💚🌿💚🌿💚🌿💚🌺जय श्रीराम🌺प्रभु श्रीराम की बहन शांता और ऋष्यश्रृंग आप सभी को ज्ञात होगा कि श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न ...
08/11/2024

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🌺जय श्रीराम🌺
प्रभु श्रीराम की बहन शांता और ऋष्यश्रृंग
आप सभी को ज्ञात होगा कि श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न राजा दशरथ के पुत्र थे। इनके साथ ही राजा दशरथ और रानी कौशल्या की शांता नाम की एक कन्या भी थी। शांता उनकी पहली संतान थी। अर्थात वह प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न इनकी बहन थी। शांति और सद्भाव का प्रतीक थी।

रानी कौशल्या की एक बडी बहन थी, उनका नाम वर्शिनी था। शांता को रानी वर्शिनी और उनके पति अंगदेश के राजा रोमपाद इन्होंने गोद लिया था।

एक दिन राजा रोमपाद अपनी कन्या शांता के साथ बातचीत करने में व्यस्त थे। उस समय एक ब्राह्मण वर्षा के दिनों में खेती के लिए सहायता मांगने राजा के पास आया। रोमपाद ने ब्राह्मण की दुर्दशा पर ध्यान नहीं दिया। इससे ब्राह्मण नाराज हो गया और उसने राज्य छोड दिया। वह ब्राह्मण देवराज इंद्र का भक्त था। देवराज इंद्र अपने भक्त का अपमान सहन नहीं कर पाए। इसका दंड देने के लिए वर्षाऋतु में अत्यंत कम वर्षा हुई। जिसके कारण राज्य में सूखा पड़ा।

राजा दशरथ चाहते थे कि उनको एक बेटा हो, जो उनके राज्य को संभाले और अपने वंश को समृद्ध बनाए। उन्हें एक सद्गृहस्थ ने बताया कि दोनों राज्यों पर आए इस संकट को केवल किसी ब्राह्मण की शक्तियों से ही समाप्त किया जा सकता है। उस ब्राह्मण ने नियमों का पूर्ण शुद्धता के साथ पालन करना आवश्यक है। ऐसा एकमात्र व्यक्ति पृथ्वीपर जो थे, उनका नाम था ऋष्यश्रृंग।

विभांडक ऋषिने ऋष्यश्रृंग का पालन किया था। दोनो राज्यों के हित के लिए ऋष्यश्रृंग को लाना और यज्ञ के लिए मनाना आवश्यक था।

विभांडक ऋषि की शक्ति अधिक थी और वे बहुत क्रोधी थे। ऋष्यश्रुंग को लाने से पहले ऋषि विभांडक को मनाना आवश्यक था । इस कार्य को कौन पूरा करेगा ?,

यह प्रश्न था। इस समय यह कार्य पूर्ण करने के लिए शांता सामने आई। वह ऋष्यश्रृंग को मनाने के लिए ऋषि विभांडक के आश्रम गई। अपने सद्भाव और गुणों से शांता ने दोनों का मन जीत लिया। उसके बाद दोनों अंगदेश के लिए यज्ञ करने के लिए सहमत हो गए। उसके बाद ऋष्यश्रृंग ने शांता से विवाह किया।

ऋष्यश्रृंग और शांता ने धार्मिकता का पालन करते हुए यज्ञ किया। यज्ञ के मंत्र के उच्चारण से भारी बारिश हुई। जनता आनन्दित हो गई और अंगराज्य में उत्सव हुए। दशरथ को संतान प्राप्त हो इसलिए ऋष्यश्रृंग ने पुत्रकामेष्टी यज्ञ किया। इस यज्ञ के परिणामस्वरूप राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ।
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5K 465💜🌼💜🌼💜🌼💜🌼💜🕉️प्रभु🫅श्रीराम तथा लक्ष्मण🫅🏻द्वारा🧔🏾मारीच और सुबाहु🧔🏿का वध🔥प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों के यज्ञ में राक्ष...
08/11/2024

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🕉️प्रभु🫅श्रीराम तथा लक्ष्मण🫅🏻द्वारा🧔🏾मारीच और सुबाहु🧔🏿का वध🔥
प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों के यज्ञ में राक्षस बाधा उत्पन्न करते थे। उस समय ऋषि विश्वामित्र बडा यज्ञ कर रहे थे तथा राक्षस उनके यज्ञ की अग्नि में मांस, रक्त आदि डालकर उसे अपवित्र कर देते थे। इसलिए महर्षि विश्वामित्र ने अयोध्या में राजा दशरथ से सहायता मांगी तथा यज्ञ की रक्षा के लिए उनके पुत्र प्रभु श्रीराम को साथ भेजने के लिए कहा। महाराज दशरथ की आज्ञा से प्रभु श्रीराम बंधु लक्ष्मण के साथ ऋषि विश्वामित्रजी के गुरुकुल पहुंचे। उन दोनों को महर्षि विश्वामित्र ने अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए।

एक दिन ब्राह्म मुहूर्त में उठ कर, अपने नित्यकर्म तथा सन्ध्या-उपासना पूरी करने के बाद राम और लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र के पास गए और उनसे बोले, गुरुदेव ! कृपा करके हमें यह बताइये कि दुष्ट राक्षस यज्ञ में विघ्न डालने के लिये किस समय आते हैं। यह हम इसलिये जानना चाहते हैं कि यज्ञ की रक्षा में हम पूर्णतः सिद्ध हो जाएं। कहीं ऐसा न हो कि हमारे अनजाने में ही वे आकर उपद्रव मचाने लगें। राक्षस कब आते है यह जानकर हम सतर्क हो जाएंगे।

राजा दशरथ के वीर पुत्रों की यह उत्साह से भरी बातों को सुनकर वहां पर उपस्थित सारे ऋषि-मुनि अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, हे रघुकुल के भूषण राजकुमारों ! यज्ञ की रक्षा करने के लिए तुमको आज से छः दिन तथा रात्रि तक पूर्ण रूप से सावधान मुद्रा में और सजग रहना होगा। इन छः दिनों मे गुरु विश्वामित्र जी मौन रहकर यज्ञ करेंगे। इस समय में आपके किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं देंगे क्योंकि वे यज्ञ का संकल्प कर चुके हैं।

छ: दिन और छ: रात्रि तक यज्ञ की रक्षा करने की यह सूचना मिलते ही राम और लक्ष्मण दोनों भाई अपने समस्त शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित हो गए। पांच दिन और पांच रात्रि तक श्रीराम और लक्ष्मण निरन्तर बिना किसी विश्राम के सतर्कता के साथ यज्ञ की रक्षा करते रहे। इन पांच दिन तथा रात्रि में यज्ञ में किसी भी प्रकार की विघ्न अर्थात बाधा नहीं आई।

छठवें दिन राम ने लक्ष्मण से कहा, भाई सौमित्र ! यज्ञ का आज अन्तिम दिन है और उपद्रव करने के लिए राक्षसों की आने की पूर्ण सम्भावना है। आज हमें विशेष रूप से सावधान रहने की आवश्यकता है। तनिक भी असावधान हो गए तो गुरुदेवजी का यज्ञ और हमारा सारा परिश्रम निष्फल और निरर्थक हो सकते हैं।

राम ने लक्ष्मण को अभी सतर्क किया ही था कि उसी समय यज्ञ के लिए जो सामग्री, चमस, समिधा आदि आश्रम में रखे थे, वह अपने आप भभक उठे। अचानक आकाश से मेघों के गरजने की आवाज आने लगी। सैकड़ों बिजलियां तडकने की आवाज आने लगी। उसके बाद मारीच और सुबाहु की राक्षसी सेना यज्ञ के स्थान पर रक्त, मांस, मज्जा, अस्थियों आदि की वर्षा करने लगी। यज्ञ में बाधा आ रही है यह देखकर श्रीराम ने उपद्रवकारियों की ओर देखा। तब आकाश में मायावी राक्षसों की सेना को देख कर राम ने लक्ष्मण से कहा, ‘लक्ष्मण ! तुम धनुष पर शर-संधान करके सावधान हो जाओ । मैं मानव अस्त्र चलाकर इन महापापियों की सेना का अभी नाश कर देता हूं।

यह कह कर राम ने अत्यंत फुर्ती और कुशलता का प्रदर्शन करते हुए उन पर मानवास्त्र छोड़ा। श्रीराम ने छोडा हुआ वह मानवास्त्र आंधी की गती से जाकर मारीच की छाती में लगा। अस्त्र के वेग के कारण मारीच उडकर चार सौ कोस दूर समुद्र के पार लंका में जा गिरा। इसके पश्चात् राम ने आकाश में आग्नेयास्त्र फेंका जिससे अग्नि की एक भयंकर ज्वाला निकली और उसने सुबाहु को चारों ओर से घेर लिया। इस अग्नि की ज्वाला ने क्षण भर में उस महापापी सुबाहु को जला कर भस्म कर दिया।

जब उसका जला हुआ शरीर पृथ्वी पर गिरा तो एक बडे जोर का धमाका हुआ। उसके आघात से अनेक वृक्ष टूट कर भूमि पर गिर पड़े। मारीच और सुबाहु पर आक्रमण समाप्त कर के राम ने बचे हुए राक्षसों का नाश करने के लिये वायव्य नामक अस्त्र छोड दिया। उस अस्त्र के प्रहार से राक्षसों की विशाल सेना के वीरों की मृत्यु होकर वे ओलों की भांति भूमि पर गिरने लगे।

इस प्रकार थोडे ही समय में सम्पूर्ण राक्षसी सेना का नाश हो गया। चारों ओर राम की जय जयकार होने लगी तथा पुष्पों की वर्षा होने लगी।

निर्विघ्न यज्ञ समाप्त करके मुनि विश्वामित्र यज्ञ वेदी से उठे और राम को हृदय से लगा कर बोले, ‘हे रघुकुल नंदन ! तुम्हारे बाहुबल के प्रताप और युद्ध कुशलता से आज मेरा यज्ञ सफल हो गया है। उपद्रवी राक्षसों का विनाश करके तुमने वास्तव में आज सिद्धाश्रम को कृतार्थ कर दिया।’
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5K 22🔴🔵🟡🟣🟢🟣🟡🔵🔴🟤श्राद्ध🟤एक साल हुए सुमनलाल को मरे हुए...आज उनका श्राद्ध था...उनको खीर बहुत पसंद थी... इसलिए रसिका, गौरव औ...
19/09/2024

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🟤श्राद्ध🟤
एक साल हुए सुमनलाल को मरे हुए...

आज उनका श्राद्ध था...

उनको खीर बहुत पसंद थी...

इसलिए रसिका, गौरव और उनका बेटा... खीर लेके छत पे गए...

रसिका ने एक कटोरे में खीर डाली... तब... उसका बेटा बोला, "माँ आप तो दादाजी को कभी खीर नहीं देती थीं, आज भी नहीं देनी चाहिए ना।”

गौरव अपने बेटे की बात सुनता रहा और रसिका को तीखी नज़र से देखता रहा...

रसिका ने नज़रें चुरा लीं और बोली... "बेटे मरने के बाद सभी की इच्छा पूरी होनी चाहिए..."

“माँ तो फिर हमें दादाजी को पहले ही खीर खिलानी चाहिए थी..."

और फिर आसमान की तरफ देख कर बोला "दादाजी सॉरी..."

और गौरव उस भोले बेटे को देखता रहा..
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