स्वामी सहजानंन्द सरस्वती आश्रम चरित्रवन बक्सर

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"श्री दण्डी स्वामी सहजानन्द सरस्वती कीर्ति मंदिर, बक्सर (स्थापना: 1954) — दंडी सन्यासी आश्रम, संत निवास,सांस्कृतिक साहित्य और धार्मिक चेतना का केंद्र। संस्थापक: पूज्य दंडी स्वामी विमलानन्द सरस्वती जी। ।।धर्म, सेवा व सनातन संस्कृति को समर्पित पावन धाम ।।

ॐ नमो नारायणाय  भूमिहार ब्राह्मण वंश की व्युत्पत्ति पर प्राचीन ग्रन्थों में तथ्यात्मक विवरण(अ) बाल्मीकि रामायण वैदिक काल...
17/09/2026

ॐ नमो नारायणाय

भूमिहार ब्राह्मण वंश की व्युत्पत्ति पर प्राचीन ग्रन्थों में तथ्यात्मक विवरण

(अ) बाल्मीकि रामायण
वैदिक काल से ही ब्राह्मणों में दो भेद पाये जाते हैं (1) कर्मकाण्डी (2) ज्ञानी । बाल्मीकि रामायण में प्रतिग्राही और अप्रतिग्राही ब्राह्मणों का प्रसंग उस समय आता है जबकि महाराजा दशरथ ने गुरु वशिष्ठ से स्थान विशेष (धर्मारण्य) के श्रेष्ठ ब्राह्मणों की जानकारी चाही। उस पर गुरु वशिष्ठ जी ने कहा कि हे राजन् ! वहाँ (धर्मारण्य) के निवासी ब्राह्मण सदा अपने कर्मों में लगे रहते, यज्ञ और स्वाध्याय करते तथा प्रतिग्रह (दान) से बचे रहते हैं। यथा-
स्वकर्म निरताश्चासन् सर्वे तत्र द्विजातयः ।
यज्ञाध्ययनं निष्ठाश्च विरताश्च प्रतिग्गृहात् ।। श्लोक 3।।
(बालकाण्ड षष्ठः सर्गः)

(ब) महाभारत
भगवान व्यासदेव कृत महाभारत में ब्राह्मणों के दो भेद स्पष्ट रुप से मिलते हैं। यथा-
ब्राह्मण उवाच-
ब्राह्मण द्विविधा राजन् धर्मस्य द्विविधः स्मृतः।
प्रवृत्ताः निवृत्तास्तु निवृताः हि अप्रतिग्रहात् ।। श्लोक 40।।
तेभ्यः प्रयच्छ दानानि ये प्रवृत्ताः नराधिप।
अहं न प्रतिगृह्णमि किमिष्टं किं ददामि ते।
ब्रूहि त्वं नृपति श्रेष्ठ तपसा साधयामि किम् ।। श्लोक 41।।
(शान्तिपर्व के अध्याय 199)
उक्त प्रसंग तपस्यारत अयाचक ब्राह्मण के सम्बन्ध में आता है जबकि राजा इक्ष्वाकु उसे मनचाहा दान देना चाहते थे तो इस पर उस अयाचक ब्राह्मण की प्रतिक्रिया यह हुई कि हे राजन् ! ब्राह्मण दो प्रकार (1) प्रवृत्त (2) निवृत्त के होते हैं और धर्म भी दो प्रकार (1) प्रवृत्ति (2) निवृत्ति माना गया है। मै प्रतिग्रह (दान) से निवृत्त ब्राह्मण हूं अर्थात दान नहीं लेता हूं। हे राजन! आप उन ब्राह्मणों को दान दीजिये, जो प्रवृत्ति मार्ग में हों अर्थात् दान लेते हों। मैं आप से दान नहीं लूंगा।

(स) स्कन्द पुराण
भूमिहार-ब्राह्मण ऐसे ही निवृत्त ब्राह्मणों की वंश परम्परा में आते हैं। इस प्रकार बाल्मीकि रामायण, महाभारत, पुराण, इतिहास एवं स्मृतियों के आधार पर निवृत्त ब्राह्मणों की श्रेष्ठता निर्विवाद सिद्ध है। स्कन्द पुराण में भी अप्रतिग्राही ब्राह्मणों के धर्मारण्य की कथा आती है कि धर्मराज ने त्रिदेव को तपस्या द्वारा प्रसन्न कर संसार के सर्वोत्तम ब्राह्मण को प्रतिष्ठित कर धर्मारण्य बनाने का वरदान मांगा। जिसे त्रिदेव ने सहर्ष स्वीकार किया। इस प्रकार विष्णु भगवान ने 24 गोत्रों के ब्राह्मणों को चुन-चुन कर वहाँ स्थापित किया और इस क्षेत्र का नाम धर्मारण्य रखा। लंका विजय के पश्चात् अयोध्या लौटने पर भगवान राम ने गुरु वशिष्ठ से पूछा कि हे गुरुदेव ! मै यज्ञ कहाँ करूं? तब गुरु वशिष्ठ जी ने कहा, हे राम ! धर्मारण्य निवासी कश्यपादि गोत्र के ब्राह्मण बड़े ही सदाचारी, शास्त्र परायण, ब्रह्मज्ञानी, श्रेष्ठ यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले तथा धर्म शास्त्र के अनुसार आचरण करने वाले हैं। जैसा कि स्कन्द पुराण के तृतीय ब्रह्मखण्ड, के धर्मारण्य प्रकरण 31 वें अध्याय में गुरु वशिष्ठ जी ने भगवान राम धर्मारण्य के महात्म्य एवं इसमें निवास करने वाले अप्रतिग्राही ब्राह्मणों के विषय में अवगत कराया कि :-
"नाशयन्ति मनुष्याणां सर्वपापानि लीलया। तीर्थानां परमं तीर्थं धर्मारण्य प्रचक्षते ।। श्लोक 30।।
ब्रह्मा विष्णु शिवाद्यैर्पदादौ संस्थापितं पुरा। अरण्यानाञ्च सर्वेषां तीर्थानाञ्च विशेषतः ।। 31 ।।
धर्मारण्यात्परं नास्ति भुक्ति मुक्ति प्रदायकम्। (स्वर्गे देवाः प्रशंसन्ति धर्मारण्य निवासिनः ।। 32।।
अर्थात् "सभी तीथों में श्रेष्ठ तीर्थ धर्मारण्य है, जहाँ क्षणमात्र में मनुष्यों के पाप नष्ट हो जाते हैं। अरण्य एवं सभी तीर्थों में इस विशिष्ट धर्मारण्य को ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव ने स्थापित किया। यह ऐश्वर्य और मुक्ति को देने वाला है। देवगण भी इसकी प्रशंसा करते हैं।"
महर्षि वशिष्ठ के निर्देशानुसार भगवान राम जब धर्मारण्य पहुंचे तो ज्ञात हुआ कि वहाँ के ब्राह्मण लोहासुर के अत्याचार से त्रस्त होकर इधर उधर चले गये है। भगवान राम ने उनका पता लगाकर बड़े सम्मान के साथ उन्हें बुलाया और पुनः धर्मारण्य में प्रतिष्ठित किया। भगवान राम ने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों की सेवा हेतु वहाँ 36 हजार वैश्य, उनसे चौगुने शुद्र उपलब्ध कराया। यथा :-
"तेषां सुश्रुषाय वैश्यान्रामो निवेदयत्।
षट् त्रिंशश्च सहस्राणि शुद्रास्तेभ्यश्च चतुर्गुणान्।।"
(स्कन्द पुराण-तृतीय ब्रह्मखण्ड-धर्मारण्य प्रकरण के अध्याय 35 वें के श्लोक सं. 45)

भगवान राम ने इन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से दान लेने का अनुरोध किया। इन ब्राह्मणों ने निवेदन किया कि हे राम ! हम लोग शिलोच्छिजीवी हैं। सदा सन्तुष्ट रहकर धर्म कार्य में लगे रहते हैं। हमें दान से कोई प्रयोजन नहीं है। जैसा कि स्कन्दपुराण में यह प्रसंग आया है कि :-

"ततस्तु मिलिताः सर्वे विमृश्य च परस्परम्। केचिदूचुस्तदा रामं शिलोच्छिजीविका वयम् ।। 6।।
संतोष परमास्थाय स्थित धर्मपरायणः। प्रतिग्रह प्रयोगेण न चास्माकं प्रयोजनम्।। 7।।"
(स्कन्द पुराण के तृतीयं ब्रह्मखण्ड के धर्मारण्य प्रकरण के 33 वें अध्याय के श्लोक 6-7)

अर्थात् "अप्रतिग्राही सभी ब्राह्मण राम से कहने लगे कि हम सभी लोग शिलोच्छिजीवी हैं। संतोष धारण कर धर्मारण्य में रहते हैं और हम लोगों को दान लेने का कोई प्रयोजन नही है। उन अप्रतिग्राही ब्राह्मणों ने यह भी कहा कि वे लोग त्रिदेवों द्वारा बसाये हुये हैं। इसलिये बिना उनकी आज्ञा के प्रतिग्रह (दान) नहीं ले सकते। उनकी बात सुनकर भगवान राम ने त्रिदेवों को स्मरण किया। त्रिदेव प्रकट हुये। उनके कहने पर अप्रतिग्राही (निवृत्त) श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने किसी प्रकार दान लेना स्वीकार किया। यज्ञ सम्पन्न होने पर भगवान राम ने उन्हे दस-दस दुधारु गाये, बहुत सा धन तथा 144 ग्राम भी दिये। यथा :-
"एकैकगो दश दश ददौ धेनुः पयस्वनी। चत्वारिंशच्छतं प्रादाद् ग्रामाणां चतुराधिकम् ।।"

भगवान परशुराम का प्रकरण:-
इन अप्रतिग्राही (निवृत्त) ब्राह्मणों को सुदृढ़ रुप देने के लिये भगवान परशुराम का योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है प्राचीन काल में भारतीय समाज में चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) व्यवस्था के अनुसार देश की रक्षा का भार क्षत्रियों पर सौंपा गया। किन्तु क्षत्रिय राजाओं के कर्तव्यच्युत हो जाने पर समाज में अत्याचार और अनाचार बढ़ गया। ऐसी परिस्थिति में इन अत्याचारियों के विनाश और धर्म की रक्षा हेतु भगवान परशुराम को परशु धारण कर क्षत्रियों को इक्कीस बार मान-मर्दने करना पडा। सम्पूर्ण विजित भूमि को भगवान परशुराम ने महर्षि कश्यप तथा अन्य सुपात्र ब्राह्मणों को जो अध्ययन-अध्यापन के अलावा समाज एवं देश के रक्षार्थ हथियार उठाने में सक्षम, प्रजा पालन और शासन व्यवस्था में निपुण थे, दे दी।
भगवान् परशुराम द्वारा भूमि पर आधिपत्य जमाने की प्रवृत्ति अप्रतिग्राही (अयाचक) ब्राह्मणों में पैदा हुई, जो अध्ययन-अध्यापन के साथ कृषि कार्य करने तथा समाज को व्यवस्थित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे।

भगवान् परशुराम ने अपने लिये कुछ भी नहीं रखा और निस्पंद भाव से तपस्वी का जीवन बिताते हुये दक्षिणी भारत के पश्चिमी समुद्र तट के किनारे सहयाद्रि पर्वत के सन्निकट की दलदली भूमि अपने बाहुबल से बसने एवं कृषियोग्य बनाया। अपनी माता कुकणा (रेणुका) के नाम पर उन्होंने उस भूमि का नाम कोंकण रखा। मालाबार तट पर केरल से कन्याकुमारी तक की भूमि भगवान परशुराम के द्वारा निर्मित बतायी जाती है। यहाँ पर बसे हुये ब्राह्मण जो कृषि कार्य से सम्बद्ध और अप्रतिग्राही (अयाचक) थे, क्षितिपावन (चितपावन) अर्थात् भूमि को पवित्र करने वाला है, कहलाये। यहाँ अन्य जो अप्रतिग्राही (अयाचक) ब्राह्मण आये, उनमें कराडे और नम्बूतिरि (नम्बूदिरि) प्रमुख हैं, जो अपने को भगवान् परशुराम द्वारा बसाया मानते हैं।

विश्वविद्यालय एवं गुरुकुल के आचार्य-

इस प्रकार हम देखते हैं कि भगवान परशुराम द्वारा भूम्याधिकार पाने वाले महर्षि कश्यप आदि की सन्तानें जो अप्रतिग्राही (अयाचक) ब्राह्मण कहलातीं थीं, कालान्तर में भूमिहार, महीवार (महीयाल, महीपाल), क्षितिपावन (चित्तपावन), मुस्तान (माहिस्थान), हलुकार (हलकार) आदि नाम से जाने जाते हैं। इसके अतिरिक्त प्राचीन काल में विश्वविद्यालयों, गुरुकुलों आदि के नाम, उनके खर्चे के लिए सैकड़ों गावों की भूमि सम्बद्ध कर दी जाती थी। इनके कुलप्ति आचार्य, उच्च कोटि के विद्वान (निवृत) ब्राह्मण हुआ करते थे। धीरे-धीरे वे उन भूमियों के अधिपति बनते गये तथा अपने कला कौशल एवं प्रवीणता के बल पर जमीदार ब्राह्मण या भूमिहार ब्राह्मण कहलाये। अधिकांश प्रवीण विद्वान् ब्राह्मण अपने सदाचार, कुलीनता, विद्वता तथा कर्तव्य परायणता के आधार पर हिन्दू राजाओं को प्रभावित कर अग्रहार के रुप में भूमि अर्जित करते रहते थे।
बौद्ध धर्म के अभ्युदय काल में भी अप्रतिग्राही ब्राह्मणों ने परिस्थिति के अनुरुप अपने को ढाल कर अपना प्रभाव अक्षुण बनाये रखा। यही कारण है कि अयाचक ब्राह्मण (भूमिहार ब्राह्मण) को गया के प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर के प्रमुख पुजारी होने का गौरव प्राप्त था। सम्राट कनिष्क (120-162 ए.डी.) ने भी बौद्ध विहारों के देख-रेख के लिये विस्तृत भूमि अप्रतिग्राही (अयाचक) ब्राह्मण सेनापतियों को दे दी थी, जो कालान्तर में "भूमिहार ब्राह्मण" नाम से जाने गये।

इन तथ्यों से यह स्पष्ट हुआ कि परिवर्तित परिवेश में ब्राह्मणों को अध्ययन-अध्यापन कार्य करते हुये क्षत्रियोचित कार्यों के निमित्त शस्त्र भी उठाना पडा और साथ ही वैश्योचित्त कार्य जैसे-कृषि, पशुपालन आदि भी करना पडा। ऐसे ब्राह्मण वर्ग को अयाचक ब्राह्मण कहा गया। जैसा कि भगवान् परशुराम ने उद्घोष किया कि-

अग्रतः चतुर्वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः ।
इदं ब्रह्यं इदं क्षात्रं शास्त्रादपि शरादपि ।।

कालांतर में देश व काल के अनुसार ब्राह्मणों में विभेद हुये। भले ही इसे कृत्रिम एवं आधुनिक माना जाय किन्तु आजकल इसी का प्रचलन अधिक है। आदिशंकराचार्य (788-820 ए.डी.) जिनका मूलनाम श्री उमादत्त शर्मा था, ब्राह्मणों का वर्गीकरण करते हुये विन्ध्याचल पर्वत के उत्तर में बसने वाले ब्राह्मणों को गौड़ ब्राह्मण तथा इसके दक्षिण में बसने वाले ब्राह्मणों को द्रविण ब्राह्मण कहते हैं। यथा-
सारस्वतः कान्यकुब्जाः गौडाश्च मैथिलोत्कलाः ।
गौडाः पंच समारव्याताः विन्ध्यस्योत्तर वासिनः ।।
तथा
कर्णाटकाश्च तैलंगाः द्रविणाः महाराष्ट्रकाः।
गुर्जराश्चेति पंचैव द्रविणाः विन्ध्यद‌क्षिणे ।।

कान्यकुब्ज ब्राह्मणों में भेद

कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के पांच भेद माने जाते हैं। यथा
सरयूपारीणः सनाढ्यश्च भूमिहारो जिझौतियः। प्रकृताश्च कान्यकुब्जानां भेदो पंच प्रकीर्तितः ।। अर्थात् सरयूपारी, सनाढ्य, भूमिहार, जिझौतिया और प्राकृत कनौजिया (कनौजिया खास) ये पाँच भेद कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के हैं। सर हेनरी इलियट ने भी अपने अध्ययन में कनौजिया ब्राह्मणों के उक्त पांच भेद बताया है। उसके अनुसार इनमें आपस में शादी-विवाह आदि सम्पन्न होते हैं।

सन् 1926-27 में सम्पन्न कान्यकुब्ज महती सभा ने सरयूपारी, सनाढ्य, भूमिहार, जिझौतिया के साथ-साथ पर्वतीय-बंगाली आदि ब्राह्मणों को भी कान्यकुब्ज ब्राह्मणों का अंग माना था।

भूमिहार-ब्राह्मण

कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के पांच भेदों में एक भेद भूमिहार ब्राह्मण है। कान्यकुब्ज ब्राह्मणों का एक वर्ग जो भूमि, जमीन या जमोदारी या खेतीबारी से सम्बद्ध था। ऐसे कानपुर जनपद के मदारपुर तथा उसके आस-पास निवासित ब्राह्मणों को भूमिहार ब्राह्मण नाम से जाना गया। हालांकि अब इनका स्वतंत्र अस्तित्व होने के कारण इन्हें कान्यकुब्ज न कहकर केवल भूमिहार ब्राह्मण या भूमिहार नाम से अभिहित किया जाता है।
भूमिहार- ब्राह्मण उतर प्रदेश ( विशेषतः पूर्वी उतर प्रदेश ), बिहार,बंगाल तक अधिकाधिक संख्या में उपजाऊ भूमि पर खेती - बारी में लगे हुए है।

भूमिहार वंश के व्युत्पत्ति पर विद्वानों के विचार

डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने "भूमिहार" शब्द की उत्पत्ति के विषय में एक जगह (सैनिक ब्राह्मण पृ.सं. 222) लिखा है कि 'भूमिहार' शब्द का पुराना प्रयोग मुझे नहीं मिला। बारहवीं शताब्दी के पहले तो यह शब्द शायद ही मिले। मेरे विचार से 'भूमिहार' ब्राह्मणों की वह शाखा है जो किसी समय अपने विद्यावल से राज्यवंशों से अग्रहार प्राप्त कर भूमिपति होने का सौभाग्य भोगती रही। अग्रहार शब्द बहुत पुराना है और महाभारत में भी मिलता है। मेरा अनुमान है कि प्रतिहारों और गहरवारों के समय तक वे (भूमिहार) कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की ही एक शाखा माने जाते रहे। गहरवारों के बाद मुसलमान शासकों के समय हिन्दुओं की सभी जातियां छोटी-छोटी टोलियों में सिमटने लगीं। कई उप जातियों ने स्वतंत्र जाति-का रुप धारण किया और उसी समय भूमिहार भी अपनी अलग सत्ता बनाने लगे यही "संक्षेप में मेरा विचार-है।"

पं. वेंकटेश नारायण तिवारी के एक पत्र के अनुसार "भूमिहार ब्राह्मण, जिन्हें सैनिक ब्राह्मण कहा जाता है, वास्तव में कान्यकुब्ज ब्राह्मण है। कान्यकुब्ज और भूमिहारों में कोई अन्तर नहीं है। दोनों एक दूसरे से शादी-विवाह करते हैं।"

सर हेनरी एम. एलियट तथा बंगाल के विद्वान् डॉ. राजेन्द्र लाल मिश्र के अनुसार भी भूमिहार-ब्राह्मण कान्यकुब्ज ब्राह्मण की एक शाखा है।

महा पंडित राहुल सांस्कृत्यायन ने 'गंगा' पत्रिका में प्रकाशित 'सारण का भूगोल' में एक जगह लिखा है कि "यहाँ सरयूपारीय ब्राह्मण धनी होने पर भूमिहारों और भूमिहार गरीब होने पर सरयूपारीय ब्राह्मणों में मिल जाता है।" इस बात का समर्थन विद्वान लेखक श्री अम्बिका प्रसाद बाजपेयी के कतिपय लेखों से मिल जाता है। इसी तथ्य की पुष्टि विहार के मुजफ्फरपुर डिस्ट्रिक्ट गजेटियर ने की है कि सम्पन्न होने पर पुरोहित वर्ग का मैथिल ब्राह्मण "पश्चिमा या भूमिहार" हो जाता है और धनहीन होने पर पश्चिमा (भूमिहार) मैथिल ब्राह्मण हो जाता है।

पं. अयोध्या प्रसाद ने अपनी पुस्तक 'विप्रोत्तम परिचय' में भूमिहार = भूमि + हार अर्थात् भूमि की माला या शोभा को बताते हुये कहा है कि अपने महत्वपूर्ण गुणों तथा लोक हितकारक कार्यों से भूमण्डल को सुशोभित करने वाला समाज के हृदय स्थान पर सदा विराजमान 'सर्वविद् ब्राह्मण' को भूमिहार कहते हैं।
परम ज्ञानी दंडी स्वामी स्वामी विमलानन्द सरस्वती (अध्यक्ष एवं महंत राजगुरु मठ शिवाला घाट वाराणसी एवं श्री स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम बक्सर)ने "ब्राह्मण कौन" परिशिष्ट में भूमिहार के बारे में लिखा भू = नाना मि = सन्देह + हार = हरण करने वाला अर्थात् नाना प्रकार के सन्देहों का निवारण करने वाले परम ज्ञानी ब्राह्मण को भूमिहार कहते हैं।

एक अन्य उक्ति के अनुसार भूमिहार (भूमि + हार = भूमि के अग्रहार को स्वीकारने वाला) वे श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं जो वेदशास्त्र के अध्ययन हेतु राज्य द्वारा समर्पित भूमि (अग्रहार) को स्वीकार करें। प्रख्यात विद्वान डा. राजेन्द्र लाल मिश्र ने भूमिहार ब्राह्मण के विषय में अपने बंगला, मासिक पत्र में लिखा है कि कान्यकुब्ज ब्राह्मण के पांच भेद हैं:- (1) सरयूपारी (2) सनाढय (3) जिझौतिया (4) भूमिहार (5) प्रकृत कनौजिया प्रसिद्ध विद्वान श्री योगेन्द्रनाथ भट्टाचार्य ने संस्कृत के इस उक्ति "भूमिं हरति केन्चित उपायेन् स्वीकरोति गृहणाति इति भूमिहार" अर्थात् 'भूमिग्राही ब्राह्मण' से भूमिहार को चरितार्थ किया है। प्रो. राजनाथ पाण्डेय ने अपनी पुस्तक 'त्रिकालजयी' में 'भूमिहार' शब्द को भूमिसुर, महिसुर, महिदेव, भूदेव आदि का पर्यायवाची माना है।

भूमिहार-ब्राह्मण जाति के प्रबल पोषक, उद्धारक व उद्भट विद्वान् दंडी स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने सन् 1928-29 में 'भूमिहार-ब्राह्मण परिचय' नामक पुस्तक में वेद, स्कन्द पुराण, शास्त्र व स्मृति, गृहसूत्र आश्वलायन तथा महाभारत के शान्तिपर्व के आधार पर प्रमाणित किया कि वस्तुतः भूमिहार निवृत (ज्ञानी व अप्रतिग्राही) ब्राह्मण हैं। स्वामी जी ने "भूमिहार शब्द 'भूमि' शब्द को पूर्व में रखकर हृ धातु हरण अर्थ का बोधक बताया है।” पं. भट्टोजी दीक्षित ने उपने सिद्वान्त कौमुदी में "हरण" का अर्थ (1) हरणं (अधि.) (2) प्रापणं (प्राप्त करना) (3) स्वीकारं (स्वीकारना) (4) स्तेयं (चुराना) (5) नाशनं (नाश करना) बताया है। यहाँ भूमि पर अधिकार करने से अभिप्रेत है। चूंकि भूमिहार ब्राह्मण सांसारिक व्यवसाय करते हैं। अतएव ये लोग दाक्षिणात्य लौकिक ब्राह्मणों की तरह दान ग्रहण और पुरोहिती नहीं करते और इसीलिये इन्हे अयाचक ब्राह्मण, भी कहते है। भूमिहार ब्राह्मणों की उपाधियां भी साधारणतः वे ही हैं जो उत्तरी भारत के अन्य ब्राह्मणों की है। केवल युद्ध प्रिय एवं वीरतापूर्ण होने के कारण भूमिहार ब्राह्मणों की युद्ध पदवियां क्षत्रिय सदृश सिंह, शाही, ठाकुर आदि रखी गयी हैं।

विस्तृत जानकारी हेतु:-
परम पूज्य गुरुदेव श्री श्री 1008 दंडी स्वामी विमलानन्द सरस्वती जी द्वारा लिखित —

1) ‘ब्राह्मण कौन?’
2) ‘शासक, सैनिक एवं धर्माचार्य ब्राह्मण’

भूमिहार ब्राह्मण समाज के इतिहास एवं विभिन्न भूमिकाओं की विस्तृत जानकारी हेतु इन पुस्तकों का अध्ययन करें।
साभार: -
स्वामी सहजानन्द सरस्वती शोध-संस्थान, राजगुरु मठ, शिवाला घाट, वाराणसी एवं श्री स्वामी सहजानन्द सरस्वती आश्रम, बक्सर

परम पूज्य ब्रह्मलीन श्री श्री 1008 दंडी स्वामी देवानंद सरस्वती जी महाराज से जुड़ी पुरानी आमंत्रण-पत्रिका, कार्ड, पंपलेट ...
07/09/2026

परम पूज्य ब्रह्मलीन श्री श्री 1008 दंडी स्वामी देवानंद सरस्वती जी महाराज से जुड़ी पुरानी आमंत्रण-पत्रिका, कार्ड, पंपलेट एवं अन्य स्मृतियां साझा कर रहे हैं।

ये धरोहरें पूज्य गुरुदेव श्री के जीवन, सेवा एवं आध्यात्मिक कार्यों की अनमोल यादें हैं।

पूज्य गुरुदेव को शत् शत् नमन ।

#दंडीस्वामीदेवानंदसरस्वतीजीमहाराज #पूज्यगुरुदेव #पुरानीस्मृतिया #बक्सर

23 September 1925, Wednesday, on the auspicious day of Ashwin Shukla Panchami, a divine child was born into a religious,...
26/08/2026

23 September 1925, Wednesday, on the auspicious day of Ashwin Shukla Panchami, a divine child was born into a religious, cultured, and Brahmin farming family in Dehri village, situated on the sacred banks of the Karmnasha River in Buxar district of Bihar. As the eldest son of the family, he was named Dev Muni Rai. True to his name, he was exceptionally calm, simple, saintly, and sage-like in temperament from childhood. He showed a deep inclination toward religion, worship, spiritual gatherings, and devotion to God from an early age. Rather than worldly pursuits, his mind was increasingly drawn toward renunciation.
According to family traditions and social responsibilities, he was married, but his household life did not continue for long. Within a few years, his mind became completely inclined toward a spiritual life. He began spending increasing amounts of time at the famous monastery and sacred samadhi site in his village. There, daily study of the Shrimad Bhagavad Gita, Ramcharitmanas, and other religious scriptures became an integral part of his life. Gradually, his spirit of renunciation grew stronger, and the attainment of God became the sole purpose of his life.
While residing at the monastery, he undertook pilgrimages to numerous prominent sacred places across North and Northeastern India. Along with these journeys, he began spreading religious teachings, organizing spiritual gatherings, and awakening social and religious consciousness in various villages. People were deeply influenced by his gentle conduct, simple personality, and sattvic way of life.
In the 1980s, he completely renounced worldly life and entered the Sannyasa Ashrama. He formally received Dandi Sannyasa initiation from his revered Gurudev, Param Pujya Shri Shri 1008 Dandi Swami Vimalanand Saraswati Ji Maharaj. At that time, his revered Gurudev was the founder and president of Rajguru Math, Shivala Ghat, Varanasi, and Shri Swami Sahajanand Saraswati Ashram, Buxar. After accepting sannyasa, he was given the monastic name Dandi Swami Devanand Saraswati, and he devoted himself completely to the principles and duties of the Sannyasa tradition.
After taking sannyasa, he spent approximately 25–26 years living an extremely austere ascetic life in a simple cave on the banks of the Ganga in Veerpur village of Uttar Pradesh. He never touched money, accumulated possessions, or wore shoes or slippers. His life was completely characterized by non-possession, renunciation, austerity, and detachment. He continuously observed the Chaturmas Vrat and delivered spiritual discourses in numerous villages, including Narayanpur, Bahoranpur, Anjorpur, and others. He made significant contributions to the propagation of Sanatana Dharma in regions including Mirzapur, Prayagraj, Varanasi, Ghazipur, and Sasaram.
His daily spiritual discipline was extremely rigorous. Early each morning, he studied the Shrimad Bhagavad Gita, Ramcharitmanas, Mahabharata, Puranas, and other sacred scriptures, along with continuous mantra chanting. He used to say that unwavering faith in God is the greatest strength of spiritual practice. One of the beloved verses that formed the foundation of his life was:
“Mora das kahai nar asa,
Karai tau kahahu kaha biswasa.”
He often said:
“Raghuvar milihain sanche se, na Ved-Puran ke banche se.”
In other words, the attainment of God does not come merely through the study of scriptures; it comes through sincere faith, true devotion, and pure conduct.
In 2008, by the special command of his revered Gurudev, he was appointed the successor of Rajguru Math, Shivala Ghat, Varanasi, and Shri Swami Sahajanand Saraswati Ashram, Buxar. Because of his humility, he did not consider himself worthy of such a responsibility. However, placing his Guru’s command above everything else, he willingly accepted the responsibility. With the grace of his Guru and unwavering faith in God, he faithfully carried out his duties toward the Ashram.
He would always say:
“This property does not belong to us; it belongs to God. God is extremely compassionate. It is our duty to ensure that His property is used properly and is never misused.”
His life was an extraordinary example of selfless service. He performed his personal tasks himself and did not consider it appropriate to accept personal service from others. Even after completing a hundred years of age, he remained remarkably self-reliant. Simplicity, non-possession, renunciation, discipline, and dedication were the defining qualities of his personality.
From 2008 to 2026, he gave new direction to the spiritual, religious, educational, and charitable activities of Shri Swami Sahajanand Saraswati Ashram, Buxar, and Rajguru Math. Under his guidance, spiritual gatherings, religious education, propagation of Sanatana Dharma, cow service, guidance of students, and various public welfare activities continued to flourish. Under his leadership, the Ashram witnessed overall development, and thousands of devotees received spiritual inspiration.
Even after completing 100 years of his life, he continued to work with the same enthusiasm, discipline, and spirit of service. Finally, accepting the eternal truth of life, he became Brahmaleen on 18 July 2026. His mortal remains were given Jal Samadhi in the sacred Ganga near Vaman Ghat, Buxar, and his physical body merged into the five elements. However, his ideals, teachings, austerity, renunciation, and legacy of service continue to live in the hearts of countless devotees and disciples.
The life of Param Pujya Dandi Swami Devanand Saraswati Ji Maharaj teaches us that true renunciation does not mean fleeing from the world. Rather, it means complete surrender to God, obedience to the Guru’s command, selfless service, truthfulness, self-discipline, and continuous action for the welfare of society. His entire life was a living embodiment of the eternal ideals of Sanatana culture and will remain a source of inspiration for generations to come.
“Such great saints are born only once in many ages. Although their physical bodies eventually merge into the five elements, their ideals, austerity, renunciation, service, and spiritual light continue to guide society forever.”

॥ ॐ नमो नारायणाय ॥महर्षि भृगु की पावन नगरी बलिया जनपद अंतर्गत अंजोरपुर ग्राम में वर्ष 2019 में पूज्य गुरुदेव श्री श्री 1...
16/08/2026

॥ ॐ नमो नारायणाय ॥
महर्षि भृगु की पावन नगरी बलिया जनपद अंतर्गत अंजोरपुर ग्राम में वर्ष 2019 में पूज्य गुरुदेव श्री श्री 1008 ब्रह्मलीन दंडी स्वामी देवानंद सरस्वती जी महाराज ने अपने शिष्यों के साथ चातुर्मास व्रत का पावन अनुष्ठान किया।
इस पावन अवसर पर पूज्य गुरुदेव के साथ
बाएँ से दाएँ — दंडी स्वामी सुदर्शनानंद सरस्वती जी, दंडी स्वामी महेश्वरानंद सरस्वती जी एवं दंडी स्वामी परमात्मानंद सरस्वती जी महाराज।
यह स्मरणीय चित्र गुरुदेव के तप, साधना एवं शिष्य-परंपरा की पावन स्मृति को संजोए हुए है।
पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि साष्टांग दंडवत प्रणाम।

23 सितम्बर 1925, बुधवार, आश्विन शुक्ल पंचमी के पावन दिवस पर बिहार प्रांत के बक्सर जनपद अंतर्गत कर्मनाशा नदी के पवित्र तट...
10/08/2026

23 सितम्बर 1925, बुधवार, आश्विन शुक्ल पंचमी के पावन दिवस पर बिहार प्रांत के बक्सर जनपद अंतर्गत कर्मनाशा नदी के पवित्र तट पर स्थित डिहरी ग्राम में एक धार्मिक, संस्कारित एवं ब्राह्मण कृषक परिवार में एक दिव्य बालक का अवतरण हुआ। परिवार के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में आपका नाम देव मुनि राय रखा गया। नाम के अनुरूप ही बचपन से आपका स्वभाव अत्यंत शांत, सरल, संत-सदृश एवं ऋषि-मुनियों जैसा था। धर्म, पूजा-पाठ, सत्संग और ईश्वर-भक्ति में आपकी विशेष रुचि प्रारंभ से ही दिखाई देती थी। सांसारिक विषयों की अपेक्षा आपका मन वैराग्य की ओर अधिक आकर्षित रहता था।
परिवार की परंपरा एवं सामाजिक दायित्व के अनुसार आपका विवाह हुआ, किंतु गृहस्थ जीवन अधिक समय तक नहीं चला। कुछ ही वर्षों में आपका मन पूर्णतः आध्यात्मिक जीवन की ओर उन्मुख हो गया। आप अपने ग्राम के प्रसिद्ध मठ एवं समाधि स्थल पर अधिकाधिक समय व्यतीत करने लगे। वहीं श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीरामचरितमानस तथा अन्य धर्मग्रंथों का नित्य स्वाध्याय आपके जीवन का अभिन्न अंग बन गया। धीरे-धीरे आपके भीतर वैराग्य दृढ़ होता गया और ईश्वर-प्राप्ति ही आपके जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन गया।
मठ में निवास करते हुए आपने उत्तर भारत तथा उत्तर-पूर्व भारत के अनेक प्रमुख तीर्थस्थलों की यात्राएँ कीं। यात्रा के साथ-साथ आप ग्रामों में धर्मप्रचार, सत्संग एवं लोकजागरण का कार्य करने लगे। आपके मधुर व्यवहार, सरल व्यक्तित्व और सात्त्विक जीवन से लोग अत्यंत प्रभावित होने लगे।
सन 1980 के दशक में आपने सांसारिक जीवन का पूर्णतः त्याग कर संन्यास आश्रम को स्वीकार किया। आपको परम पूज्य गुरुदेव श्री श्री 1008 दंडी स्वामी विमलानंद सरस्वती जी महाराज से विधिवत दंडी संन्यास की दीक्षा प्राप्त हुई। उस समय पूज्य गुरुदेव राजगुरु मठ, शिवाला घाट, वाराणसी तथा श्री स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम, बक्सर के संस्थापक एवं अध्यक्ष थे। संन्यास के उपरांत आपका नामकरण दंडी स्वामी देवानंद सरस्वती हुआ और आपने स्वयं को संन्यास धर्म के प्रति पूर्णतः समर्पित कर दिया।
संन्यास ग्रहण करने के बाद आपने उत्तर प्रदेश के वीरपुर ग्राम स्थित गंगा तट की एक साधारण गुफा में लगभग 25–26 वर्षों तक अत्यंत कठोर तपस्वी जीवन व्यतीत किया। आपने कभी धन का स्पर्श नहीं किया, किसी प्रकार का संग्रह नहीं किया और न ही जूते-चप्पल धारण किए। आपका जीवन पूर्णतः अपरिग्रही, त्यागमय और वैराग्यपूर्ण था। आप निरंतर चातुर्मास व्रत करते रहे तथा नारायणपुर, बहोरनपुर, अंजोरपुर आदि अनेक ग्रामों में धर्मोपदेश देते रहे। मिर्जापुर, प्रयागराज, वाराणसी, गाजीपुर, सासाराम सहित अनेक क्षेत्रों में आपने सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
आपकी दैनिक साधना अत्यंत अनुशासित थी। प्रातःकाल श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीरामचरितमानस, महाभारत, पुराण एवं अन्य धर्मग्रंथों का स्वाध्याय तथा निरंतर मंत्र-जप आपका नित्य नियम था। आप कहा करते थे कि ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास ही साधना की सबसे बड़ी शक्ति है। आपके जीवन का प्रिय आधार यह चौपाई थी—
"मोर दास कहाइ नर आसा।
करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा॥"
आप अक्सर कहते थे—"रघुवर मिलिहैं सांचे से, न वेद-पुराण के बांचे से।" अर्थात् केवल शास्त्रों का अध्ययन ही नहीं, बल्कि निष्कपट श्रद्धा, सच्ची भक्ति और निर्मल आचरण से ही भगवान की प्राप्ति होती है।
सन 2008 में परम पूज्य गुरुदेव की विशेष आज्ञा से आपको राजगुरु मठ, शिवाला घाट, वाराणसी तथा श्री स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम, बक्सर का उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया। आपने अपनी विनम्रता के कारण स्वयं को इस उत्तरदायित्व के योग्य नहीं माना, परंतु गुरु आज्ञा को सर्वोपरि मानकर आपने इसे सहर्ष स्वीकार किया। गुरुकृपा और ईश्वर-विश्वास के बल पर आपने आश्रम की सेवा का दायित्व निभाया।
आप सदैव कहा करते थे—
"यह सम्पत्ति हमारी नहीं, भगवान की है। भगवान अत्यंत दयालु हैं। हम सबका कर्तव्य है कि उनकी सम्पत्ति का सदुपयोग हो, कभी दुरुपयोग न हो।"
आपका जीवन निःस्वार्थ सेवा का अद्भुत उदाहरण था। आप अपने व्यक्तिगत कार्य स्वयं करते थे और किसी से व्यक्तिगत सेवा लेना उचित नहीं समझते थे। शतायु होने के पश्चात भी आप आश्चर्यजनक रूप से आत्मनिर्भर रहे। सादगी, अपरिग्रह, त्याग, अनुशासन और समर्पण आपके व्यक्तित्व की पहचान थी।
सन 2008 से 2026 तक आपने श्री स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम, बक्सर तथा राजगुरु मठ के आध्यात्मिक, धार्मिक, शैक्षणिक एवं सेवा कार्यों को नई दिशा प्रदान की। आश्रम में सत्संग, संस्कार, धर्मप्रचार, गौसेवा, विद्यार्थियों के मार्गदर्शन तथा विभिन्न जनकल्याणकारी कार्यों को आपने निरंतर आगे बढ़ाया। आपके नेतृत्व में आश्रम का सर्वांगीण विकास हुआ और हजारों श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त हुई।
अपने जीवन के 100 वर्ष पूर्ण करने के उपरांत भी आप उसी उत्साह, अनुशासन और सेवा-भाव से कार्यरत रहे। अंततः जीवन के शाश्वत सत्य को स्वीकार करते हुए 18 जुलाई 2026 को आप ब्रह्मलीन हो गए। आपके पार्थिव शरीर को बक्सर के वामन घाट के समीप पवित्र गंगा नदी में जल समाधि दी गई तथा पंचतत्त्व में विलीन हो गया, किंतु आपके आदर्श, उपदेश, तप, त्याग और सेवा की अमूल्य विरासत आज भी असंख्य भक्तों और शिष्यों के हृदय में जीवित है।
परम पूज्य दंडी स्वामी देवानंद सरस्वती जी महाराज का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा वैराग्य संसार से भागना नहीं, बल्कि ईश्वर में पूर्ण समर्पण, गुरु आज्ञा का पालन, निष्काम सेवा, सत्यनिष्ठता, आत्मसंयम और लोकमंगल के लिए सतत कर्म करना है। आपका संपूर्ण जीवन सनातन संस्कृति के उन शाश्वत आदर्शों का सजीव स्वरूप था, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे।
"ऐसे महान संत युगों में जन्म लेते हैं। उनका शरीर भले ही पंचतत्त्व में विलीन हो जाए, किंतु आपके आदर्श, तप, त्याग, सेवा और आध्यात्मिक प्रकाश सदैव समाज का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
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07/08/2026

॥ ॐ नमो नारायणाय ॥
परम पूज्य गुरुदेव के पावन पूजन के दिव्य क्षण... 🙏
परम पूज्य श्री श्री 1008 ब्रह्मलीन दंडी स्वामी देवानंद सरस्वती जी महाराज की पावन स्मृति में आयोजित कार्यक्रम के दौरान गुरुदेव के श्रीचरणों में श्रद्धापूर्वक पूजन एवं वंदन का यह भावपूर्ण दृश्य।
गुरु चरणों में समर्पण ही जीवन का परम सौभाग्य है।

॥ नारायण ॥

॥ ॐ नमो नारायणाय ॥ दिनांक: 03 अगस्त 2026परम पूज्य श्री श्री 1008 ब्रह्मलीन दंडी स्वामी देवानंद सरस्वती जी महाराज की पावन...
06/08/2026

॥ ॐ नमो नारायणाय ॥ दिनांक: 03 अगस्त 2026
परम पूज्य श्री श्री 1008 ब्रह्मलीन दंडी स्वामी देवानंद सरस्वती जी महाराज की पावन स्मृति में आयोजित षोडशी (भंडारा) दिनांक 03 अगस्त 2026 को श्रद्धा, भक्ति एवं गरिमामय वातावरण में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
इस पावन अवसर पर पधारे सभी पूज्य संत-महात्माओं, श्रद्धालु भक्तों, गणमान्य नागरिकों, दानदाताओं, सहयोगकर्ताओं एवं सेवाभावी कार्यकर्ताओं के प्रति हम हृदय से कोटि-कोटि आभार एवं धन्यवाद व्यक्त करते हैं। आप सभी की श्रद्धामयी उपस्थिति एवं सहयोग से यह आयोजन दिव्य, भव्य एवं अविस्मरणीय बन सका।
हम सभी परम पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में साष्टांग दण्डवत प्रणाम अर्पित करते हुए प्रार्थना करते हैं कि उनकी असीम कृपा हम सभी पर सदैव बनी रहे तथा उनके बताए धर्म, सेवा, त्याग एवं साधना के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें।
आप सभी का हृदय से कोटिशः धन्यवाद।
॥ नारायण ॥

॥ ॐ नमो नारायणाय ॥परम पूज्य श्री श्री 1008 ब्रह्मलीन दंडी स्वामी देवानंद सरस्वती जी महाराज के पावन स्मृति में आयोजित षोड...
31/07/2026

॥ ॐ नमो नारायणाय ॥
परम पूज्य श्री श्री 1008 ब्रह्मलीन दंडी स्वामी देवानंद सरस्वती जी महाराज के पावन स्मृति में आयोजित षोडशी (भंडारा) के पावन अवसर पर रउआ सभे श्रद्धालु भक्त, संत-महात्मा, सज्जन आ शुभचिंतक लोग के सूचित कइल जात बा कि ई कार्यक्रम 3 अगस्त 2026, सोमवार के श्री स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम, बक्सर में आयोजित होई।

रउआ सभे से विनम्र आग्रह बा कि एह पुण्य अवसर पर उपस्थित होके गुरु महाराज के पावन स्मृति में श्रद्धा-सुमन अर्पित करीं, प्रसाद ग्रहण करीं आ अपना उपस्थिति से कार्यक्रम के सफल बनाई।

रउआ सभे के हार्दिक प्रतीक्षा बा।

26/07/2026

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