10/08/2026
23 सितम्बर 1925, बुधवार, आश्विन शुक्ल पंचमी के पावन दिवस पर बिहार प्रांत के बक्सर जनपद अंतर्गत कर्मनाशा नदी के पवित्र तट पर स्थित डिहरी ग्राम में एक धार्मिक, संस्कारित एवं ब्राह्मण कृषक परिवार में एक दिव्य बालक का अवतरण हुआ। परिवार के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में आपका नाम देव मुनि राय रखा गया। नाम के अनुरूप ही बचपन से आपका स्वभाव अत्यंत शांत, सरल, संत-सदृश एवं ऋषि-मुनियों जैसा था। धर्म, पूजा-पाठ, सत्संग और ईश्वर-भक्ति में आपकी विशेष रुचि प्रारंभ से ही दिखाई देती थी। सांसारिक विषयों की अपेक्षा आपका मन वैराग्य की ओर अधिक आकर्षित रहता था।
परिवार की परंपरा एवं सामाजिक दायित्व के अनुसार आपका विवाह हुआ, किंतु गृहस्थ जीवन अधिक समय तक नहीं चला। कुछ ही वर्षों में आपका मन पूर्णतः आध्यात्मिक जीवन की ओर उन्मुख हो गया। आप अपने ग्राम के प्रसिद्ध मठ एवं समाधि स्थल पर अधिकाधिक समय व्यतीत करने लगे। वहीं श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीरामचरितमानस तथा अन्य धर्मग्रंथों का नित्य स्वाध्याय आपके जीवन का अभिन्न अंग बन गया। धीरे-धीरे आपके भीतर वैराग्य दृढ़ होता गया और ईश्वर-प्राप्ति ही आपके जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन गया।
मठ में निवास करते हुए आपने उत्तर भारत तथा उत्तर-पूर्व भारत के अनेक प्रमुख तीर्थस्थलों की यात्राएँ कीं। यात्रा के साथ-साथ आप ग्रामों में धर्मप्रचार, सत्संग एवं लोकजागरण का कार्य करने लगे। आपके मधुर व्यवहार, सरल व्यक्तित्व और सात्त्विक जीवन से लोग अत्यंत प्रभावित होने लगे।
सन 1980 के दशक में आपने सांसारिक जीवन का पूर्णतः त्याग कर संन्यास आश्रम को स्वीकार किया। आपको परम पूज्य गुरुदेव श्री श्री 1008 दंडी स्वामी विमलानंद सरस्वती जी महाराज से विधिवत दंडी संन्यास की दीक्षा प्राप्त हुई। उस समय पूज्य गुरुदेव राजगुरु मठ, शिवाला घाट, वाराणसी तथा श्री स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम, बक्सर के संस्थापक एवं अध्यक्ष थे। संन्यास के उपरांत आपका नामकरण दंडी स्वामी देवानंद सरस्वती हुआ और आपने स्वयं को संन्यास धर्म के प्रति पूर्णतः समर्पित कर दिया।
संन्यास ग्रहण करने के बाद आपने उत्तर प्रदेश के वीरपुर ग्राम स्थित गंगा तट की एक साधारण गुफा में लगभग 25–26 वर्षों तक अत्यंत कठोर तपस्वी जीवन व्यतीत किया। आपने कभी धन का स्पर्श नहीं किया, किसी प्रकार का संग्रह नहीं किया और न ही जूते-चप्पल धारण किए। आपका जीवन पूर्णतः अपरिग्रही, त्यागमय और वैराग्यपूर्ण था। आप निरंतर चातुर्मास व्रत करते रहे तथा नारायणपुर, बहोरनपुर, अंजोरपुर आदि अनेक ग्रामों में धर्मोपदेश देते रहे। मिर्जापुर, प्रयागराज, वाराणसी, गाजीपुर, सासाराम सहित अनेक क्षेत्रों में आपने सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
आपकी दैनिक साधना अत्यंत अनुशासित थी। प्रातःकाल श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीरामचरितमानस, महाभारत, पुराण एवं अन्य धर्मग्रंथों का स्वाध्याय तथा निरंतर मंत्र-जप आपका नित्य नियम था। आप कहा करते थे कि ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास ही साधना की सबसे बड़ी शक्ति है। आपके जीवन का प्रिय आधार यह चौपाई थी—
"मोर दास कहाइ नर आसा।
करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा॥"
आप अक्सर कहते थे—"रघुवर मिलिहैं सांचे से, न वेद-पुराण के बांचे से।" अर्थात् केवल शास्त्रों का अध्ययन ही नहीं, बल्कि निष्कपट श्रद्धा, सच्ची भक्ति और निर्मल आचरण से ही भगवान की प्राप्ति होती है।
सन 2008 में परम पूज्य गुरुदेव की विशेष आज्ञा से आपको राजगुरु मठ, शिवाला घाट, वाराणसी तथा श्री स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम, बक्सर का उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया। आपने अपनी विनम्रता के कारण स्वयं को इस उत्तरदायित्व के योग्य नहीं माना, परंतु गुरु आज्ञा को सर्वोपरि मानकर आपने इसे सहर्ष स्वीकार किया। गुरुकृपा और ईश्वर-विश्वास के बल पर आपने आश्रम की सेवा का दायित्व निभाया।
आप सदैव कहा करते थे—
"यह सम्पत्ति हमारी नहीं, भगवान की है। भगवान अत्यंत दयालु हैं। हम सबका कर्तव्य है कि उनकी सम्पत्ति का सदुपयोग हो, कभी दुरुपयोग न हो।"
आपका जीवन निःस्वार्थ सेवा का अद्भुत उदाहरण था। आप अपने व्यक्तिगत कार्य स्वयं करते थे और किसी से व्यक्तिगत सेवा लेना उचित नहीं समझते थे। शतायु होने के पश्चात भी आप आश्चर्यजनक रूप से आत्मनिर्भर रहे। सादगी, अपरिग्रह, त्याग, अनुशासन और समर्पण आपके व्यक्तित्व की पहचान थी।
सन 2008 से 2026 तक आपने श्री स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम, बक्सर तथा राजगुरु मठ के आध्यात्मिक, धार्मिक, शैक्षणिक एवं सेवा कार्यों को नई दिशा प्रदान की। आश्रम में सत्संग, संस्कार, धर्मप्रचार, गौसेवा, विद्यार्थियों के मार्गदर्शन तथा विभिन्न जनकल्याणकारी कार्यों को आपने निरंतर आगे बढ़ाया। आपके नेतृत्व में आश्रम का सर्वांगीण विकास हुआ और हजारों श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त हुई।
अपने जीवन के 100 वर्ष पूर्ण करने के उपरांत भी आप उसी उत्साह, अनुशासन और सेवा-भाव से कार्यरत रहे। अंततः जीवन के शाश्वत सत्य को स्वीकार करते हुए 18 जुलाई 2026 को आप ब्रह्मलीन हो गए। आपके पार्थिव शरीर को बक्सर के वामन घाट के समीप पवित्र गंगा नदी में जल समाधि दी गई तथा पंचतत्त्व में विलीन हो गया, किंतु आपके आदर्श, उपदेश, तप, त्याग और सेवा की अमूल्य विरासत आज भी असंख्य भक्तों और शिष्यों के हृदय में जीवित है।
परम पूज्य दंडी स्वामी देवानंद सरस्वती जी महाराज का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा वैराग्य संसार से भागना नहीं, बल्कि ईश्वर में पूर्ण समर्पण, गुरु आज्ञा का पालन, निष्काम सेवा, सत्यनिष्ठता, आत्मसंयम और लोकमंगल के लिए सतत कर्म करना है। आपका संपूर्ण जीवन सनातन संस्कृति के उन शाश्वत आदर्शों का सजीव स्वरूप था, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे।
"ऐसे महान संत युगों में जन्म लेते हैं। उनका शरीर भले ही पंचतत्त्व में विलीन हो जाए, किंतु आपके आदर्श, तप, त्याग, सेवा और आध्यात्मिक प्रकाश सदैव समाज का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
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